इस ब्लॉग पर आने के लिए शुक्रिया, कृपया कमेण्ट्स कर मुझे मेरी गलतियां सुधारने का मौका दें

Saturday, May 10, 2008

बस्तर मे गृहमंत्री को पुलिसवालों की मौत की सलामी

बस्तर में फिर नक्सलियों की बंदूकों ने आग उगली और तीन पुलिस वालों की जिंदगी छीन ली। नक्सलियों ने लगता है बस्तर के दौरे पर आने वाले गृहमंत्री शिवराज पाटिल को इस वारदात के जरिए चुनौती दे डाली है। बस्तर में एक बार फिर खाकी वर्दी खून से तर-बतर हुई है और अगर ईमानदारी से देखा जाए तो सिर्फ शहीद पुलिसवालों के परिवार को ही नुकसान हुआ है। बाकि राजनीतिक और प्रशासनिक क्षति सिर्फ आंकडों में इजाफा करने वाली है।

नक्सली वैसे भी समय-समय पर बस्तर को अपने हथियारों की गूंज से दहलाते रहें है। पुलिसवालों और सलवा-जुडुम से जुड़े निर्दोष आदिवासियों को खून से बस्तर की धरती को नहलाने का सिलसिला भी थमता नजर नहीं आ रहा है। सरकारी कोशिशों की तो चर्चा करना ही बेकार है। कागजी घोषणाएं राजधानी के वातानुकुलित मंत्रालय में पैदा होती है और लगता है वहीं दम तोड़ देती है।

इसके बावजूद बस्तर में खून बहना जारी है। छत्तीसग़ढ सरकार भी यहां हो रहे खून खराबे पर चिंता जाहिर करना कम नहीं कर रही है। और तो और अब देश के सबसे प्रभावशील राजनैतिक परिवार की जवान हो चुकी 'संभावना' राहुल गांधी को भी छत्तीसग़ढ के आदिवासियों की चिंता सताने लगी है। वे भी अपने पिता राजीव गांधी की तरह आदिवासियों के बीच गए और उनका हाल पूछा। राहुल के बस्तर प्रवास से लौटने के बाद अब केन्द्रीय गृहमंत्री के बस्तर दौरे पर आने की खबर आई और उधर नक्सलियों ने भी उनके स्वागत में तीन पुलिसवालों को मौत के घाट उतारकर 'लाल सलाम' ठोक दिया। कांकेर जिले में घात लगाकर पुलिस पार्टी पर नक्सली हमले की यह पहली वारदात नहीं है। इस वारदात में सबसे चौंकाने वाली बात जो सामने आई वो नक्सलियों का ग्रामीणों के साथ काम करते हुए हमला करना है।

इस तथ्य ने इस बात को और पुख्ता कर दिया कि नक्सलियों का वनांचल में पुख्ता जनाधार है। उनका चाहे संगीनों के आतंक से ही सही ग्रामीणों से जीवंतसंपर्क है और ग्रामीण उनके खिलाफ मुखबीरी करने से डरते है। दूसरे उनका सूचनातंत्र पुलिस के सूचनातंत्र से ज्यादा मजबूत है। उन्हें पुलिस पार्टी के थाने से रवाना होने से लेकर घटनास्थल तक पहूँचने की पूरी खबर थी मगर पुलिस को नक्सली मूव्हमेंट की जरा भी भनक नहीं लगी।खैर सरकारी गुणदोषों की समीक्षा करना अब बेमानी है, ये ठेका राजधानी में तग़डी सुरक्षा व्यवस्था के बीच पुलिस सबसे सुरक्षित किले 'पुलिस मुख्यालय' में बैठे अफसरों को मिला हुआ है। उनका काम ही है समीक्षा करना और घड़ियाली आंसू बहाना। इसका फायदा पता नहीं किसको मिलेगा लेकिन इस मामले में तीन परिवारों को अपने सदस्यों से हाथ धोना पड गया। कोई जवान बहन विधवा हो गई तो किसी बूढ़े माता-पिता का सहारा छिन गया और इस वारदात ने हो सकता है किसी अबोध बालक को बचपन में अनाथ बना डाला होगा। ये सिलसिला चला आ रहा है और लगता है चलता ही रहेगा क्योंकि नक्सल समस्या सरकार और नक्सलियों दोनों की ही नाक का सवाल बनी हुई है और दोनों पाटों के बीच में लगता है निर्दोष आदिवासी और पुलिसकर्मी फंस कर रह गए है।

2 comments:

preeta said...

naksalwaad aaj k daur k ek jwalant aur samyeek samasya hai jiska haal sarkaar aur police shayad dono dhoondne me nakaam rahe hain-is kadwe sach ko patrakaaar k kalam ne poori immmandari aur bebaki se kaagaz par ootara hai.badhai!

Udan Tashtari said...

स्वागत है हिन्दी चिट्ठाजगत में. नियमित लेखन की शुभकामनायें.