Tuesday, June 24, 2008

डॉक्टर और सरकार की लड़ाई में पिसकर मरता मरीज

छत्तीसगढ़ की धरती जितनी अमीर है उतने ही गरीब यहां के लोग है। एक तो गरीबी दूसरे उनका समय खराब है। यहां के अमीर तो लगातर अमीर होते जा रहे है और गरीब उनका बस भगवान ही मालिक है। मानसून वैसे भी गरीबों के लिये मुसीबतों की बरसात लेकर आता है। उस पर बीमारियों के इस मौसम में पहले से बीमार चल रहे सरकारी अस्पताल के जूनियर डॉक्टर भी हड़ताल पर चले गए है। ऐसे में उनकी बात सुनने वाला कोई नहीं है।


जूनियर डाक्टरों की हड़ताल छत्तीसगढ़ के लिये नई बात नहीं है। इससे पहले भी उनकी हड़ताल हो चुकी है। उस समय छात्रवृत्ति बढाने और नियमितीकरण के लिये हुई हड़ताल के बाद सरकार से उनकी चर्चा हुई थी। सरकारी आश्वासन के बाद जूडो काम पर वापस लौटे थे लेकिन अब चुनाव नजदीक आने पर उन्हें याद आया है कि उनकी मांग पूरी नहीं हुई है सो वे फिर से हड़ताल पर चले गए है। जूनियर डॉक्टरों से पहले सीनियर डॉक्टर की हड़ताल भी छत्तीसगढ़ के मरीज झेल चुके है।


अब सवाल यह उठता है कि सरकार और जूनियर डाक्टरों की लड़ाई में मरीज क्यों भुगते ! अगर उन मरीजों के पास निजी अस्पताल में इलाज कराने के लायक रूपया होता तो वे सरकारी अस्पताल में इलाज कराने के लिये भर्ती ही क्यों होते! मजबूरी में ही सरकारी अस्पताल में भर्ती होने वाले मरीजों को अब जूनियर डॉक्टरों की हड़ताल के कारण जबरिया छुट्टी दी जा रही है।


पता नहीं सरकार कब जागेगी और जूनियर डॉक्टरों की बात सुनेगी। इधर जूनियर डॉक्टर अपनी मांग मनवाने पर अड़े है। दोनों के अड़ियल रवैये के बीच पिस रहे मरीज या तो अस्पताल में ही सड़ने पर मजबूर है या घर-बार बेचकर निजी अस्पताल में इलाज कराने!डाक्टरों की हड़ताल मांगे पूरी होने तक जारी रहेगी ऐसा दावा जूडो के अध्यक्ष डॉ।नरेन्द्र चंद्राकर कर चुके है। इधर प्रदेश के मुखिया मुख्यमंत्री डॉ।रमन सिंह अपने चार साल के कार्यकाल का लेखाजोखा लेकर विकास यात्रा पर निकले हुए है। वे जहां जा रहे है वहां थोक के भाव से शिलान्यास और घोषणाएं कर रहे है। मगर उन्हें जूनियर डाक्टरों की मांगों पर विचार करने की फुरसत नहीं मिल पा रहीं है और ऐसे में मरीज उनकी विकास यात्रा या जूडो की हड़ताल खत्म होने की कामना ही कर सकते है।

2 comments:

Unknown said...

निश्चित रूप से आज के समाचार पत्रों मे डाक्टरों की हड़ताल और एक अबोध बालक की मृत्यु के समाचार से मन दुखित हो गया. क्या आज हम इतने पशुवत हो गए है की हमारी सवेदनाये भी मर गई है,

Anil Pusadkar said...

dhanyvaad aapne mere bahvanavo ki kadra ki . bhavishya me bhi aapki prtikriayon ka intjaar rahega