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Thursday, September 11, 2008

क्या मास्टरों को अब छात्रों को डांटने का भी हक नहीं रहा ?

छत्तीसगढ़ के रायगढ़ ज़िले के एक स्कूली छात्र ने मास्टर की डांट-फटकार से क्षुब्ध होकर आत्महत्या कर ली। बात देखने में तो मामूली नज़र आती है लेकिन वो कई गंभीर सवाल खड़े कर देती है।सबसे महत्वपूर्ण सवाल तो गुरू शिष्य की परंपरा के लुप्त हो जाने का है। अब ये भी सवाल उठता है कि क्या मास्टर छात्रों को डॉट-फटकार भी नहीं सकता ?

रायगढ़ के सरकारी स्कूल की ग्यारहवीं कक्षा के छात्र सुमीत ने आत्महत्या कर ली। उसे सुबह स्कूल में यूनिफॉर्म में नहीं जाने के कारण मास्टर रमेश ने फटकारा था। सुमीत एनसीसी का भी कैडेट था। उसे डांटने फटकारने वाले मास्टर का कहना है कि उसने सुमीत से कहा कि अनुशासन का महत्व तुम्हें पता होना चाहिए। अब कुछ लोगों का ये कहना है कि मास्टर ने सुमीत को 2 तमाचे भी जड़े। तो भी ऐसी बात तो नहीं थी कि आत्महत्या जैसा सख्त कदम उठाया जाता।

अब सुमीत तो रहा नहीं इसलिए उसकी आत्महत्या के कारण तो उसके साथ ही चले गए लेकिन छोड़ गए हैं कई सवाल ? आखिर ऐसी क्या वजह है जिससे शिक्षक वर्ग की प्रतिष्ठा दांव पर लगती जा रही है। ये मनोवैज्ञानिक समस्या हो सकती है लेकिन इसका हल ढूंढना बहुत ही ज़रूरी है। ऐसे प्रकरण गुरू-शिष्य जैसे रिश्तों की पवित्रता पर सवालिया निशान लगा देते हैं।

आखिर मास्टर ने डांट दिया या पीट भी दिया तो क्या इसका जवाब आत्महत्या है ? क्या पहले मास्टर सिर्फ डांटा करते थे ? क्या पहले छात्रों की पिटाई नहीं होती थी ? आखिर समय के साथ ऐसा क्या बदलाव आया है जो मास्टरों की पिटाई छात्र बर्दाश्त नहीं कर पा रहे हैं ? यहाँ सिर्फ छात्रों को ही दोषी ठहराना जायज नहीं होगा। क्षणिक आवेश या तनाव जैसी मानसिक समस्या छात्रों को क्यों चपेट में लेती है ये भी सोचना ज़रूरी है ? आखिर यही मास्टर उन्हें उनका भविष्य गढ़ने के लिए ही तो डांटते हैं।

छात्रों को अगर दोषी नहीं माना जाए तो मास्टर को दोषी मानना होगा और अगर मास्टर को डांटने-फटकारने का हक दिया जाता है तो छात्र दोषी माना जाएगा। कुल मिलाकर देखा जाए तो दोनों ही पक्ष एक-दूसरे के पूरक हैं और इस समस्या के बढ़ने के लिए दोनों ही या तो ज़िम्मेदार नहीं हैं और अगर हैं तो दोनों ही बराबर के ज़िम्मेदार है।
अब अगर हम कहें कि हमारे ज़माने में मास्टर तो जमकर पिटाई नहीं बल्कि कुटाई किया करते थे तो ये मास्टरों का पक्ष लेना भी कहा जा सकता है लेकिन सच तो यही है कि पहले मास्टर चाहे जितना डांटे, फटकारे, पीटे या कूटे बात घर तक नहीं ले जाता था छात्र। अब छोटी-छोटी बात पर विवाद खड़े हो जाते हैं और ऐसी ख़बरों के पीछे भागता मीडिया उसे हवा दे देता है। आखिर मास्टर को थोड़ा बहुत तो हक है डांटने-फटकारने का। मैं यहाँ उस मास्टर की तरफदारी नहीं कर रहा हूँ। मेरी पूरी संवेदना है सुमीत के परिवार के साथ लेकिन दिनों-दिन गंभीर होती इस समस्या का समय रहते हल ढूँढना ज़रूरी है।

10 comments:

रंजन राजन said...

कुल मिलाकर इस समस्या का हल ढूंढना बहुत ही ज़रूरी है।

Gyandutt Pandey said...

बालक आत्महत्या को प्रेरित क्यों हो रहे हैं, उन तनावों की पड़ताल जरूरी है।

डॉ .अनुराग said...

ये तो खैर एक दुखद घटना है....पर आपने वाजिब सवाल उठाया है.....हमें याद है कि स्कूल में पिटा है ,जानकर पिता श्री भी एक दो जमा देते थे ...अब जमाना बदल गया है ..बेटा लड़की छेड़ता पकड़ा जाता है बाप अपने कई साथियों के लेकर लड़की के बाप को धमकाने जाता है...तो फ़िर टीचर की क्या औकात....?

ताऊ रामपुरिया said...

अनिल जी यह समस्या सभी जगह बड़े विकराल रूप में खडी हो चुकी है ! और कोई
एक पक्ष जिम्मेदार भी नही है ! नैतिक मूल्यों का पतन दोनों ही तरफ़ से है ! छात्र
भी कम नही हैं ! और मास्टर भी ज्यादातर धंधे बाज हैं ! और अगर देखा जाए तो
जिम्मेदारी अंतत: हम पर ही आयेगी ! क्योंकि जो आज छात्र है कल वो ही मास्टर
बनेगा ! और छात्र के पालक आज हम हैं और हम क्या शिक्षा अपने बच्चो को दे रहे हैं ?

राज भाटिय़ा said...

अनिल जी उस मास्टर का कोई कसुर नही, उस ने तो उस छात्र को समझाने के लिये ही डाटां था, कसुर बार हे तो मां बाप जो आज कल अपने बच्चो को बहुत ज्यादा सिर पर बिठा रहे हे, फ़िर आप का यह मिडीया,बाकी सारी बाते आप ने लिख दी हे.
धन्यवाद

दीपक said...

अनिल जी ,

यह आस्था का संकट है,बच्चे खुलेआम शिक्षको को भेदभाव करते,ट्युशन के लिये क्लास मे ना पढाते हुये, कभी नशे मे धुत्त झुमते हुये,नैतिक साहस और व्यक्तीगत स्वार्थ के लिये नैतिक मुल्यो से समझौता करते देखते है ।इसिलिये बच्चो की आस्था शिक्षको पर कम होती जा रही है ,वही बच्चे अपने आसपास अपराधी प्रकृति के लोगो राजनैतिक और आर्थिक उन्नत्ती करते देखते है और सिधे-सच्चे आदमी को परेशान होते देखते है इसिलिये उनके अंतर्मन मे गुण्डा,रिश्वत खोर अफ़सर,रसुख वाला नेता या पत्रकार बनने की प्रेरणा है और ऐसी मानसीकता वाले अपरिपक्व बच्चो के लिये शिक्षक के दो तमाचे उपहास का कारण बन जाता है और ऐसी मानसीकता को आत्महत्या जैसा काम करने मे फ़िर कितना वक्त लगना है !

घोर झुठ मे घिरा आदमी सच का सामना करने से डर रहा है जिंदगी का एन्काउंटर करने से डर कर वह आत्महत्या कर रहा है !यह आस्था का संकट है और यह संकट कोई छोटा संकट नही है!!

shahroz said...

raigarh mera utna hi apna hai jitna aapka raipur.
jankar bahut dukh hua.
lekin bhaiya, system me hi gadbad hai.
is mein ham na student ko aur na hi teacher ko pooritarah doshi thaira sakte hain.

aur in sab k beech thoda bahut ham-samaj bhi kathghare me hai.

aap vikat sawaalo se jhoojhte hain.

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

इतना गुस्सा! इसकी जांच और सुधार के प्रयास तो किए ही जाने चाहिए ताकि भविष्य में और बच्चों की जान बचाई जा सके.

Arvind Mishra said...

यह बहुत नाजुक मसला है -उस टीचर का क्या दोष ?कुछ बाल युवा वृद्ध आत्महत्या करते हैं जो उनकी प्रवृत्ति है शायद !

seema gupta said...

"really very painful incident, really a thought is required to solve this critical issue.... thanks for sharing this incident to make every body aware about it"

Regards