Wednesday, October 8, 2008

बताओ मोहन चंद शर्मा की तरह शहीद होकर बेईज्‍जत होना अच्‍छा है या सेटिंग कर पोस्टिंग करवाना-2

गुस्‍से से लाल हो चुके उसके चेहरे को देखकर मुझे डर लगने लगा था। मैंने उसका गुस्‍सा शांत करने की गरज से कहा चलो तुम्‍हारे घर चलते हैं। सबसे मिल लूंगा। उसकी आंखों में आंसू आ गए। वो बोला कैसा घर, किसका घर। मैंने कहा तुम्‍हारा। वो बोला ट्रांसफर मुफ्त में नहीं रूका है। मोटी रकम लगी है। कहां से लाता। घर बेचकर जुगाड़ किया है। मेरे पास कोई शब्‍द नहीं थे। वो बोला क्‍या हुआ खामोश क्‍यों हो गए। मेरा घर बिका है, आप को क्‍‍या परेशानी है।
मैं सन्‍न रह गया था। उसने कहा छोड़ो भैय्या मैं जानता हूं कि पैतृक मकान बेचने का दर्द आप झेल चुके हो। मुझे भी उतना ही खराब लग रहा था, मगर मेरे लिए पिता की अंतिम निशानी से ज्‍यादा महत्‍वपूर्ण अपने बच्‍चों का पिता बने रहना था। जान है तो जहान है। फिर खरीद लूंगा मकान। इस बार पहले जैसी बेवकूफी भरी ईमानदारी नौकरी नहीं करूंगा। पेमेंट जो मैंने ट्रांसफर रूकवाने के लिए किया है उसे मैं जल्‍द से जल्‍द वसूल लूंगा। इस बार कोई सिद्धांत नहीं, कोई बेवकूफी नहीं। चलिए घर चलिए यहीं पास में किराए का मकान लेकर रह रहा हूं।

मैंने कहा छोड़ो फिर कभी चलेंगे। वो बोला नहीं चलना पड़ेगा। ज़रा देख तो लो कैसे मकान में रहते थे और कैसे मकान में रह रहे हैं हम लोग। मैंने बात बदलनी चाही लेकिन वो मुझसे ज्‍़यादा समझदार था। उसने कहा आपको तो हर पुलिस वाला बेईमान और हरामखोर नज़र आता है न। पता भी है आपको कि पुलिस वाले कैसे जिन्‍दगी गुजारते हैं। जो हरामखोर हैं उनकी बात नहीं कर रहा हूं मैं लेकिन बहुत से लोग ऐसे हैं जिन्‍हें रिश्‍वत लेना भीख मांगने के समान लगता है। क्‍या लगता है आपको कि पुलिस वाले जबरदस्‍ती गरीबों को तंग करते हैं। जबरदस्‍ती वसूली करते हैं। जबरदस्‍ती झूठे मुकदमे दर्ज करते हैं। मुझे भी ऐसा लगता था लेकिन नौकरी के दौरान मैंने पाया कि जो ऐसा कर सकता है वही अच्‍छी जगह पोस्टिंग पा सकता है। जो ऐसा नहीं कर सकता, उसे अपनी फोटो पर हार लटकता नज़र आता है। कहां से लाएगा साहब लोगों के लिए मिनरल वॉटर की बोतलें। रोज शाम को गरमा-गरम नाश्‍ता। साहब तो साहब मेम साहब लोगों की भी कॉस्‍मेटिक्‍स से लेकर किराने की खरीददारी के बिल भी चुकाने पड़ते हैं। बाबा साहब, बेबी साहब हो तो और भी मु‍सीबत है। पिज्‍ज़ा, बर्गर और आइस्‍क्रीम से नीचे तो बात ही नहीं करते। इन सबका खर्चा निकालोगे तो सारी तनख्‍वाह इसी में निकल जाएगी। क्‍यों गलत कह रहा हूं मैं। आप और आपके भाई-बंधु पत्रकार भी टाईम पास करने साहब लोगों के साथ थानों में बैठकर बस्‍तर की चिंता करते हैं। सबके लिए सबकी पसंद का जो नाश्‍ता आता है, वो क्‍या मुफ्त में आता है। छोटी-मोटी गुमटी या ठेले का नाश्‍ता हो तो गरीब ठेले वालों को 2 डंडा मारकर बिना पैसा दिए काम चल सकता है, मगर आप लोगों को तो हाईजेनिक नाश्‍ता होना। जिन होटलों का आप लोग नाम लेते हो, वो बड़े-बड़े सेठों और नेताओं की है वहां पैसा चुकाना पड़ता है। आप कभी हराम का नाश्‍ता खाओगे तो शायद मज़ा नहीं आएगा। मेरा मुंह वैसे ही कड़वा हो चला था।

मैंने उससे कहा कि छोड़ो कोई और बात करो। वो बोला ठीक कह रहे हैं आप। आपको याद है आप एक बार आपने बॉस्‍केट बॉल ग्राउण्‍ड की 1 बच्‍ची के घर गए थे। वो दुर्घटना में मृत इंस्‍पेक्‍टर की लड़की थी। वो सरकारी स्‍कूल में पढ़ती थी। उसकी मां अनुकंपा में मिली सिपाही की नौकरी कर रही थी। उसने फिर पूछा याद है न। मैंने गुस्‍से में कहा हां याद है। वो बोला फिर क्‍या हुआ, उससे मिलने के बाद तो आप बहुत दुखी हुए थे। दुनिया भर के लोगों से इस बारे में चर्चा की थी। कुछ कागज भी काले किए थे। क्‍या फर्क पड़ा। क्‍या अनुकंपा नीति बदली। क्‍या इंस्‍पेक्‍टर की मौत के बाद उसकी पत्‍नी को इंस्‍पेक्‍टर की नौकरी मिलना शुरू हुई। याद है न आपको, आप ही ने कहा था कि एक इंस्‍पेक्‍टर की मौत के बाद उसके आश्रितों को सिपाही की नौकरी देने से उसका परिवार आसमान से ज़मीन पर आ जाता है। कान्‍वेन्‍ट या अच्‍छे प्राइवेट स्‍कूलों में पढ़ने वाले बच्‍चे, सरकारी स्‍कूलों में पढ़ने पर मजबूर हो जाते हैं। शानदार बस, ऑटो या ऐसी ही कोई सवारी से स्‍कूल जाना तो सपना हो जाता है। सायकल नसीब हुई तो ठीक, वरना पैदल जाना पड़ता है। कोचिंग, ट्यूशन पढ़ना तो दूर, घर के बर्तन खुद साफ करने पड़ते हैं कपड़े भी खुद धोना पड़ता है। क्‍यों याद है न। ये सब आपको ही महसूस हुआ था, उस बच्‍ची के घर से आने के बाद। कई दिन तक आपका दिमाग भन्‍नाया हुआ रहा। फिर क्‍या हुआ। लग गए न आप नए इश्‍यू पर। वो मामला गया ठंडे बस्‍ते में। फर्क क्‍या पड़ता है आप लोगों को। आप लोग ब्‍लैक मेलर हो। मैंने कहा बस।

वो बोला बस क्‍यों। पूरा तो सुन लो। मैंने कहा अब एक शब्‍द भी नहीं कहना। वो बोला कि मैं कहूंगा तो ज़रूर आपको सुनना ही पड़ेगा। ब्‍लैक मेलर से मेरा मतलब रूपया-पैसा वसूलना नहीं है। आप लोग लोगों को इमोश्‍नली ब्‍लैकमेल करते हो। क्‍या ज़रूरत है लोगों को सपने दिखाने की। क्‍या ज़रूरत है लोगों की भावनाएं भड़काने की। क्‍यों नहीं करते इमोश्‍नल ब्‍लैकमेलिंग। आप लोगों के लिए दुर्घटना के बाद पीडि़त के परिवार का दु:ख ह्युमन स्‍टोरी से ज्‍यादा कुछ होती भी है। आप लोग कोई मरता है तो उसके परिवार का दु:ख भी बेचने से परहेज नहीं करते। आप लोगों को तो शर्म भी नहीं आती रोते-गाते परिजनों से बाईट लेते समय। आप लोगों ने तो शवयात्रा और दाह संस्‍कार तक को लाइव करने में कॉ‍म्पिटिशन किया है। आप लोग बड़े-बड़े लोगों को श्‍मशान घाट जाते और दाह संस्‍कार करते हुए दिखा सकते हो, लेकिन क्‍या आपने कभी बस्‍तर में शहीद हो रहे जवानों के दाह संस्‍कार को लाइव किया है। मैंने कहा बस, बहुत हो चुका।

वो बोला बस कहां हुआ है भैय्या। अभी तो शुरू ही किया है। हम लोग बोल रहे हैं तो बस और आप लोग जितना चाहे बको। हमारी हद तय कर दो और आप लोगों की तो कोई हद ही नहीं है। राजीव गांधी ने प्रेसबिल लाने की बात कही तो आप लोगों को वो काला कानून लगा। सारे देश्‍ा में बवाल मचा दिया। अभिव्‍यक्ति की स्‍वतंत्रता खतरे में आ गई थी। लड़-झगड़कर रूकवा लिया उस कानून को। क्‍यों क्‍या आप लोगों के लिए कानून नहीं होना चाहिए। आप लोग तोपचंद हो। जो चाहे बकोगे। जो चाहे बेचोगे। सबके लिए कानून है तो आप क्‍यों डरते हैं। आपको स्‍वतंत्र रहना है और हम लोग आप लोग के गुलाम हैं। आप कहोगे तो बोलेंगे और आप चाहोगे तो चुप हो जाएंगे। आख्रिर क्‍यों डरते हो आप लोग कानून-कायदों से। इसलिए न कि आप लोगों की लोगों को नंगा करने के आज़ादी छिन जाएगी। मैंने उसे टोकना चाहा, तो वो बोला नहीं आपको सुनना पड़ेगा। याद है आपको किस तरह आपने तलवार परिवार को नंगा करके रख दिया। कैसे-कैसे गंदे-गंदे सवाल उठाए थे आप लोगों ने। क्‍या हुआ डॉ. तलवार को फांसी पर तो नहीं लटका पाए आप लोग लेकिन जीते-जी उसे रोज मरने पर मजबूर करते रहे। और बेशर्मी देखिए कि माफी मांगने की गरज नहीं। सारी गल्‍ती पुलिस पर मढ़ दी। जब कोई कार्रवाई होती है तो कैसे बेशर्म होकर दावा करते हो आप लोग। 'देखिए हमारी ख़बर का असर'। ऐसा लगता है जैसे आप लोग नहीं होते तो कार्रवाई ही नहीं होती। फिर जब क्रेडिट लेते हो तो किसी मामले का सत्‍यानाश करने का अपमान भी तो झेला करो। मैंने कुछ कहना चाहा, लेकिन वो तो जैसे नहीं रूकने की कसम खाकर आया था। क्‍या बात करोगे भैय्या आप लोग। आप लोगों ने तो पूर्व राष्‍ट्रपति को मरने से पहले ही मार डाला था। और गल्‍ती पता चलने के बाद भी माफी तक नहीं मांगी।

अब तक मैं हथियार डाल चुका था। वो मुझे अच्‍छी तरह समझता था। तत्‍काल बोला क्‍यों मेरी जगह दूसरा होता तो उसकी मां-बहन एक कर देते। बको, मुझे भी बको गालियां। खामोश क्‍यों हो। मैं खामोश ही रहा। वो सब समझ रहा था। बोला पता है मेरा ट्रांसफर रूकने से वहां से आने वाला इंस्‍पेक्टर अब रिलीव नहीं हो पाएगा। उसे कई साल हो गए हैं वहां। उसकी बीवी की तबियत बहुत खराब रहती है। उसके बूढ़े माता-पिता भी अब कुछ दिनों के मेहमान हैं। उसके बच्‍चों की पढ़ाई की ऐसी-की-तैसी हो चुकी है। जवानी में ही बूढ़ा हो गया है वो। ब्‍लड प्रेशर और शुगर की बीमारी भी घेर चुकी है उसे। बहुत हाथ-पैर मारकर बड़ी मुश्किल से ट्रांसफर करवा पाया था वो। मैंने कहा तुम्‍हें शर्म नहीं आई उसका ट्रांसफर रूकवाते समय। उसने कहा क्‍यों बड़ी मिर्ची लग रही है। क्‍या लगता है वो आपका। मैं तो सालों आपके साथ रहा हूं। मेरे लिए चिंता नहीं है। मैंने कहा तुमसे ज्‍यादा ट्रांसफर उसके लिए ज़रूरी था। वो फिर बोला कर दी न पत्रकारों वाली बात। क्‍या ज़रूरी है और किसके लिए ज़रूरी है, ये ज़रूरतमंदों से ज्‍़यादा आप लोग समझते हो और आप लोग ही तय करते हो। मेरे लिए क्‍यों ज़रूरी नहीं है ट्रांसफर रूकवाना। क्‍या मैं अपने बच्‍चों को जंगल की स्‍कूल में भर्ती कराऊं। जहां मास्‍टर भी नहीं आते। देखा है आपने बस्‍तर के अंदरूनी हिस्‍सों को। आपको तो पता है न मेरी बीवी को अस्‍थमा है। ले जाऊं उसे वहां और कभी तबियत बिगड़ी तो कहां जाऊंगा। डॉक्‍टर तो मिलते ही नहीं हैं। क्‍या चाहते हैं आप। मैं जाऊं बस्‍तर और वापस आऊं तिरंगे में लिपटकर। आपके लिए एक अच्‍छी ह्युमन स्‍टोरी बनने के लिए जाऊं बस्‍तर। अपने बच्‍चों को अनाथ बनाने के लिए जाऊं बस्‍तर। आप और अमरसिंह जैसे छुटभैय्यों के लिए अपनी मैय्यत की मैय्यत निकलवाने के लिए जाऊं बस्‍तर। आपको पता है कि जिस कॉफिन में लाश आती है उसमें लाश नहीं होती, लाश के चिथड़े होते हैं। और वो भी अंदाज से कॉफिन में डाल दिए जाते हैं कि शायद ये टुकड़ा इसी लाश का होगा। देखा है कभी आपने बस्‍तर का बारूदी विस्‍फोट। कभी समेटा है आपने वहां विस्‍फोट के बाद लाशों के बिखरे टुकड़ों को। मुझे ऐसा लगा कि मैं पागल हो जाऊंगा। मैंने उससे कहा कि मैं तुम्‍हारे हाथ जोड़ता हूं...........उसने मेरी बात बीच में ही काट दी। सब कहना, सब मान लूंगा। सिर्फ 2 बात नहीं मानूंगा एक बस्‍तर नहीं जाऊंगा और दूसरा खामोश नहीं रहूंगा। आपको सुनना पड़ेगा। अच्‍छा लगे तो भी और बुरा लगे तो भी। और वो क्‍या बोला कल बताऊंगा। आप भी खामोश मत रहिएगा अच्‍छा लगे तो बताईएगा और बुरा लगे तो भी बताईएगा।

23 comments:

ऋचा जोशी said...

प्रस्‍तुत कथा सच हो या झूठ लेकिन कथ्‍य में दम है। बात में दम है। मैं ऐसे बहुत से पुलिस अधिकारियों को जानता हूं जो सच के लिए लड़ते-लड़ते खुद निपट गए। एक ईमानदार आईपीएस अफसर तो एक साठ साल की बुढि़या से बलात्‍कार के मुकदमें में फंसा दिया गया क्‍योंकि वह ईमानदारी छोड़ने और सफेदपोश बदमाशों को बख्‍शने को तैयार नहीं था। लेकिन मोहनलाल शर्मा की जो कहानी मैने सुनी है वह बिल्‍कुल अलग है। आगे भैय्या राम जानें।

photo said...

subhkamna aap bahoot achha likhtay hay par system nahe badlayga bhaiya chaa-chaa bada naa bhaiya sabsay bada rupiya

राज भाटिय़ा said...

बिलकुल सही कह रहा है यह आप का पुलिस वाला, जब हम छोटे थे तो अकसर सुनते थे, ओर कई जगहो पर लिखा होता था, बेईमानी तेरा मुंह काला, ओर आज का नारा ( यह मै नही कहता ओर ना ही कहना चाहता हुं )ईमान दारी तेरा मुहं काला,
वेसे ईमानदार का जीना बहुत ही मुस्किल है, लेकिन फ़िर भी इमानदार लडता है इन हरामियो से
धन्यवाद

COMMON MAN said...

कहां से लाएगा साहब लोगों के लिए मिनरल वॉटर की बोतलें। रोज शाम को गरमा-गरम नाश्‍ता। साहब तो साहब मेम साहब लोगों की भी कॉस्‍मेटिक्‍स से लेकर किराने की खरीददारी के बिल भी चुकाने पड़ते हैं। बाबा साहब, बेबी साहब हो तो और भी मु‍सीबत है। पिज्‍ज़ा, बर्गर और आइस्‍क्रीम से नीचे तो बात ही नहीं करते। इन सबका खर्चा निकालोगे तो सारी तनख्‍वाह इसी में निकल जाएगी। क्‍यों गलत कह रहा हूं मैं। आप और आपके भाई-बंधु पत्रकार भी टाईम पास करने साहब लोगों के साथ थानों में बैठकर बस्‍तर की चिंता करते हैं। सबके लिए सबकी पसंद का जो नाश्‍ता आता है, वो क्‍या मुफ्त में आता है। छोटी-मोटी गुमटी या ठेले का नाश्‍ता हो तो गरीब ठेले वालों को 2 डंडा मारकर बिना पैसा दिए काम चल सकता है, मगर आप लोगों को तो हाईजेनिक नाश्‍ता होना। जिन होटलों का आप लोग नाम लेते हो, वो बड़े-बड़े सेठों और नेताओं की है वहां पैसा चुकाना पड़ता है। आप कभी हराम का नाश्‍ता खाओगे तो शायद मज़ा नहीं आएगा। मेरा मुंह वैसे ही कड़वा हो चला था।
nangaa kar diya hai aapne sabko

दीपक said...

सत्य कह रहे निष्पक्ष रुप से यह अच्छा लगा !!

सौरभ कुदेशिया said...

comment dalne ke liye kuch choda hi nahi apne..Jamini sach se bada sach aur kya hoga? kya comments kare aur kis muh se kare? aap or hum sabhi isi system ke hi to hisse hai..aap police ki jagah kisi aur govt department ka naam bhi likh de to bhi upar jo likha hai woh puri tarah se sach hoga. Log imandari ki zindagi wakai jeena chahte hai, par yeh system itna kharab ho chuka hai ki takh haar kar, man maar kar isi ka hissa ban na padta hai..

ताऊ रामपुरिया said...

मैं तो आज इतना ही कहूंगा की ये है बिल्कुल खरी खरी !
बहुत शानदार लिखा आपने ! शुभकामनाएं !

अशोक पाण्डेय said...

सही लिखा है आपने। पुलिस को गाली देना आसान है, लेकिन जिन मुश्किल हालातों में वह काम करती है, उस ओर कोई नहीं देखता। इस पहलू को सामने लाने के लिए धन्‍यवाद।

गिरीश बिल्लोरे "मुकुल" said...

SATY AAP LIKH SAKATE HAIN HAM PEE JAATE HAIN BHOGATE HAIN
KYAA KAREN JEE

Gyandutt Pandey said...

यह दृष्टि कोण तो समझने - आत्मसात करने में बहुत समझ चाहिये। मैं वह इकठ्ठी करने की कोशिश कर रहा हूं।
बहुत दमदार लिखा है आपने।

shyam kori 'uday' said...

अनिल जी, पुलिस के प्रति आपकी कलम में सम्वेदना 'प्रसंशनीय' है, पुलिस/बस्तर/ट्रांसफर/पोस्टिंग/केंसलेशन के हालात कमोवेश ऎसे ही हैं लेकिन इस इंसपेक्टर की कहानी मे दम नही लग रहा है।

goooooood girl said...

i like......

dr. ashok priyaranjan said...

bahut sarthak dhang sey samaj ki schchai ko shabdbadh kiya hai.

Tarun said...

ye to anvarat chalta rahega

makrand said...

bahut sunder rachana sir
kabhi humare dustbin me thuk ker jaiye
wishing u happy dashera
do go to see ravan dahan
regards

मिहिरभोज said...

भैये मेरे पापा भी पुलिस मैं थानेदार थे ...बचपन मैं हम उनके साथ रहने को तरस गये थे..क्यों कि हर बार दो तीन महिने मैं नये थाने मै भेज दिये जाते थे...परेशान होकर उनको थाने के लायक नहीं समझा गया तो फिर सी आई डी मैं भेद दिया गया..कुल मिलाकर जीवन भर फुटबाल बने रहे ...अगर सैटिंग से अच्छी जगह पोस्टिंग करवाते हमारा भी बचपन ठीक गुजरता..और शर्मा जी ने तो हद ही कर दी क्या जरूरत थी छाती खोलकर उन देशद्रोहियों से भिङने की बाकी लोग भी तो थे

डॉ० कुमारेन्द्र सिंह सेंगर said...

तीर स्नेह-विश्वास का चलायें,
नफरत-हिंसा को मार गिराएँ।
हर्ष-उमंग के फूटें पटाखे,
विजयादशमी कुछ इस तरह मनाएँ।

बुराई पर अच्छाई की विजय के पावन-पर्व पर हम सब मिल कर अपने भीतर के रावण को मार गिरायें और विजयादशमी को सार्थक बनाएं।

प्रतीक माहेश्वरी said...

मुझे नहीं पता की यह कथा कितनी सत्य है पर जो भी हो इससे अच्छी तरह से समाज में हो रही धान्धलेबाजी को दिखाना सम्भव नहीं है |
आपको भी दशहरे की हार्दिक शुभकामनाएं |

अपने से बाहर... said...

श्रीमान्, टिकर दौड़ रहा है आप ही के पन्ने पर - कि कमेण्ट्स कर ग़लतियाँ सुधारने का मौक़ा दें...
एक कमेण्ट हमने भी डाला था, जो मुझे लगता है कि एक गंभीर ग़लती की ओर इंगित कर रहा था, अगर टिप्पणी ग़लत है, तो उलटे मुझे ही सुधरने का मौक़ा दें...वैसे ईमानदारी से, ग़लतीखोजक चुग़लीबाज़ टिप्पणीकार बनने की मेरी कोई लालसा नहीं, इसलिए आग्रह यही है कि टिप्पणी बिल्कुल ना छापें, लेकिन अगर टिप्पणी सही है तो ग़लती ठीक तो कर लें...अनरिज़नेबुल डिमांड तो नहीं है ना?

SACHIN JAIN said...

wastvikta hai ye sab

अपने से बाहर... said...

आपसे इसी बड़प्पन की अपेक्षा थी सर...विश्वास बनाए रखने के लिए बहुत धन्यवाद, गुस्ताख़ी के लिए माफ़ कीजिएगा।

उमेश कुमार said...

अनिल पुसदकर को धन्यवाद कहिए एवं एक टिप्पणी कार को लानत भेजिए।
अनिल पुसदकर जी के ब्लाग का मै नियमित पाठक हूं लेकिन उनके लेख पर मै टिप्पणी लगभग नही लिखता अन्य दूसरो के लेखो पर भी निरर्थक नही लिखता।मुझे याद पडता है की मै एक तीखी टिप्प्णी लिखी थी जो प्रकाशित नही की गई थी तब मुझे लगा था की उनमे शायद इतना साहस नही की आलोचना को सहज ढंग से ले सकें।प्रवीन तोगडिया के ऊपर लिखे उनके लेख पर एक तीखी टिप्पणी लिखी थी जो प्रकाशित की गई थी,उसके बाद कोई लेख उनका ऎसा नही लगा जिस पर टिप्प्णी लिखी जाए। आज कई दिनो बाद ब्लागो को देख्नने का अवसर मिला तब देखा की छत्तीसगढ मे पुलिस बिभाग पर एक लेख है जिसमे पुलिस के कर्मचारी/ अधिकारी स्थान्तरण तथा पदस्थापना के लिए किस तरह भेदभाव के शिकार होते है।जो साधन सम्पन्न है वे बस्तर नही जा रहे तथा मलाई दार जगहो पर पोस्टेड है लेकिन जो कमजोर है साधन बिहीन है वे बस्तर जाने के लिए अभिसप्त है जबकी सरकारी नीति से इन्हे बस्तर नही भेजा जाना चाहिए। पुसदकर जी का यह लेख कई माएनो मे महत्वपूर्ण है ।जब मुख्याधारा की मीडिया इस तरह के विषय को नही छूना चाहती तब यही एक आसरा है की लोगो की आवाज मुखर होकर अन्य तक पहुचें। बस्तर मे शहीद होने वाले पुलिस कर्मचारी और अधिकारी के सम्मान तथा पीडित शोशित पुलिस कर्मियो और अधिकारियो के लिये आवाज देने वाले पुसदकर जी को धन्यवाद कहें। मै जिस टिप्पणी कार को लानत भेजने की बात लिख रहा हूं वे पुसदकर जी के ब्लाग के नियमित टिप्पणी कार है और उसी बिभाग मे अधिकारी हैं जिसकी चर्चा ब्लाग मे की गई है।उन्होने इस पक्षपात और साधनहीनता के शिकार हो रहे लोगो को देखा है लेकिन उनमे भी इतना नैतिक साहस नही की सच्चाई को स्वीकर सकें। मेरा मानना है की केवल लिखने के लिए मत लिखे,कुछ सार्थक भी लिखे/टिप्पणी करें।

ज़ाकिर हुसैन said...

आपने अपने सशक्त लेखन से पुलिसया जीवन के दुसरे पहलु से परिचित कराया. सच बात है तमाम पुलिस वाले भी शैतान नहीं होते.
अच्छे लेख के लिए बधाई.