Sunday, September 27, 2009

अगर आपसे सभी खुश हैं,तो इसका मतलब आपने ज़िंदगी मे बहुत ज्यादा समझौते कियें हैं?

एक छोटी सी पोस्ट जो बहुत बड़े सवाल खड़े करती है।सुबह-सुबह यानी थोड़ी देर पहले एक एस एम एस मिला।छोटा सा एस एम एस जिसने मुझे सोचने पर मज़बूर कर दिया।मैने पाया कि वो सच्चाई के एकदम करीब है।अजय काळे ने एस एम एस मे कहा था कि अगर आपसे सभी खुश हैं,तो इसका मतलब आपने ज़िंदगी मे बहुत ज्यादा समझौते कियें हैं।


पहले-पहल तो मुझे लगा कि रोज़ का काम ही है एस एम एस भेजना,मगर दोबारा पढने पर लगा कि ये तो ज़िंदगी की बहुत ही कड़ुवी सच्चाई है।मैने गौर किया कि शायद समझौते करता तो हो सकता है बहुत से लोग मेरे दुश्मन नही होते।समझौते करता तो,हो सकता है सभी मुझसे भी खुश रहते।समझौता नही करने का मुझे कोई बहुत ज्यादा दुःख नही है लेकिन कभी-कभी इस बात को लेकर परेशानी ज़रूर महसूस करता हुं कि ज़रा सी बात पर अड़ जाने से कुछ बहुत अच्छे संबंध खराब हो गये।अजय मेरा दोस्त भी है और भाई जैसा ही है,पता नही उसने मुझे ये एस एम एस क्यों किया?वो मेरा मिजाज़ जानता है और लड़ाई-झगड़ो से भी वाकिफ़ है।फ़िर उसने ये सब मुझसे क्यों कहा ये सवाल मुझे परेशान कर रहा है।क्या वो मुझे ये बताना चाहता था कि समझौता नही करने कि वजह से बहुत से लोग मुझसे खुश नही है?या दुश्मन हो गये हैं?या फ़िर वो ये कहना चाहता है कि समझौता करना शुरू कर दो सब खुश रहेंगे?पता नही वो क्या कहना चाहता है,लेकिन मै समझ नही पा रहा हूं कि समझौता करना शुरू कर दुं या चलता रहा अपनी ही एक टांग वाली चाल से,बिना कोई समझौता किये।चाहे कोई खुश रहे या…………………।मै दरअसल थोड़ा क्न्फ़्यूज़्ड हूं इस्लिये आप लोगो से इस बारे मे सलाह मांग रहा हूं।आखिर ये सवाल तो आप लोगो के जीवन मे भी उतना ही महत्व रखता है?और फ़िर जब अपनी बुद्धी साथ न दे तो दूसरो की सलाह पर चलना चाहिये।तो मै इंतज़ार करूंगा आप सब की सलाह का।

32 comments:

R S said...

अगर आपसे सभी खुश हैं,तो इसका मतलब आपने ज़िंदगी मे बहुत ज्यादा समझौते कियें हैं।

some people can compromise on every issue as long as they can be popular but many times popularity is no measure to know whether every one is happy with them . yet such people always show that they can keep all happy .

those who dont compromise on what they feel is right and justified may not be popular but its not necessary that others are unhappy with them

rather the people who dont compromise are more respected , other people may or may not stand up with them but most people are in awe of them and love them .

people who dont compromise always are looked upon

विनोद कुमार पांडेय said...

हर किसी को मुकम्मल जहाँ नही मिलता ..अगर खुश रहना है तो निश्चित रूप से हमें समझौते करने ही पड़ते है नही तो अपनी ज़िद और जिंदगी की तेज रफ़्तार में हम टूट सकते है..

सुंदर बात...बधाई..दशहरा की हार्दिक शुभकामना..बधाई!!!

Vidhu said...

.अनिल जी आपका सवाल आसान है ..जवाब मुश्किल, मेरे एक मित्र जो कभी देश के सबसे तेजी से बढ़ते अखबार में काम किया करते थे ...ने मुझसे कहा देखो मेरे साथ के सभी लोग एन -केन धन बटोर रहें हें,और दूसरे फायदे भी ...में एसा नहीं कर पाता हूँ...वो समझौते भी कर लेते हें में नहीं, में दुखी भी हूँ की मुझे जल्द ही इस अखबार को छोड़ना पडेगा ... मेरा एक ही जवाब था ज्यादा दुखी होना आवश्यक नहीं तुमजो कर सकते हो करो वो जो कर सकतें हें कर रहें हें ....गर सोचो गे तो इसका यही मतलब है की तुम भी उन जैसा ही बनना चाहते हो ....एक बात और जिन्दगी का फलसफा .इंसान नहीं गढ़ता वो उसे विरासत में मिलता है ,मेरी शुभकामनाये..दोस्त दुनिया में कम हो दुश्मन ज्यादा तो जिन्दगी आसन हो जाती है ...विजय पर्व की शुभकामना आपको परिवार को आपके दोस्तों और दुश्मनों को भी .

राज भाटिय़ा said...

अनिल जी , आप के लेख मै दम है, बहुत ही विचारणीय है, शायद मै भी सब से समझोता नही कर सकता... क्योकि गलत बात गलत होती है, लेकिन वो बात हमेशा गलत नही जिसे मै गलत कहूं. जिस बात को समाज गलत कहे, बाकी लोग गलत कहे, ऎसी बातो से समझोता केसा, ओर अपनी नजरो से गिर कर जीये तो जीना केसा?? यानि जेसा चलत है चले मस्त मस्त
धन्यवाद, वेसे आप की पोस्ट ने मुझे भी आईना दिखा दिया

PD said...

इस एस.एम.एस. का एक और मतलब भी हो सकता है.. "अगर आपसे सभी खुश हैं,तो इसका मतलब आपने ज़िंदगी मे बहुत ज्यादा त्याग कियें हैं।"

वैसे अपनी बात कहूं तो अभी तक मुझसे मेरे आस-पास के मित्रगण बहुत खुश थे और मैं नाखुश, मगर अभी हाल-फिलहाल में वे नाखुश रहने लगे.. क्योंकि अब मैं अपनी खुशी ढ़ूंढ़ रहा हूं.. जो दूसरों को खुश रखकर और हर बात में समझौते कर के नहीं मिल सकता है..

Anonymous said...

samjhota agar kisi ki bhalaee k liya kiya gya ho ,to usse swekar kar lena chahaiye,
aur anil jee samjhota to kabhi na kabhi harr kisi ko karna he padta hai apni zindagi mein,
par jahan apne swabhimaan ki baat ho wahan samjhota karna khud ko dhoka dena hai


vikas zutshi
www.likhoapnavichar.blogspot.com

जी.के. अवधिया said...

यह बहुत अच्छी बात है कि दूसरों को खुश रखो और स्वयं भी खुश रहो। ऐसा सिर्फ समझौता करने से ही हो सकता है। समझौता करना बुरी बात नहीं है और करना भी चाहिए, किन्तु मेरे विचार के अनुसार अपनी अन्तरात्मा की आवाज के विरुद्ध और अपने सिद्धान्तों की कीमत पर कदापि समझौता नहीं करना चाहिए।

एक बात और, जिसे आपने अपनी 'एक टांग वाली चाल' कहा है वह मेरे ख्याल से आपकी अकड़ नहीं "स्वाभिमान" है।

प्रवीण शाह said...

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"अगर आपसे सभी खुश हैं,तो इसका मतलब आपने ज़िंदगी मे बहुत ज्यादा समझौते कियें हैं?"

सत्य है अनिल जी,
इसे दूसरे शब्दों में भी कहा गया है " केवल एक वेश्या ही हर किसी को खुश रख सकती है।"

श्रीकांत पाराशर said...

ANILJI, AAPKE MITRA NE AAPKO SMS KYON AUR KIS AASAY SE KIYA YAH TO MITRA AUR AAP HI JANEN PARANTU YAH BAAT BAHUT HI MARKE KI LAGATI HAI KI AGAR KISI AADMI SE KOI NARAZ NAHIN HAI TO ISKA MATLAB YAHI HAI KI USNE ZINDGI MEIN BAHUT SAMJHOUTE KIYE HAIN. JO BHI VYAKTI SAMJHOUTE NAHIN KARTA USSE LOGON KA NARAZ HONA SWABHAVIK HAI. MERA YAH MATLAB NAHIN KI AAPKO SAMJHOTE KARNE CHAHIYE, AAPKO NUKSHAN KE BAAD BHI SAMJHOTE NAHIN KARNE PASAND NAHI TO ISKA BHI TO KAARAN HOGA, AAP KOI PAGAL TO HAIN NAHI.AATMA KASHT PAYE AISE SAMJHOTE BHI KIS KAM KE.

ताऊ रामपुरिया said...

लेकिन मै समझ नही पा रहा हूं कि समझौता करना शुरू कर दुं या चलता रहा अपनी ही एक टांग वाली चाल से,बिना कोई समझौता किये।चाहे कोई खुश रहे या…

जीवन कोई नियमों से नही चलता. इसमे थोडी फ़्लेक्जिबिलिटी तो रखनी ही पडती है. अगर ज्यादा भी नही तो आटे मे नमक जितनी जरुरत तो समझोतों की होती ही है. बाकी अपनी अपनी मर्जी.

दशहरे की रामराम.

cmpershad said...

मैंने समझौते तो किए पर सभी खुश नहीं हैं:) इसलिए, जब जो करना है सो करो और समझौता एक्स्प्रेस की तरह दौड़ो॥

Dr. Smt. ajit gupta said...

समझौता करने से भी सभी खुश नहीं होते अपितु दूसरों की भी अपेक्षा बढ जाती है। आप जितना समझौता करते जाओंगे अपेक्षाएं उतनी ही बढती जाएंगी। आप लोगों के लिए जितने पालतू बनते जाएंगे लोग खुश तो दिखायी देंगे लेकि‍न वे फिर भी चाहेंगे और पालतू में भी और ज्‍यादा पालतू बन जाए। जिन्‍दगी को अपनी शर्तों पर ही जीना चाहिए। सभी तरह के इंसान हैं दुनिया में, जो आपको समझेगा वह आपसे खुश भी होगा और जो नहीं समझता वह कभी भी खुश नहीं हो सकता। व्‍यक्ति की पहचान उसके आदर्श बनाते हैं ना कि उसके समझौते। यदि आपने बात-बात पर समझौते किए तब फिर आपकी पहचान क्‍या रहेगी? लोग कहेंगे कि अरे वो, वो ठिलुमुल व्‍यक्ति। अच्‍छा विषय निकाला है, बहुत कुछ लिखा जा सकता है और बहुत विचार भी लोगों के आएंगे।

निशाचर said...

अनिल जी, इस विषय में अपना एक सिद्धांत है- " साफ़ बोलो, सुखी रहो".
समझौता हताशा और कमजोरी की निशानी होती है. इससे भौतिक सुख जरूर हासिल हो जायेंगे लेकिन अपनी नजरों में ऊँचा नहीं उठ सकते (बशर्ते अंतरात्मा मर न गई हो और स्वाभिमान मिट न गया हो).

जो काम मैं नहीं करना चाहता उसे करने के लिए आज तक कोई मुझे मजबूर नहीं कर पाया और इसका मुझे गर्व है. इसी तरह गलत बात को गलत कहने में कभी मैंने अपनी जबान को लगाम नहीं दी चाहे सामने कोई भी हो. इसके लिए कुछ नुकसान तो जरूर उठाने पड़े लेकिन मैं रात को गहरी नींद सो पाता हूँ.

जहाँ तक मित्रों का सवाल है तो उनकी संख्या नहीं बल्कि उनके गुण ज्यादा महत्त्व रखते है. और रही बात सभी लोगों को प्रसन्न रखने की तो भाई वह काम तो देवता भी न कर सके फिर हम किस खेत की मूली हैं.

अजय कुमार झा said...

हां एक नज़रिये से देखें तो शायद लगता है कि यही ठीक है,.....मगर स्थिति तब बहुत ही विकट हो जाती है जब पता चलता है कि एक बिंदु पर आकर आपने उस सम्झौते वाली लाईन को पार कर लिया..चाहे आपने अपनी तरफ़ से नहीं किया पर सामने वाले ने एह्सास दिला दिया कि आपने ऐसा कर दिया है...यानि नाखुश..तो ..

मेरे विचार से सबके जीवन के अनुभवों, उसके अपने चरित्र, और बहुत सी बातों पर ही ये निर्भर करता है ..कि आपका किया हुआ समझौता माना जा रहा है...या कुछ और..मेरे ख्याल से तो परिस्थिति के अनुसार स्वाभाविक निर्णय ही लेते हैं सब ....आगे समय ही तय करता है....वैसे विचार करने वाली पोस्ट के लिये आभार...

Dr. Mahesh Sinha said...

खुश रहना एक आतंरिक अनुभूति है . समझौता करके बाहरी ख़ुशी और सम्बन्ध तो बन सकते हैं लेकिन वे यथर्थता की धरातल पर नहीं खड़े होते .
समझौता शब्द ही द्योतक है कि कहीं कुछ गड़बड़ है . स्वर्गीय भुट्टो ने कहा था विवाहित व्यक्ति अपने सिद्धांतो पर नहीं चल सकता कहीं न कहीं उसे समझौते करने पड़ते हैं .

समयचक्र - महेंद्र मिश्र said...

खुश रहना एक अलग बात है यह स्वयं के स्वभाव पर निर्भर करता है . . जिन्दगी से समझौता करना एक अलग बात है . समझौता परिस्थितियों के आधार पर किये जाते है .समझौते पक्ष या विपक्ष में समान और असमान परिस्थितियों में किये जाते है .आभार

महफूज़ अली said...

waise samjhauta to bilkul bhi nahi karna chahiye...... aap jaise hain waise hi rahiye......


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Shri Anil ji........ saadar namaskar........ maine itihaas se related sawaal ka jawaab de diya hai.............plz blog dekhen.....

aur apna mat den...


dhanyawaad


mahfooz

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

डॉ अजित गुप्ता और डॉ महेश सिन्हा ने वह सब कह दिया जो मैं कहने वाला था. उदात्तमना होकर देते रहना और कुढ़कर समझौते करते रहना, यह दोनों विपरीत ध्रुव हैं.

naveentyagi said...

anil ji bahut achchha lekhan hai

काजल कुमार Kajal Kumar said...

"अगर आपसे सभी खुश हैं,तो इसका मतलब आपने ज़िंदगी मे बहुत ज्यादा समझौते कियें हैं।"
हम्म्म... सोचने पर मज़बूर करती है ये बात...

विपिन बिहारी गोयल said...

bilkul sahi kaha aapne

Sudhir (सुधीर) said...

अनिल जी,

समझौते करके मनुष्य सामाजिक रूप से सफ़ल प्रतीत हो सकता है किन्तु खुश तो कदापि भी नही हो सकता, ऐसा मेरा मानना है

ताऊ रामपुरिया said...

इष्ट मित्रों एवम कुटुंब जनों सहित आपको दशहरे की घणी रामराम.

संजीव तिवारी .. Sanjeeva Tiwari said...

बडे भाई सब को खुश रखने का बहुत बडा खामियाजा भी भुगतना पडता है. स्‍वयं का बहुत कुछ खोना पडता है वो भी मुस्‍कुराते हुए.

आप जैसे भी हैं अच्‍छे हैं, कोई सुझाव नहीं, कोई बदलाव नहीं.

आपको विजयादशमी की हार्दिक शुभकामनांए.

अल्पना वर्मा said...

अगर आपसे सभी खुश हैं,तो इसका मतलब आपने ज़िंदगी मे बहुत ज्यादा समझौते कियें हैं।"

--लगता तो सच ही है..
Mere vicahr mein...Jahan tak aap khud ko comfortable
samjhe ...samjhote wahin tak theek rahte hain...anytha..गले में फंसी हड्डी बन जाते हैं न उगलते बनता है न निगलते !

-विजयदशमी की हार्दिक मंगलकामनाएँ

दर्पण साह "दर्शन" said...

SATYA VACHAN....

ज्ञानदत्त पाण्डेय | Gyandutt Pandey said...

जिन्दगी निरन्तर किये जाने वाले समझौतों का ही नाम है।

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ said...

अनिल जी, बिना समझौतों के कितने लोग जी पाते हैं?
-Zakir Ali ‘Rajnish’
{ Secretary-TSALIIM & SBAI }

imnindian said...

sms में काफी सच्चाई है , पर हम सब को खुश नहीं रख सकते. अगर सब को खुश रख भी लिए तो खुद को नहीं,

imnindian said...

sms में काफी सच्चाई है , पर हम सब को खुश नहीं रख सकते. अगर सब को खुश रख भी लिए तो खुद को नहीं, जीवन एक मुहावरों भी नहीं चलता . बहुत सारे मुहावरे मिल कर इनेह बनाते है...

Rakesh Singh - राकेश सिंह said...

जीवन मैं संबंधों को बनाये रखने हेतु समझौता तो करना ही पड़ता है | समझौते की एक लक्ष्मण रेखा भी खिंची जानी चाहिए | ऐसा ना हो की हर पग पे समझौता ही करते रह जाएँ |

आपका प्रश्न बिलकुल सार्थक है |

शरद कोकास said...

अनिल भाई एस एम एस मे तेंशन नही लेने का सब एक दूसरे को फोर्वर्ड करते है मेरे को भी आया है ।