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Thursday, October 1, 2009

आज बुज़ुर्ग दिवस है इसलिये आज भर अपने बुज़ुर्गो का सम्मान कर लो कल से तो फ़िर्………

माईक्रोपोस्ट ही लिख पाऊंगा इस वृहद विषय पर्।बुज़ुर्ग दिवस पर अख़बारो मे विशेष लेख हैं।टी वी तो मैने अभी तक़ खोला नही है डेफ़िनेटली उस पर भी स्पेशल प्रोग्राम दिखेंगे।एस एम एस का भी दौर शुरू हो गया है।अचानक़ लगा कि बुज़ुर्गो की पूछ-परख बढ गई है।ऐसा लगा कि बस इस एक दिन ही हमे अपने बुज़ुर्गो का सम्मान करना है और उसके बाद दूसरे दिन से सब फ़्री है॥ वृद्धाश्रमों की बढती संख्या और अपने ही घरों मे कैद बुज़ुर्गो को देख कर लगता है कि उन्होने जैसे दिन रात एक करके अपनी औलाद को बस रुपया भेजने लायक ही बनाया है।ये तक़दीर वालो की बात है बाकी लोगो की पैसा कमाने की मशीन से तो पैसा भी नही निकलता। बुढापे मे अकेले घरों मे कैद,नाती-पोतो को गोद मे खिलाने के अरमानो की कब्र पर आंसू बहाते बुज़ुर्गो को देख कर लगता है क्या ये यही सुसंस्कृत देश है जंहा श्रवण कुमार अपने माता-पिता को अपने कंधो पर बिठा कर तीर्थयात्रा पर ले गया था।और भी बहुत सी बातें है मगर आज बस इतना ही कह पाऊंगा कि आज बुज़ुर्ग दिवस है इसलिये आज भर अपने बुज़ुर्गो का सम्मान कर लो कल से तो फ़िर्………

18 comments:

Dr. Smt. ajit gupta said...

हम भी श्राद्ध मना रहे हैं, अपना ही। क्‍योंकि हम भी तो बुजुर्ग हो गए हैं और एक दिन मनने वाला स्‍मरण तो श्राद्ध ही होता है।

महफूज़ अली said...

Anil ji ....... saadar namaskar......

aap sahi kah rahe hain...... kan se kam aaj ke din to apne buzurgon ko yaad kar lein hum........

par ab karen kya aaj ke yuva...... aajkal maa-baap hi paise ko zyada tarjeeh dene lagen hain..... agar yuva paise nahi kamayenge...... to yahi buzurg matiya-paleed karte hain..... ko falane ke ladke ko dekho ...... usko dekho ....isko dekho..... wo to itna kamaa raha hai...... to becharon yuva ko ghar se baahar to nikalna hi padega.....

abhi kal ki hi baat raga hoon...... ATM se paisa nikaalne gaya tha..... ATM ke bagal mein hi ek Diagnostic centre bhi hai..... paise nikaal ke baahar nikla..... to aise hi dekha ki ek buzurg vyakti..... ko 6 adhed aur jawan mil ke godi mein leke car se nikal rahe hain..... tabhi wo buzurg zor se khaansa.... aur moonh ke side khoon nikla ....aur un mein se ek jawaan ne apne haath se wo khoon pocha .... aur rote huye kahan buzurg se..... ki aap chinta na karo sab thik ho jayega.... shayad wo log us buzurg ke bete aur pote rahe honge.... par yeh dekh ke achcha laga ki aaj bhi Shravan hain hamare samaaj mein...... chand logon ke mis-behave ko hum..... poore samaaj se nahi jod sakte hain.....

agar buzurgon ko sammaan paana hai...... to inko bhi apne bachchon se wahi vyavahar karna hoga..... tabhi to shravan paida hionge.....

agar koi bachcha apne buzurg ka khyaal nahi rakhta hai..... usmein us bachche ki koi galti nahi ...... ismein galti n buzurgon ki hogi .......... jinhone apne bachchon mein achche SANSKAR nahi daale hain.....

isliye SANSKAR achche hon......... to sab achcha hoga.................

संजय बेंगाणी said...

आपसे पता चला ऐसा कोई दिन भी है. सोचते है कैसे मनाएं? दादा-दादी थे तब वे साथ थे, अब हम माता-पिता के साथ है.

अजीब सी क्रूरता है इस दिन के विषय में. वैसे हर पिढ़ी ने किया है किसे दोष दें?

lalit sharma said...

अनिल भैइया बुर्जुग दिवस मनाया जा रहा है,मैने एक पोस्ट लगाई इस विषय पे ललित डाट काम पर ये दुसरी आपकी पोस्ट आई है,कहा लोगो के पास इतना समय है जो बुर्जुगो की चिन्ता करे,बस कुछ दिन बाद अपना भी क्र्म है लोग ये नही सोचते,हमने बचपन मे सास के कुल्ह्ड वाली कहानी पढी थी,अब तो वो भी गायब हो गयी कोर्स से। लो्गो को कैसे पता चलेगा कि बुढापा भी कोई चीज है, बधाई,

जी.के. अवधिया said...

चलिए, बुजुर्ग दिवस मनाकर, भले ही एक दिन के लिए और सिर्फ दिखावे के रूप में, बुजुर्गों का सम्मान तो करेंगे!

दिवस पे दिवस बनाते चलो
संस्कृति को अपनी भुलाते चलो

ताऊ रामपुरिया said...

भतिजे हम भी बुजुर्ग हैं जरा आज तो सम्मान करवा ही दो, कल की कल देखेंगे.

रामराम.

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

बुजुर्ग के लिए तरसते हैं हम। जिन्हों ने बुजुर्गों का साया देखा है वे ही जान सकते हैं उन का महत्व।

राज भाटिय़ा said...

बुज़ुर्ग दिवस मेने तो कभी नही मनाया, हमेशा हमारा दिन हमारे बुज़ुरगो के कहे अनुसार ही शुरु होता है, यह दिन शायद गुलाबी चड्डी वाले ही मनाते होगे, अभी तो धीरे धीरे कई दिन आयेगे, जेसे पति दिन, पत्नि दिन, बेटा दिन.... ओर पता नही...
आप ने बहुत अच्छि तरह से लिखा है, ओर आज बुजुर्गो की हालत बिलकुल ऎसी ही है.
धन्यवाद

समयचक्र - महेंद्र मिश्र said...

भाई हम तो बुजुर्गो की छाया के लिए तरसते है . कम इ कम आपने शिद्दत से बुजुर्गो को याद तो किया .

समयचक्र - महेंद्र मिश्र said...

भाई हम तो बुजुर्गो की छाया के लिए तरसते है . कम इ कम आपने शिद्दत से बुजुर्गो को याद तो किया .

ज्ञानदत्त पाण्डेय | Gyandutt Pandey said...

बहुत देर से पता चला - शाम को। देखूं, मां-पिताजी क्या कर रहे हैं!

कुलवंत हैप्पी said...

खूब लिखा है, आपने किसीने याद तो किया।
आज बाबा को फ्री करने का प्लान बनाया पाँच बहूओं ने, सुबह बाबा उठे पहले बड़ी बहू बोली पापा जी आप भैंसों थोड़ा चारा डाल दो, फिर आप बिल्कुल फ्री, पापा ने जल्द से जल्द वो काम निपटा दिया। फिर दूसरे नम्बर की बहू बोली..बापू जी बच्चों को छोड़ आओ स्कूल फिर आप आराम कर लेना, आज बुजुर्ग डे है, बच्चों को छोड़कर लौटा तो तीसरी बहू बोली, बापू जी खेतों में उनका खाना दे आओ, फिर आप फ्री,,आप बापू खेत पहुंचा, बेटे बोले बापू जी खाना तो यहां रख दो.. मैं पानी की मोटर को ठीक कर रहा हूं, आप थोड़ा सा हरा चारा काट लें, बापू हरा चारा काट कर घर पहुंचा ही था कि शाम हो गई, फिर भैंसों को हरा चारा डालने का समय हो गया। पूरा दिन गुजर गया बाबा फ्री तो नहीं हुआ, लेकिन दिन निकल गया सुनते सुनते फिर आप फ्री बाबा जी...

पं.डी.के.शर्मा"वत्स" said...

जब दिलों में ही सम्मान नहीं रहा तो फिर इन ढकोसलों मे भी क्या रखा है!!!!!
वैसे भाटिया जी ने सही कहा है कि आगे चलकर शायद पति डे,बीवी डे, अडोसी डे-पडोसी डे भी जल्द ही शुरू होने वाले हैं...

शरद कोकास said...

बुज़ुर्गो का साया जिनके सर पर है उनसे ज़्यादा सुखी और कौन है ।

काजल कुमार Kajal Kumar said...

श्रवण कुमार !
Who श्रवणा ?
Hallo, whom r u taking MAN....!

सतीश सक्सेना said...

बहुत आवश्यक विषय है, अच्छा लगा आपकी संवेदनशीलता को महसूस कर ! मैं खुद उन अभागों में से हूँ जिनकी किस्मत में बुजुर्गों का हाथ नहीं है ! आशा है इस विषय पर आगे भी लिखेंगे ! शुभकामनायें !

काजल कुमार की टिप्पडी बहुत अच्छी और सामयिक है !!

सतीश सक्सेना said...

बहुत आवश्यक विषय है, अच्छा लगा आपकी संवेदनशीलता को महसूस कर ! मैं खुद उन अभागों में से हूँ जिनकी किस्मत में बुजुर्गों का हाथ नहीं है ! आशा है इस विषय पर आगे भी लिखेंगे ! शुभकामनायें !
काजल कुमार की टिप्पडी बहुत अच्छी और सामयिक है !!

Dr. Mahesh Sinha said...

अब तो दिन भी कम पड़ रहे हैं वैश्विक बाजारीकरण में . एक ही दिन कई दिवस मनाये जा रहे हैं . अगला पड़ाव घंटो का होगा