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Friday, October 2, 2009

बापू, कमीनों ने होर्डिंग की तरह चौक-चौराहो पर लटका दिया है

बापू आज आपका हैप्‍पी बड्डे है। इसलिए आज आपको नहला-धुलाकर तैयार किया गया है। आप सोचते होंगे कि आपको देश के लोग कितना प्‍यार करते हैं, कितना सम्‍मान करते हैं, जो चौक-चौराहों पर आपको बिठाकर रखा है। बापू आपको गलत फहमी है। इन कमीनों ने आपको अपनी विचारधारा बेचने के लिए और नेतागिरी की दुकान चलाने के लिए होर्डिंग्स की तरह इस्‍तेमाल किया है। आप नेताओं के लिए मॉडल से ज्‍यादा कुछ नहीं हैं। सॉरी बापू आपको ये खरी-खरी खराब लग रही होगी, लेकिन क्‍या करूँ मजबूरी में आपको बता रहा हूं। पिछले साल भी आपके बड्डे पर आपको नहलाने-धुलाने की ड्यूटी मुझे मिली थी। इस बार भी मुझे ही जबरन ये ड्यूटी थमाई गई है। मेरी पिछले साल भी इच्‍छा नहीं थी और इस बार भी वही हालत है।सरकारी छुट्टी के दिन के काम करने का सोच कर मेरी हालत खराब हो रही है और मुझे सुबह-सुबह आपको नहलाना पड़ रहा है। मजबूरी है नौकरी का सवाल है। वैसे बापू मैं आपकी दिल से इज्‍जत करता हूं, इसलिए मजबूरी में ही सही मैं आपकी साफ-सफाई पूरी ईमानदारी से करता हूं।
याद है आपको पिछले साल जब मैं आपको नहलाने आया था, तो आपका चश्‍मा गायब था। मैंने जब चश्‍मा चोरी होने की बात साहब लोगों को बताई तो उन्‍होंने मुझे कितना डांटा था। बड़ी मुश्किल से आपकी पसंद का मॉडल ढूंढ-ढांढकर लाया गया था और जितनी परेशानी चश्‍मा ढूंढने में साहब लोगों को हुई थी, उतनी ही ज्‍यादा गालियां मुझे खानी पड़ी थी और साथ में चेतावनी भी मिली थी। वो तो अच्‍छा हुआ सारे अख़बार वाले और न्‍यूज चैनल वाले हमेशा की तरह सो रहे थे और उन्‍हें इस बात का पता नहीं चला, वरना मेरा सस्‍पेंशन पक्‍का था। खैर छोड़ों पुरानी बातें बापू कोई मतलब नहीं इनका। आपको तो पता भी नहीं कि जो चश्‍मा आपको पहनाया गया उसके शीशों पर दुनिया भर के स्‍क्रैच लगे हुए थे। कबाड़ खाने में पड़ा हुआ था वो। और आपको पता चलता भी तो क्‍या फायदा होता। क्‍या आप अच्‍छे और साफ-सुथरे शीशों वाले चश्‍मे से वो सब देख पाते जो आज देश में हो रहा है। देश के अधिकांश शहरों में सड़कों पर खून बिखरा हुआ है। क्‍या आप वो देख पाते। अच्‍छा, तो ये बात है। मुझे अब समझ में आ रहा है कि आप खराब शीशों की शिकायत क्‍यों नहीं करते। समझा, दरअसल आप वो सब देखना ही नहीं चाहते, जो देश में हो रहा है। इसकी तो आपने सपने में भी कल्‍पना नहीं की होगी।
जभी मैं सोचूं कि साला इत्‍ते सालों से आप खामोश कैसे बैठे हैं। इतने लफड़े-दफड़े, दंगे-फसाद देखकर भी आप उपवास करने क्‍यों नहीं गए। खैर, जाते भी तो भी आपको कोई जूस पिलाने तक नहीं आता और वैसे भी चौक-चौराहों पर बैठे-बैठे आप उपवास ही तो कर रहे हैं। अरे, ये तो मैंने सोचा ही नहीं। बापू मुझे माफ करना। आप तो अपनी पुरानी स्‍टाईल से ही काम कर रहे हैं। कमीनों की हरकतें देखकर आप लगता है इस दुनिया को छोड़ने के साथ ही उपवास करने के लिए आइडिया लगाकर चौक-चौराहों पर उपवास पर बैठ गए थे। बापू, आपकी सहनशीलता तो मानना ही पड़ेगा। देश को आज़ाद करा दिया, मगर साले देशवासियों ने आपको चौक-चौराहों पर जंजीरों के घेरों से कैद कर दिया है। आपको शो-पीस बना दिया। आपको देखने-दिखाने की चीज बना दिया। आपको विचारधारा बेचने का विज्ञापन बना दिया। आपको नेतागिरी की मार्केटिंग का मॉडल बना दिया। आपको जुलूस और धरना देखने वाला दर्शक बना दिया। आपको होर्डिंग की तरह लटका दिया है इन कमीनों ने। और आप हैं बापू खामोशी से सब सह रहे हैं। हमारे शहर में विपक्ष के जितने धांसू नेता हैं सबके-सब एसी कार में चलते हैं। पैदल चलने का तो उनको मौका ही नहीं मिलता। कभी-कभार रैली, जुलूस में एकाध घंटा पैदल चल लेते हैं तो दूसरे दिन ही बयान जारी कर देते हैं कि शहर को धूल और धुएं से बचाना होगा। प्रदूषण से जीना दूभर हो गया है शहर वासियों का। बताओ कितने एहसान फरामोश हैं ये लोग। साले कार में घूमते हैं और धूल-धुएं की बात करते हैं। जो वोट देते हैं उस जनता की चिंता करते हैं और जिसने वोट देने का अधिकार दिलाने के लिए आज़ादी दिलाई, उसकी रत्‍ती भर फिकर नहीं। धूल फांकते बैठे हो आप चौक-चौराहों पर। साल में एक बार साफ कराते हैं साले। आप भी बापू धन्‍य हैं। सालों से धूल-धुआं खा रहे हो और खामोश बैठे हो। आपकी जगह कोई और होता तो दमा-अस्‍थमा का शिकार होकर खांस-खांसकर मर जाता साला। लेकिन आपका अपने बच्‍चों के प्रति प्‍यार मानने लायक है।
भगवान शंकर के बाद एक आप ही नज़र आते हो, जो विष पीकर भी कल्‍याण की सोच रहे हो। इसके बाद भी बापू, कमीनों को ज़रा भी शर्म नहीं आती। अब आपको क्‍या बताऊं। मेन चौक-चौराहों पर तो आपकी हालत ठीक है लेकिन सुनसान इलाकों और बगीचों में आपकी पोजिशन बहुत ज्‍यादा खराब है। आपको साफ करते समय पक्षियों की बीट की दुर्गंध से ऐसा लगता है कि उल्‍टी हो जाएगी। पता नहीं आप क्‍यों सबको माफ किए जा रहे हो। कमीने अपने लिए नया-नया दफ्तर बनवा लेते हैं, लेकिन आपके सर पर एक छोटा सा शेड नहीं बनवाते। उसमें कुछ बचेगा नहीं न। क्‍यों बनवाएंगे फिर। मोटी कमाई का प्‍लान बने तो आपको कहीं पर भी बिठाकर करोड़ों रूपया जीम जाएंगे, लेकिन पुरानी जगह जहां आप सालों से बैठे हो वहां साले फूटी कौड़ी खर्चा नहीं करते। जाने दो बापू, और अंदर की बात बताऊंगा तो आप शायद नाराज़ होकर कल हार पहनाने आने वालों को अपनी ही लाठी से पीट दोगे। मज़ाक नहीं कर रहा हूं। सच बोल रहा हूं। आप बोलोगे कि मैंने अहिंसा के दम पर अंग्रेजों को ठीक कर दिया, लेकिन किसी पर हाथ नहीं उठाया। तो बापू वो सफेद अंग्रेज थे उनमें थोड़ा-बहुत ईमान था, ये तो साले काले अंग्रेज हैं इनमें कोई ईमान-धीमान नहीं है। दूसरे, ये लातों के भूत हैं, बातों से तो मानते ही नहीं। अब देखों न, हर साल आपके जन्‍मदिन पर ईश्वर अल्‍लाह तेरो नाम भजते हैं और साल भर साले दंगा-फसाद करते हैं। ये अहिंसा-फहिंसा आपके साथ ही दुनिया से निकल ली बापू। उसको पता था जब देश में आपकी कदर नहीं होने वाली, तो उसकी क्‍या कदर होगी। अहिंसा की जगह उसकी कजिन हिंसा छाई हुई है। दरअसल आपका और आपकी अहिंसा का मीडिया मैनेजमेंट बड़ा पूअर रहा। भला बकरी की दूध की चाय पीकर कोई आपको या आपकी अहिंसा को कितना हाईलाइट करता। वैसे भी आजकल कॉकटेल का ज़माना है और हिंसा की मार्केटिंग सिमी, बजरंगदल, ठाकरे ब्रदर्स, अर्जुन सिंह और यादव ब्रदर्स जैसी जानी-मानी मल्‍टीस्‍टेट कंपनियां कर रही है। ऐसे में हिंसा के सामने अहिंसा कहां टिकती। इसीलिए कह रहा हूं कि आप भी सालों को अपनी ही लाठी से पीटने पर मजबूर हो जाते। बहुत ही कमीने हैं बापू ये लोग। सड़कों पर चौक-चौराहों पर बिठा दिया है आपको और कमरों में दीवार पर लटका दिया है आपको।
क्‍या बताऊं बापू इतना दिमाग खराब होता है जब सरकारी दफ्तरों में आपकी तस्‍वीर के नीचे बैठा साहब या नेता बिना शर्माए हरामखोरी करते हैं। आपने कहा था बापू की ज़रूरत से ज्‍यादा जमा करना चोरी है। यहां तो कई पीढ़ी के लिए इंतजाम कर रहे हैं लोग। चोरी नहीं डाका डाल रहे हैं फिर भी पेट नहीं भर रहा है उनका। और सब हो रहा है आपकी तस्‍वीर के नीचे। संसद में भी जो हुआ बापू। वो आपने देखा। आपने सोचा भी नहीं होगा कि सांसद संसद में नोटों की गड्डियां दिखाएंगे। छोड़ो बापू आपके चक्‍कर में बेमतलब मैं इमोश्‍नल हो रहा हूं। रगड़-रगड़के आपको नहलाने का मुझे ईनाम नहीं मिलने वाला। पिछले इतवार को मैंने बड़े साहब की कार धोई थी तो साहब ने मुझे खुश होकर नीला वाला गांधी यानि सौ का नोट दिया। उसके पहले वाले इतवार को मेम साहब के प्‍यारे-दुलारे पप्‍पी को नहलाया था, तो मेम साहब ने भी खुश होकर मुझे नीला गांधी यानि सौ का नोट ईनाम में दिया था। काम भी उतना नहीं था यहां तो बस सेवा ही है मेवा तो कुछ मिलना नहीं है। एक तो टाईम खोटा करो, ऊपर से इमोश्‍नल अलग हो रहा हूं। ठीक है, बापू इसे मैं समाज सेवा के एकाउण्‍ट में डाल दे रहा हूं। फायदा कुछ होना नहीं है अब अगले साल आऊंगा बापू आपको नहलाने कोई अच्‍छी ख़बर होगी तो बताऊंगा ज़रूर। तब तक आप चौक-चौराहों पर उपवास करते रहिए। बुरा मत मानना भावना में बहकर कोई गलत बात कह गया होऊंगा तो।
आपका अपना
गरीबदास फकीरचंद गांधी
रायपुर (छतीसगढ)
क्षमा सहित रिठेल पोस्ट्।
बापू के लिये आज इससे ज्यादा कुछ और नही कहने के लिये मेरे पास्।

18 comments:

Arvind Mishra said...

इसी लिए तो पुदस्कर भाई गांधी गए और अपनी क्षद्म औलादे छोड़ गये!

ज्ञानदत्त पाण्डेय | Gyandutt Pandey said...

गरीबदास फकीरचंद गांधी से सहानुभूति सहित!

apurn said...

muje laga faltu ka lekh hoga.
But pura padhne k bad badhiya laga
bahut sahi
desh ki isthiti ko sahi darsha raha hai ye vyang. shayad sabki samjh me na aaye par sahi hai

बी एस पाबला said...

देश का सटीक चित्रण

बी एस पाबला

महफूज़ अली said...

Sahi kah rahe hain aap.......... Bapu ki aisi haalat dekh ke ab rona aata hai......... naam to sab log cash karte hain Bapu ka...........

Arvind ji sahi kah rahe hain.......... इसी लिए तो पुदस्कर भाई गांधी गए और अपनी क्षद्म औलादे छोड़ गये.......

Suresh Chiplunkar said...

गाँधी नाम सुपर-डुपर हिट है, और अगले 50-100 साल और रहेगा, विश्वास नहीं आता क्या…
अरे, प्रियंका के बच्चों का नाम बताओ भाई कोई, पुसदकर जी को… गाँधी ही रहेगा, वढेरा नहीं।

एकलव्य said...

बहुत सही लोगो ने कमाई करने के लिए होर्डिंग पे लटका दिया है . कितने दुखी होंगे लटकने पे बेचारे . कोई उनके नाम की महज लगोटी तो कोई मंहगे पेन ... लोग क्या क्या नहीं कर रहे है अपने प्यारे बापूजी के नाम पर. ....

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

बहुत सुन्दर और समसामयिक पोस्ट है।

महात्मा गांधी जी और
पं.लालबहादुर शास्त्री जी को
उनके जन्म-दिवस पर नमन।

Rakesh Singh - राकेश सिंह said...

अब तो गाँधी के नाम से कोई परयोजना भी आरम्भ नहीं होती .... जीभ फिसल गई भूल गया था की राजीव, सोनिया, राहुल भी तो आखिर कर गाँधी ही हैं | और ये गाँधी नाम भी तो गाँधी जी ने ही दिया था .... शायद अब गाँधी जी खुश होंगे उनके नाम से नए projects ना सही पर उन्ही का दिया नाम से तो है ............

lalit sharma said...

माल खाये गन्गाराम अऊ मा खाय मनबोध
अईसने होवत हे गा भैया हमर सियान मन के दुरगति,अऊ कोन ला कहाय गान्धी बबा हा अपन पीरा ला,वो हा लन्गोटी मा घुमिसे अऊ जौउन गान्धी वादी हवन कहात हे ते मन बोरा धर के घुमत हे खिसा हा घलो कमती पर गे हवय,एको दिन ता बबा हा रिसातिस अऊ ये मन ला उही डन्डा मा सोझियातिस,
बने कहे हवय गरीब दास हा, परसतुत करे बर आपो हा जोहार लेहु,

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

अब क्या कहें? सब कुछ तो आप ने कह दिया है।

शरद कोकास said...

काश बापू यह सब सुन सकते । आप को फिर उनका चश्मा ढूँढना पड़ेगा ना ?

पी.सी.गोदियाल said...

पते की बात कह डाली आपने, बहुत खूब !

राज भाटिय़ा said...

इस सच के लिये आप का धन्यवाद

संजय बेंगाणी said...

गाँधी खूद सत्ता से दूर रहे मगर अपने नाम को सत्ता सौंप गए....

Udan Tashtari said...

गरीबदास फकीरचंद गांधी को नमन पहुँचे.

safat alam said...

महात्मा गांधी जी और
पं.लालबहादुर शास्त्री जी को
उनके जन्म-दिवस पर नमन।

Dr. Mahesh Sinha said...

क्या अनिल , काम की चीज लोग रख लेते हैं बेकार छोड़ देते हैं . देखो अभी भी धरना , प्रदर्शन , बंद जारी है भले ही मतलब बदल गया हो पहले यह देश लिए होता था अब अपने स्वार्थ के लिए . पहले आन्दोलन जनता की तकलीफ दूर करने के लिए होता था अब तकलीफ देने के लिए . न जाने कब तक इस देश की जनता अपनी सहिष्णुता की परीक्षा देती रहेगी . पहले तो हाकिम विदेशी था अब देशी पैदा हो गए