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Saturday, January 9, 2010

मेधा पाटकर समेत आधा दर्ज़न मानवाधिकारवादी पर प्रायोजित हमला हुआ और पुलिस तमाशाई की तरह खड़ी देखती रही

मेधा पाटकर समेत आधा दर्ज़न मानवाधिकारवादी छत्तीसगढ के नक्सल प्रभावित बस्तर इलाके के दौर पर आये हुये थे।उनपर बस्तर के दन्तेवाड़ा मे अंडे फ़ेंके गये और धक्का-मुक्की भी की गई।वंहा पर मामला स्थानीय वर्सेस बाहरी पत्रकार बनाने मे पुलिस सफ़ल रही।और ऐसा ही कुछ प्रायोजित कार्यक्रम रायपुर मे भी होना था पर प्रायोजकों ने जगह गलत चुन ली।उन्होने प्रेस क्लब के सामने तमाशा खड़ा करना चाहा जिसका मुझे पहले ही अंदेशा था और इसलिये मैं घण्टे भर से ज्यादा समय वंही टिक कर बैठा रहा।पुलिस इस दौरान तमाशाई बनी खड़ी देखती रही और पुलिस का काम मुझे और मेरे साथियों को करना पड़ा।हम लोगों ने प्रदर्शनकारियों को जैसे तैसे हटाया और मानवाधिकारवादियों को उनके घेरे से निकाल कर रवाना किया।
मेधा पाटकर,संदीप पाण्डेय और अन्य लोगों की ओर से कल से ही प्रेस कान्फ़्रेंस की अनुमती मांगी गई थी जिसे न देने का आग्रह,अनुरोध से लेकर दबाव मुझपर पहले से बनाने की कोशिश हो रही थी।इससे पहले बस्तर मे मेधा के साथ दिल्ली से आई पत्रकार का दन्तेवाड़ा के पत्रकारों से विवाद हो चुका था और मामला पुलिस थाने तक़ पहुंच गया था।मानवाधिकारवादियों से परेशान पुलिस ने इस मामले को हवा दी और मानवाधिकारवादियों पर अंडे फ़िंकवाये और उन पर हमला करवा दिया।इस मामले को और तूल देने की कोशिश की गई।
इसी के तहत यंहा भी उनको बिना प्रेस कान्फ़्रेंस लिये विरोध करवा कर रवाना करने की योजना बनाई गई थी,जो मेरे प्रेस कान्फ़्रेंस की अनुमति देने से फ़ेल हो गई।इसके बाद प्रेस कान्फ़्रेंस लेने पहुंची मेधा पाटकर का विरोध करने के लिये प्रायोजित कार्यक्रम के तहत यंहा आश्रम मे रखे गये नक्सल वारदात मे मारे गये लोगों के बच्चों को सामने रखकर मेधा और उनके साथियों पर हमले की तैयारी थी जिसकी मुझे भनक लग गई थी।

मैं समय से पहले प्रेस क्लब मे जाकर जम गया।आधे घण्टे चलने वाली प्रेस कान्फ़्रेंस डेढ घण्टे चली और उसके बाद इलेक्ट्रानिक मीड़िया वालों का बाईट लेने का प्रोग्राम।सब खतम होने से पहले मैने संदीप पाण्डेय से बात की और उन्हे सारी स्थिती समझाई।गेट पर खड़ी भीड़ को देख कर वे भी सब समझ गये उसके बाद मेधा से बात कर उन्हे समझाने की कोशिश की गई।वे शुरु से लेकर आखिर तक़ यही कहती रही मैं उनसे बात करना चाह्ती हूं,लोग क्या कहेंगे मेधा बच्चों से बात किये बिना चली गई।मैने जब उनसे कहा वे बात करने आप का विरोध करने आये हैं तब जाकर वे बड़ी मुस्किल से कार मे बैठ कर सीधे रवाना होने के लिये तैयार हुई।इस बीच पुलिस को बार-बार सूचना दी गई।सबसे चौंकाने वाली बात तो ये है कि प्रेस क्लब के ठीक सामने सड़क के दूसरी ओर पुलिस की चौकी है।खैर पुलिस को नही आना था सो नही आई।

तब मैं खुद बाहर निकला और दरवाज़े पर खड़ी भीड़ का नेतृत्व कर रहे लोगों से रास्ता छोड़ने के लिये कहा।पहले तो वे माने नही फ़िर जब मैंने ज़ोर ज़बर्दस्ती करने की बात कही तो किनारे खड़े होकर नारेबाज़ी करने पर मान गये।इस बीच मामला प्रेस क्लब और प्रदर्शनकारियों के बीच फ़ंसते देख पुलिस का थानेदार अपनी टीम के साथ वंहा आ गया मगर वो सिर्फ़ शो-पीस ही बना रहा।सब तय होने के बाद मैंने मेधा और उनके साथियों को कार मे बैठ कार रवाना होने के लिये राज़ी किया और खुद साथ सामने जाकर रास्ता साफ़ करने की एक बार फ़िर कोशिश की।इस बीच प्रायोजित प्रदर्शनकारी भी किनारे खड़े होकर मेधा का इंतज़ार करने लगे और जैसे ही मेधा का काफ़िला गेट पर पंहुचा उन्होने बच्चों को कार के सामने कर दिया और नारेबाज़ी शुरू कर दी।इस स्थिती के लिये मैं पहले से तैयार था।सो मैं और मेरे साथियों ने सीधे प्रदर्शनकारीयों को धकेलना शुरु किया और गुस्से मे मैने उन्हे गालियां भी बकी।तब तक़ स्थिती बिगड़ने की आशंका से किनारे खड़ी तमाशा देख रही पुलिस भी भीड़ मे शामिल हो गई।लेकिन उनका इंतज़ार किये बिना ही प्रेस क्लब की टीम ने सब को धकिया कर पीछे किया और मेधा के काफ़िले को वंहा से रवाना किया।उनके रवाना होने के बाद ही सबने चैन की सांस ली और क्लब आये मेहमान को एक प्रायोजित हमले का शिकार होने से बचा लिया।

20 comments:

प्रमोद ताम्बट said...

यह जन आंदोलन की शक्ति से घबराकर उठाया गया कदम है। लोकतांत्रिक व्यवस्था का फायदा उठा रहे शासक प्रशासक नहीं चाहते कि उनकी असलियत आम जनता के सामने आए इसलिए जन आंदोलन को बदनाम करने का कुत्सित प्रयास किया जा रहा है।

प्रमोद ताम्बट
भोपाल

अफ़लातून said...

रायपुर प्रेस क्लब ने जिम्मेदार भूमिका निभाई , बधाई ।

राज भाटिय़ा said...

क्या यही है सच्चा लोक तंत्र, ओर हमारी साथी यह पुलिस?कई बार तो लगता है हमारे यहां सब बिकाऊ है, लेकिन सचाई को कब तक दबाया जायेगा, जब यही भीड सच्ची को पहचानेगी तो उस समय केसी सिथित होगी,आप के लेख से बहुत सी जानकारी प्राप्त हुयी, धन्यवाद

ali said...

आपकी रिपोर्ट पढ़ कर हमने भी चैन की सांस ली !

ज्ञानदत्त पाण्डेय Gyandutt Pandey said...

यह तो खबर है! मैं सोचता था कि प्रायोजन-स्टण्ट मानवाधिकारवादियों के वर्चस्व की चीज है!

भारतीय नागरिक - Indian Citizen said...

काहे की पुलिस, काहे की व्यवस्था. धर्मनिरपेक्षियों की भैंस.

लोकेश Lokesh said...

प्रमोद ताम्बट जी से शब्दश: सहमत

Arvind Mishra said...

गुड एंड ग्रेट वर्क पुसदकर साहब !ब्रैवो एंड हैट्स आफ!

महेन्द्र मिश्र said...

निंदनीय घटना है .....

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

आप की भूमिका का कोई सानी नहीं। लोग यूँ ही आप के फैन नहीं हैं।
मुझे लगता है कि पत्रकार बाहर के या छत्तीसगढ़ के का विवाद बेमानी है। बाहर के पत्रकार आ कर असलियत देखेंगे तो वही प्रकाशित होगी। छत्तीसगढ़ के पत्रकारों को उस से क्या आपत्ति होनी चाहिए?
सरकार राजनैतिक होती है, लेकिन उस का व्यवहार राजनैतिक नहीं होना चाहिए, लेकिन कोई सरकार नहीं देश में जिस का व्यवहार राजनैतिक न हो।
मेधा और संदीप की अपनी राजनीति है।
मुझे तो दुख और अवसाद इस का है कि नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में नक्सल राजनीति को प्रतिस्थापित करने वाली राजनीति क्यों नहीं पनप पा रही है।

कलम के सिपाही said...

ये तथाकथित मानवाधिकारवादियों की धोखाधड़ी लोगों के सामने उजागर हो चुकी है। दो दिन पहले संदीप पांडे और मेधा पाटकर दंतेवाड़ा भी गए थे वहां पुलिसिया जुल्म सह रहे आदिवासियों ने उन्हें घेर लिया। खबर तो यह भी है कि उन्हें तमाचा भी जड़ दिया गया। लेकिन यह सब क्यों? हो रहा है क्योंकि इन लोगों ने जनता के साथ धोखाधड़ी की है सिर्फ अपनी राजनीति चमकाने के लिए।
१९९८ में पोखरण में परमाणु विस्फोट के खिलाफ संदीप पांडेय ने पोखरण से सारनाथ तक की पैदल यात्रा की थी। उसमें जो लोग शामिल हुए उन्हें बाद में पता चला कि उस पूरी यात्रा को ब्रिटेन की फंडिंग एजेंसी आक्सफेम ने प्रायोजित किया। ये रंगे हुए मानवाधिकारी हैं। जनता को धीरे धीरे हकीकत मालूम हो रहा है... जनता अपने साथ हुए धोखे का बदला लेगी ही

मनोज कुमार said...

अच्छी जानकारी। धन्यवाद।

डॉ महेश सिन्हा said...

यहाँ भी नजर डालें
अतिथि देवो भव का धर्म आपने निभाया. लेकिन इससे इन तथाकथित मानवाधिकार वादियो का सच तो नहीं छुप सकता .

Anonymous said...

भाऊ, आपसे यह आशा नहीं थी... आज बहुत बुरा लगा.

प्रवीण शाह said...

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आदरणीय अनिल जी,

प्रेस क्लब आये मेहमान को एक प्रायोजित हमले का शिकार होने से बचा लिया।

आपने एक जिम्मेदार मेजबान का धर्म निभाया, बधाई!


लेकिन यह भी कहूँगा कि मेधा पाटकर और संदीप पान्डेय जैसे तथाकथित मानवाधिकारवादी भी अनेकों ऐसे ही प्रायोजित धरने, प्रदर्शन आदि आदि आयोजित करवाते ही रहते हैं Dubious Funding के दम पर... नर्मदा बाँध को सालों पीछे ले जाने में इनकी भूमिका कतई गलत थी। राष्ट्रहित के अन्य कई मुद्दों पर भी इनका स्टैंड बेहद निराशाजनक है... देर सबेर बेनकाब होकर रहेंगे ये लोग...

बस्तरिहा said...

यह एक ब्लॉगर के मियाँ मिट्ठू का सच्चा बयान है । वैसे यह ब्लॉगर वहीं है जो ऐसे छद्ममानवाधिकारवादियों के खिलाफ़ जमकर लिखते रहे हैं । अतः सिर्फ़ इसी कमेन्टस से मानवाधिकार के बहाने हिंसात्मक सच्चाई से मुँह मोडकर माओवाद का समर्थन करनेवालों को खुशफहमी हो सकती है, फायदा नहीं.....

काजल कुमार Kajal Kumar said...

वाह ! तो इसका मतलब है कि पुलिस ने अपनी ड्यूटी इस बार भी मुस्तैदी से निभाई.

शरद कोकास said...

मुझे तो यही लगता है कि यदि कुछ अप्रिय घतना हो जाती तो हमारी क्या छवि बनती ?

bhart yogi said...

maheman jo hamara hota hai o jan se pyara hota hai ,,,,
mai aese bhi aapka samrthak hu,,,lekin aapko nahi malum tha ki dantevada me 6 janvri ko ye log lokal media ko bikau bolkar aaye the,kyoki aaj 17 janvari ko aap inke khilaf hai,jabki 9 janvari ko aap bachao ki mudra me the,,,aap ne hi likha hai ki virodh karne vale chahate the bina pressvarta ke chale jaye ,,,,

bhart yogi said...

maheman jo hamara hota hai o jan se pyara hota hai ,,,,
mai aese bhi aapka samrthak hu,,,lekin aapko nahi malum tha ki dantevada me 6 janvri ko ye log lokal media ko bikau bolkar aaye the,kyoki aaj 17 janvari ko aap inke khilaf hai,jabki 9 janvari ko aap bachao ki mudra me the,,,aap ne hi likha hai ki virodh karne vale chahate the bina pressvarta ke chale jaye ,,,,