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Thursday, June 3, 2010

ढोकला सिर्फ़ आपको ही नही हमे भी अच्छा लगता है!

ढोकला!सुनते ही मुंह मे पानी आ जाता है।नर्म और ताज़े ढोकले हो और दोस्तो का साथ हो तो फ़िर कहना ही क्या है!ढोकला अब गुजरात की डिश नही रह गया है और इसकी डिमांड हर जगह होने लगी है।ढोकले की दावत उड़ाने मे कोई पीछे नही रहता।ढोकला अब एक कामन और पाप्यूलर डिश बन गया है और बिना इसके नाश्ते का मज़ा ही नही आता।प्रेस क्लब मे भी सारे सदस्य जब ढोकले पर हाथ साफ़ कर रहे थे तो हमारे क्लब मे ही हमेशा मटरगश्ती करने वाले एक सज्जन जो क्लब के सदस्य नही है पास मे ही धींगा-मस्ती करते नज़र आये।फ़ोटोग्राफ़र राजेश सोनकर का ध्यान उन पर गया तो वो समझ गया कि उन महाशय को भी ढोकला चाहिये।सो राजेश ने उन्हे ढोकला आफ़र कर दिया और उन्होने भी ढोकले पर हाथ साफ़ करके बता दिया कि ढोकला सिर्फ़ हमे नही उन्हे भी बहुत पसंद है।आप खुद देख लिजिये कैसे मज़े से चट्खारे ले-लेकर ढोकले का स्वाद लिया जा रहा है।

Tuesday, February 2, 2010

अब पता चल रहा है कि ब्लागर दो प्रकार के होते हैं,उन्हे ढोया जा सकता है और उन्हे दिखा कर बल-प्रदर्शन भी किया जा सकता है।

ब्लागर मीट के रोचक अनुभव:मुझे तो अब तक़ पता ही नही था कि नेताओं की तरह ब्लागर भी दो प्रकार के होते हैं।एक जबर्दस्त और दूसरा जबरदस्ती।इतना जबरदस्त ज्ञान हमको मिला रायपुर ब्लागर मीट के बाद समुद्र मंथन टाईप विचार मंथन से।मैं तो खुद को भाग्यशाली समझ रहा हूं जो मीट मे चला गया वर्ना ऐसे महान विचारक और जबरदस्त ब्लागर से पता नही कब और कैसे मुलाकात हो पाती।

वैसे उन जबर्दस्त ब्लागर भाई के बारे मे किसी को कुछ बताने का इरादा न था और ना है।वे खुद ही अपने बारे मे बता चुके हैं और हो सकता है फ़िर बता दें आखिर वे ठहरे जबरदस्त ब्लागर।हम लोग तो लगता है उनकी परिभाषा के अनुसार दूसरी केटेगरी मे आते हैं यानी जबरदस्ती ब्लागर।ये क्लासीफ़िकेशन तो समझ मे आ गया गुरूजी मगर ये बात समझ मे नही आई कि जबरदस्ती ब्लागर अपना लिखा दूसरों को जबरदस्ती कैसे पढा सकता है?बस इतनी सी शंका है अगर इसका निवारण हो जाये तो हम जबरद्स्ती ब्लागर उन उपायों पर चलकर लोगों को जबरिया पढवा-पढवा कर हो सकता है एकाध दिन जबरदस्त ब्लागरत्व को प्राप्त कर सकें।

एक निवेदन है गुरुजी जो कुछ बतायें सारी दुनिया को अपने ब्लाग पर बतायें तो अच्छा लगेगा।वरना पिछली सारी बातें आपने साथी ब्लागर के ब्लाग पर कमेण्ट के रूप मे बताई थी जो मुझे लगा कि सबको पता चलना चाहिये इसलिये मुझे गड़े हुये मुर्दे उखाड़ना पड़ रहा है।वैसे एक बात मुझ नासमझ जबरदस्ती ब्लागर को और समझ मे नही आई कि आखिर आपको कौन सा ब्लागर ढोकर लाया गया दिखा।मेरे खयाल से वंहा जितने भी जबरदस्त और आपके हिसाब से ज्यादातर जबरदस्ती ब्लागर आये थे सब अपना बोझ खुद ढोने मे सक्षम थे।कौन ऐसा था जो बोझा था और किसे किसने ढोकर लाया ये भी थोड़ा स्पष्ट हो जाता तो बड़ी कृपा हो जाती,मेरा भी ज्ञान बढ जाता।

हां एक बात और आपने बताया है कि आपको वंहा भीड़ चुनावी रैली की तरह नज़र आई।भई हम तो समझ नही पाये कि चुनावी रैली की ज़रूरत किसे है और चुनाव होने कंहा है।हम तो शुरू मे कम उपस्थिती देख कर निराश हो गये थे और सारे अतिथी ब्लागरों से सम्पर्क कर उनके आने के बारे मे पता लगाने के लिय साथियों से कहते रहे।जब सबके आने का पता चला तब जाकर मन शांत हुआ।इसी कारण कार्यक्रम निर्धारित समय से आधा घण्टा देर से शुरू हुआ।अब आप ही बताईये जबरदस्त भैया कि जंहा लोगों के आने का इंतज़ार किया जा रहा हो वंहा चुनावी रैली जैसी भीड़ आपको कंहा से नज़र आ गई।मैं आपकी इस दूसरी(पहली कल बता चुका हूं)मनुष्यों मे नही पाई जाने वाली इंद्रिय का कायल हो गया हूं।

एक बात और किनके ब्लाग नही थे जिन्हे ब्लागर बताया गया ज़रा इस राज पर से भी पर्दा उठा देते तो हृदय गार्डन-गार्डन हो जाता और फ़िर उसकी घास पर बैठ कर चना खा लेते।मेरे खयाल से जितने लोग आये थे सभी ब्लागर थे और सबको बोलने का मौका भी दिया गया।किसी जबरदस्त ब्लागर को बोलने जबरद्स्ती रोका नही गया और ना ही किसी जबरदस्ती ब्लागर को जबरदस्ती बोलने के लिये कहा गया।आपको समोसे मे धन्ना सेठ के रूपयों की बू या बदबू जो भी आ रही थी आप उसी समय कहते तो बहुत अच्छा लगता।आप वंही पर बताते कि आपके अलावा और कौन-कौन जबरद्स्त ब्लागर है तो बहुत से लोग अपनी-अपनी पोस्ट पर आपके यशगान मे रहमान को बीट कर चुके होते।किसे ढोकर लाया गया है ये बता देते तो आपको हाथों-हाथ उठाया लिया जाता।मगर मुझे मालूम है आपको ज्यादा प्रशंसा प्यारी नही है।खैर जाने दीजिये आपको न सही,मुझे नही सही,जबरदस्त को न सही,जबरद्स्ती को न सही बाकी लोगों को तो बहुत से काम है।बाकी फ़ुरसत मिलने पर फ़िर लिखेंगे।तब तक़ के लिये सभी असली ब्लागर भाईयों को इस जबरदस्ती ब्लागर का नमस्कार।पढना और जबरद्स्ती कमेण्ट भी करना।हा हा हा हा हा।


अब पता चल रहा है कि ब्लागर दो प्रकार के होते हैं,जबरदस्त और जबरदस्ती!ब्लागरों को ढोया जा सकता है और उन्हे दिखा कर बल प्रदर्शन किया जा सकता है!

Monday, February 1, 2010

ब्लागर मीट के बाद पता चला कि पार्क मे बैठ कर मूंगफ़ली और चना खाने वाले ही ईमानदार होते हैं,और समोसा उससे तो अब नफ़रत हो गई है!

रायपुर मे पहली बार राज्य स्तर की ब्लागर मीट की कोशिश की गई।कुछने इसे सफ़ल माना और कुछ ने……।खैर ये अच्छे संकेत है कि वैचारिक स्वतंत्रता के दूत ब्लागरों ने वैचारिक मतभेद भी खुल कर ज़ाहिर किये।सब कुछ ठीक रहा लेकिन जिस मीट को होने के पहले ही प्रायोजित बता कर असफ़ल करने की कोशिश की गई,उसके होने के बाद भी एकाध ब्लागर का सुर वैसा ही रहा।ये बात कुछ हज़म नही ठीक वैसे ही जैसे उन्हे मीट मे नाश्ते मे दिया गया समोसा हज़म नही हुआ।



खैर ये सब मुझे कहना नही चाहिये लेकिन बहुत दिनों से देख रहा हूं कि इस पर तरह-तरह के विचार सामने आये तो मुझे लगा कि मेरे मन मे धमाचौकड़ी मचा रहे विचारों को भी मन की कैद से मुक्ति मिलनी चाहिये और ब्लाग जगत के अनंत कैनवास पर मनचाहे ढंग से पसरने का मौका भी मिलना चाहिये।सो मै भी हाज़िर हूं अपने अनुभव लेकर।मैने मीट के शुरू होते ही ये साफ़ कर दिया था कि किस तरह से इसके प्रायोजित होने का दुष्प्रचार किया जा रहा है।और ये भी बता दिया था कि आयोजन प्रेस क्लब का है और नाश्ते की मिठाई डा महेश सिन्हा लाये हैं।मैं आपको बता दूं कि रायपुर प्रेस क्लब अपना हाल तमाम साहित्यिक और समाज सेवा से जुडी अन्य गतिविधियों के लिये निशुल्क उपलब्ध कराता है।पुस्तको का विमोचन भी यंहा होता है और कविता-पाठ से लेकर साहित्य पर गोष्ठी भी होती है।और इससे पहले भी यंहा ब्लागर इकट्ठा हो चुके हैं।



रहा सवाल इस मीट का तो, उसका स्वरूप वैसा नही था जैसी मीट हुई।वो महज कुछ ब्लागरों के आपस मे मिलने का कार्यक्रम था और ये तय हुआ था राजकुमार ग्वालानी,ललित शर्मा और बी एस पाब्ला जी के बीच्।राजकुमार ने पाब्ला जी को फ़ोन लगाया था और बातचीत के दौरान उसने बहुत दिनों से मुलाकात नही होने की बात कही।पाब्ला जी ने कहा जब चाहे मिल लेते हैं तो राजकुमार ने रविवार का दिन तय कर लिया और पाब्ला जी को रायपुर बुला लिया क्योंकि इससे पहले हम सब लोग भिलाई जा कर बेहद आत्मीय स्वागत का मज़ा ले चुके थे।राजकुमार ने मुझे बताया कि ऐसा कार्यक्रम तय हुआ है तो मैने भी हां कर दी और स्थान नीयत किया गया प्रेस क्लब।उसके बाद कौन आ रहा है और कार्यक्रम कैसा होगा ये हम लोगों को किसी को नही पता था।



इत्तफ़ाक़ से रविवार को प्रेस क्लब मे एक आवश्यक बैठक हो गई और उसके बाद मुझे पार्षदों के सम्मान समारोह मे जाना था।सो मैने राजकुमार से बैठक मे न आ पाने के लिये क्षमा मांग ली और सारी व्यवस्था प्रेस क्लब मे कर देने की बात कही।पता नही क्यों राजकुमार ललित शर्मा और पाब्ला जी को लगा कि मैं नही रहुंगा तो मज़ा नही आयेगा और उन्होने बैठक स्थगित करके अगले रविवार के लिये टाल दी।ये उन लोगों का मेरे लिये प्यार था और ये उनका बडप्पन भी जिसका मैं हमेशा आभारी रहुंगा।लगता है भूमिका कुछ ज्यादा बड़ी हो गई दरअसल उस सम्मेलन से जुड़ी भावनायें भी बहुत थी शायद इसलिये ऐसा हो रहा है।

खैर मैं आता हूं अब असली मुद्दे पर।तो ब्लागर मीट के बाद एक ब्लागर भाई के अनुभवों ने तो मुझे ज़मीन ट्च कर दिया।मुझे आज तक़ पता ही नही था कि अगर आप बैठक मे मूंगफ़ली या चनाबूट(हरे चने की गड्डी)नही खाते हैं तो आप ईमानदार नही कहला सकते।साला इतने साल से ईमानदार कहलाने के लिये दर-दर भटक-भटक के सर्टिफ़िकेट ढूंढ रहा था,मुझे नही मालूम था कि वो पार्क की घास पर बैठ कर चना खाने मात्र से मिल जाता है।जय हो ब्लाग जगत की।इतना महान ज्ञान और इतना आसान तरीका।हम मूर्ख हैं जो आज तक़ क्लब के बगल के पार्क मे बैठ कर एक ठो फ़ोटो नही खिंचवा पाये।अब सारे फ़ोटोग्राफ़रो को कह दिया है हमारा चना खाते हुये फ़ोटो ही खिंचा जाये और छापा जाये।

उन्ही महान और अनुभवी ब्लागर के ज्ञान भंडार से मुझे ये भी पता चला कि उस दिन मीट मे नाश्ते मे दिया गया समोसा उन्हे नही पचा।बाकि लोगों को तो पच गया और अगर ऐसा हुआ है तो वे किस श्रेणी मे आते है इस बारे मे उन विद्वान महोदय से जानने मिलेगा शायद।एक बात और उन्होने साधारण सी बैठक को भव्य आयोजन भी बता दिया।रोज़ सैकड़ो कप चाय प्रेस क्लब मे बनती है और निशुःलक पिलाई जाती हैं।नाश्ते मे एक समोसा,दो बिस्किट,थोड़े से आलू चिप्स और एक पीस मिठाई थी।ऐसा प्रेस क्लब हर आयोजन मे करता है और इसे भव्य तो कतई नही कहा जा सकता।मिठाई के बारे मे पहले ही बता दिया गया था कि ये डा महेश सिन्हा लायें है और 50 लोगों के लिये समोसा बिस्किट और चिप्स पर जितना खर्च हुआ होगा उतना तो शायद साधारण से साधारण आदमी भी अपने घर आये मेहमान पर खर्च कर सकता है।मात्र कुछ सौ रूपये लगे होंगे जिसे प्रेस क्लब ने खर्च किये।इसमे उन सज्जन को जब धन्ना सेठ के रूपये की बू आई तो मुझे उन्की इस मनुष्यों मे नही पाई जाने वाली इन्द्रिय पर खूब जलन हुई।और एक बात और उन्हे शायद इसलिये वो समोसा पचा नही,लेकिन उन्होने वो समोसा छोड़ा नही पूरा खाया।

अकेले वो ही थे जिन्हे ऐसा लगा कि कोई उन्हे एक समोसा खिलाकर पुतलियों की तरह नचा सकता है।वे किसी धन्ना सेठ के हाथो न नाचना चाहते है और न दूसरे ब्लागरों को नाचते देखना चाहते हैं।मुझे याद है इससे पहले भी उन्हे कई बार बुलाया गया मगर उन्होने आना ज़रूरी नही समझा और इस बार आये भी पता नही क्या-क्या उन्हे नज़र आ गया जो किसी और को नज़र नही आया।उदाहरण के लिये उन्हे ब्लागर मीट मे स्कूल के समय की गुटबाज़ी याद आ गई।ये उनका कहना और इससे ही समझ मे आ जाता है कि उन्हे स्कूल के समय से ही गुटबाज़ी की आदत है और वे इसे न तो भूले है और न भूलना चाहते हैं।पता नही उन्हे किस व्यक्ति के व्यापारिक उद्देश्य और निजी खुन्नस नज़र आ गई और कैसे और किसने उसे छतीसगढ से जोडा?खैर जो स्कूल के समय से गुटबाज़ी करता आ रहा हो उसके अनुभव सिर्फ़ और सिर्फ़ गुटबाज़ी के काम ही आयेंगे।अभी तक़ छतीसगढ के ब्लागरों मे गुटबाज़ी नही है लेकिन इनके अनुभव शायद ये महान और पवित्र काम भी कर देंगे।कहने को अभी और भी बहुत कुछ है लेकिन सब एक बार मे नही।मिलते है एक कमर्शियल ब्रेक के बाद। हम सब समोसा खाने वालों को तो उन्होने व्यापारिक उद्देश्य के लिये किसी धन्ना सेठ के इशारे पर नाचने वाली पुतली कह ही दिया है। और हां उन्हे आज भी छतीसगढ की पहली ब्लागर मीट का इंतज़ार है तो देर किस बात की दोस्त दम है तो करवा के देख लो हम भी आयेंगे और चना ही खा लेंगे मगर खाने के बाद ये नही कहेंगे कि साला चना पचा नही। हा हा हा हा।

Friday, January 22, 2010

रविवार को मिलेंगे ब्लागर और चर्चा करेंगे छत्तीसगढ की वास्तविक स्थिती के प्रचार-प्रसार पर

पिछले रविवार को किसी कारणवश स्थगित ब्लागर मीट इस रविवार को होने जा रही है।प्रेस क्लब मे दो घण्टे चर्चा के बाद सभी भोज पर मिलेंगे और वंहा होगा सिर्फ़ परिचय।एक दूसरे को करीब से जानने के इस अवसर पर कोई उपदेश नही,कोई टांग खिंचाई नही,बस शुद्ध पारिवारिक वातावरण मे सिर्फ़ और और सिर्फ़ पारिवारिक बातें।

इस मीट की योजना काफ़ी समय से बन रही थी लेकिन मिलना हो नही पा रहा था।भिलाई की मीट के बाद भिलाई के साथियों ने रायपुर आकर मिलने का प्रस्ताव रखा था जिसे राजतंत्र वाले राजकुमार ग्वालानी ने मुझे बताया।मैंने सहर्ष मंज़ूरी दे दी थी लेकिन तारीख के मामले मे थोड़ा गड़बड़ हो गई।उसी दिन प्रेस क्लब की एक आवश्यक बैठक होनी थी और उसके बाद मुझे यंहा राजधानी के नव-निर्वाचित पार्षदों के सम्मान समारोह मे मुख्य अतिथी के रूप मे शामिल होना था।दोनो कार्यक्रमों का समय ऐसा था कि मेरा ब्लागर मीट मे जाना संभव नही था सो मैने राजकुमार से पास अपनी छूट्टी की एप्लिकेशन भेज दी।मैने उनसे कहा कि आप लोग तयशुदा कार्यक्रम कर लिजिये पर उसने कार्यक्रम ही स्थगित कर दिया।मुझे अफ़सोस भी हुआ फ़िर नई तारीख की घोषणा भी हो गई।

इस बार मैं कोई चूक नही चाहता था।इसलिये संस्कृति वाले आदरणीय डा महेश सिन्हा जी और भिलाई के हरदिल अज़ीज़ पाब्ला जी से भी चर्चा हुई।बालकृष्ण अय्यर ने भी अचानक कार्यक्रम स्थगित करने पर नाराज़गी जताई और सारा कार्यक्रम प्लान करके करने की सलाह दी।मैने इस बारे मे पाब्ला जी से भी बात की कितने लोग आयेंगे और कितने लोगों खाने पर रुकेंगे,कितने लोग वापस लौटेंगे,इस बारे मे चर्चा हुई।रात को ठहरने की व्यवस्था नही किया जाना तय किया गया,इसलिये ज़ल्द से ज़ल्द कार्यक्रम पूरा करने पर भी महेश भैया ने ध्यान दिलाया।उनका कहना था कि कुछ लोग अगर बिलासपुर से आयेंगे तो उनकी वापसी के समय को भी ध्यान रखना पड़ेगा।सब तय करने के बाद कल महेश भैया ने फ़िर एक कार्यक्रम की तैयारियों की पूरी जानकारी मुझसे ली।और ज़रूरी कुछ निर्देश मुझे दिये।

सो इस बार हमारा ब्लाग जगत का परिवार रायपुर को दोपहर तीन बज़े मोतीबाग स्थित प्रेस क्लब मे इकट्ठा होगा।वंहा विषय आधारित चर्चा के बाद सारे लोग भाटागांव स्थित एक छोटे से फ़ार्म पर इकट्ठा होंगे और मिलकर एक दूसरे को जानने-समझने की कोशिश करेंगे।यंहा खुल कर हंसी-मज़ाक करेंगे,कोई रंज नही,कोई मलाल नही,बस प्यार ही प्यार होगा।और इस प्यार को कैसे और बढाया जाये इस बारे मे भी चर्चा करेंगे।यंहा पर राष्ट्रीय स्तर पर एक ब्लागर मीट के आयोजन के प्रस्ताव पर बहुत दिन से चर्चा हो रही है।आदरणीय दिनेशराय द्विवेदी जी के रायपुर प्रवास पर भी इस पर चर्चा हुई थी।इसे अमलीजामा पहनाने पर सभी लोगों से राय ली जायेगी।कौन कौन साथी रविवार को यंहा आ रहें हैं ये अगर हम लोगों को शनिवार की शाम तक़ भी पता चल जाये तो व्यवस्था करने मे आसानी होगी।सभी एक दूसरे से सम्पर्क कर सकते हैं और आने की सूचना दे सकतें है लेकिन सूचना अगर संस्कृति वाले डा महेश सिन्हा जी को उनके मोबाईल नम्बर 9893098332 या मुझे मेरे नम्बरों 9827138888, 9425203182 पर सूचना दे सकते हैं।आने की मंज़ूरी की सूचना सिर्फ़ असुविधाओं से बचने के लिये मांगी जा रही है,आशा ही नही मुझे पूरा विश्वास है आप सभी साथियों का सहयाग मुझे जी-भर कर मिलेगा।

यंहा अलबेला खत्री जी की बहुत याद आयेगी।पिछली बार हम सभी ब्लागर भाई उनके सम्मान के लिये भाटागांव मे इकट्ठा हुये थे।

Saturday, January 9, 2010

मेधा पाटकर समेत आधा दर्ज़न मानवाधिकारवादी पर प्रायोजित हमला हुआ और पुलिस तमाशाई की तरह खड़ी देखती रही

मेधा पाटकर समेत आधा दर्ज़न मानवाधिकारवादी छत्तीसगढ के नक्सल प्रभावित बस्तर इलाके के दौर पर आये हुये थे।उनपर बस्तर के दन्तेवाड़ा मे अंडे फ़ेंके गये और धक्का-मुक्की भी की गई।वंहा पर मामला स्थानीय वर्सेस बाहरी पत्रकार बनाने मे पुलिस सफ़ल रही।और ऐसा ही कुछ प्रायोजित कार्यक्रम रायपुर मे भी होना था पर प्रायोजकों ने जगह गलत चुन ली।उन्होने प्रेस क्लब के सामने तमाशा खड़ा करना चाहा जिसका मुझे पहले ही अंदेशा था और इसलिये मैं घण्टे भर से ज्यादा समय वंही टिक कर बैठा रहा।पुलिस इस दौरान तमाशाई बनी खड़ी देखती रही और पुलिस का काम मुझे और मेरे साथियों को करना पड़ा।हम लोगों ने प्रदर्शनकारियों को जैसे तैसे हटाया और मानवाधिकारवादियों को उनके घेरे से निकाल कर रवाना किया।
मेधा पाटकर,संदीप पाण्डेय और अन्य लोगों की ओर से कल से ही प्रेस कान्फ़्रेंस की अनुमती मांगी गई थी जिसे न देने का आग्रह,अनुरोध से लेकर दबाव मुझपर पहले से बनाने की कोशिश हो रही थी।इससे पहले बस्तर मे मेधा के साथ दिल्ली से आई पत्रकार का दन्तेवाड़ा के पत्रकारों से विवाद हो चुका था और मामला पुलिस थाने तक़ पहुंच गया था।मानवाधिकारवादियों से परेशान पुलिस ने इस मामले को हवा दी और मानवाधिकारवादियों पर अंडे फ़िंकवाये और उन पर हमला करवा दिया।इस मामले को और तूल देने की कोशिश की गई।
इसी के तहत यंहा भी उनको बिना प्रेस कान्फ़्रेंस लिये विरोध करवा कर रवाना करने की योजना बनाई गई थी,जो मेरे प्रेस कान्फ़्रेंस की अनुमति देने से फ़ेल हो गई।इसके बाद प्रेस कान्फ़्रेंस लेने पहुंची मेधा पाटकर का विरोध करने के लिये प्रायोजित कार्यक्रम के तहत यंहा आश्रम मे रखे गये नक्सल वारदात मे मारे गये लोगों के बच्चों को सामने रखकर मेधा और उनके साथियों पर हमले की तैयारी थी जिसकी मुझे भनक लग गई थी।

मैं समय से पहले प्रेस क्लब मे जाकर जम गया।आधे घण्टे चलने वाली प्रेस कान्फ़्रेंस डेढ घण्टे चली और उसके बाद इलेक्ट्रानिक मीड़िया वालों का बाईट लेने का प्रोग्राम।सब खतम होने से पहले मैने संदीप पाण्डेय से बात की और उन्हे सारी स्थिती समझाई।गेट पर खड़ी भीड़ को देख कर वे भी सब समझ गये उसके बाद मेधा से बात कर उन्हे समझाने की कोशिश की गई।वे शुरु से लेकर आखिर तक़ यही कहती रही मैं उनसे बात करना चाह्ती हूं,लोग क्या कहेंगे मेधा बच्चों से बात किये बिना चली गई।मैने जब उनसे कहा वे बात करने आप का विरोध करने आये हैं तब जाकर वे बड़ी मुस्किल से कार मे बैठ कर सीधे रवाना होने के लिये तैयार हुई।इस बीच पुलिस को बार-बार सूचना दी गई।सबसे चौंकाने वाली बात तो ये है कि प्रेस क्लब के ठीक सामने सड़क के दूसरी ओर पुलिस की चौकी है।खैर पुलिस को नही आना था सो नही आई।

तब मैं खुद बाहर निकला और दरवाज़े पर खड़ी भीड़ का नेतृत्व कर रहे लोगों से रास्ता छोड़ने के लिये कहा।पहले तो वे माने नही फ़िर जब मैंने ज़ोर ज़बर्दस्ती करने की बात कही तो किनारे खड़े होकर नारेबाज़ी करने पर मान गये।इस बीच मामला प्रेस क्लब और प्रदर्शनकारियों के बीच फ़ंसते देख पुलिस का थानेदार अपनी टीम के साथ वंहा आ गया मगर वो सिर्फ़ शो-पीस ही बना रहा।सब तय होने के बाद मैंने मेधा और उनके साथियों को कार मे बैठ कार रवाना होने के लिये राज़ी किया और खुद साथ सामने जाकर रास्ता साफ़ करने की एक बार फ़िर कोशिश की।इस बीच प्रायोजित प्रदर्शनकारी भी किनारे खड़े होकर मेधा का इंतज़ार करने लगे और जैसे ही मेधा का काफ़िला गेट पर पंहुचा उन्होने बच्चों को कार के सामने कर दिया और नारेबाज़ी शुरू कर दी।इस स्थिती के लिये मैं पहले से तैयार था।सो मैं और मेरे साथियों ने सीधे प्रदर्शनकारीयों को धकेलना शुरु किया और गुस्से मे मैने उन्हे गालियां भी बकी।तब तक़ स्थिती बिगड़ने की आशंका से किनारे खड़ी तमाशा देख रही पुलिस भी भीड़ मे शामिल हो गई।लेकिन उनका इंतज़ार किये बिना ही प्रेस क्लब की टीम ने सब को धकिया कर पीछे किया और मेधा के काफ़िले को वंहा से रवाना किया।उनके रवाना होने के बाद ही सबने चैन की सांस ली और क्लब आये मेहमान को एक प्रायोजित हमले का शिकार होने से बचा लिया।