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Wednesday, February 3, 2010

पंकज अवधिया को लगता है कि ब्लागर मीट का कोई गुप्त उद्देश्य था और इसलिये एक बड़ा वर्ग उससे दूर रहा!पाब्ला जी,राजकुमार और ललित बाबू आप लोगो को बताना चाहि

कल संजीव तिवारी की पोस्ट पढ कर लगा कि इन सब फ़ालतू विवादों मे समय नष्ट नही करना चाहिये और मैने इस पर एक शब्द भी नही लिखने का फ़ैसला ले लिया।और आज पंकज के रोचक अनुभव देखे तो होश उड़ गये।उन्होने मीट मे आपस की बातचीत तो लिखी मगर साथ मे भी ये भी लिख दिया कि बैठक के गुप्त उद्देश्य से एक ब्लागरों के एक बड़े वर्ग को परेशानी थी और वे इससे दूर रहे।ऐसा लगा की कोई शानदार रबड़ी-मलाई के ऊपर मरी हुई छिपकली रख कर सर्व कर रहा हो।न चाह कर भी इस बारे मे फ़िर से लिखना पढ रहा है क्योंकि आरोप मामूली नही गंभीर है।अब आप लोग ही बताईये भला ब्लागरों की सामान्य मेल-मुलाकात वाली बैठक के क्या गुप्त उद्देश्य हो सकते हैं?

मैने पंकज जी का नाम पहली बार अपनी पोस्ट मे लिखा है वो भी इसलिये कि कुछ लोगों को बिना नाम की ये पहेली समझ नही आ रही थी और कुछ लोग जानना चाहते थे कि किसने क्या कहा?बस इसलिये मैने आज पंकज जी के नाम से ये पोस्ट शुरू की है।जैसा कि मैं पहले ही बता चुका हूं कि ये मीट महज़ कुछ ब्लागरों के आपस मे मिलने का प्रोग्राम था जो बाद मे ब्लागर मीट मे बदल गया।इसकी शुरुआत राजकुमार ग्वालानी और पाब्ला जी के बीच फ़ोन पर हुई बातचीत से हुई।राजकुमार ने पाबला जी से बहुत दिनों से मुलाकात नही होने का ज़िक्र किया तो उन्होने भिलाई के साथियों समेत रायपुर आने की बात कही।इस पर राजकुमार ने उन्हे निमंत्रण दे दिया और ललित के साथ मिलकर कार्यक्रम तय कर लिया।किसी कारण से मैं उस दिन व्य्स्त था सो उन्होने कार्यक्रम आगे बढा दिया और फ़िर वो दूसरे इतवार को हुआ।इस लिहाज़ से ब्लागर मीट के आयोजक हुये राजकुमार,ललित शर्मा और पाब्ला जी।

इसके बाद डा महेश सिन्हा ने सारे कार्यक्रम को सुव्यवस्थित करने के मुझे निर्देश दिये जिसके बाद मीट के लिये ब्लागरों से सम्पर्क और उन्हे निमंत्रण देने का काम किया बी एस पाब्ला जी,संजीव तिवारी और संजीत त्रिपाठी ने,उनका साथ दिया डा महेश सिन्हा ने।सब ने खूब मेहनत की और छत्तीसगढ के ब्लागरों का एक डाटा भी तैयार किया।करीब अस्सी लोगो के बारे जानकारी मिली और उनमे से कुछ ने बाहर होने की सूचना दी और कुछ ने आने की सहमती।सम्पर्क का काम जिस टीम ने किया उनमे से पाब्ला जी के पास पूरा डाटा अभी भी उपलब्ध है जिसे ज़रुरत हो वो उनसे पूछ सकता है।

अब जिस मीट की रूपरेखा राजकुमार,ललित और पाबला जी ने तय की हो तो उस मीट का अगर कोई गुप्त उद्देश्य होगा तो वो उन्हे ही पता होगा और इसलिये पंकज को पता लगे इस गुप्त उद्देश्य के बारे मे उन्हे बताना चाहिये।कायदे से तो पंकज के सारे सवालों का जवाब भी उन्हे ही देना चाहिये मगर जब किसी ने कुछ नही कहा तो मुझे जवाब देना पड़ा क्योंकि मैने उस मीट के लिये प्रेस क्लब जैसा अच्छा स्थान उपलब्ध कराने की गलती की थी।गल्ती की थी सो भुगत रहा हूं,सब ने मीट की रिपोर्ट पोस्ट की और मैं सफ़ाई कर रहा हूं।खैर गलती एक बार होती है बार-बार नही।वैसे भी पिछली पोस्ट मे मिली एक सलाह मुझे जम गई जिससे मिलना हो अकेले मिलो।सो अब जिससे मिलेंगे अकेले ही मिल लेंगे।ये गुप्त एजेंडा लेकर किसी मीट मे शामिल नही होंगे।हां ब्लागस पर एक वर्कशाप के आयोजन का फ़ैसला जो पिछली मीट मे खुलेआम लिया गया था उसे ज़रूर ज़ल्द ए ज़ल्द पूरा कर देंगे और उसके बाद चल अकेला चल अकेला।



पंकज अवधिया को लगता है कि ब्लागर मीट का कोई गुप्त उद्देश्य था और इसलिये एक बड़ा वर्ग उससे दूर रहा!पाब्ला जी,राजकुमार और ललित बाबू आप लोगो को बताना चाहिये सच क्या है?

Tuesday, February 2, 2010

अब पता चल रहा है कि ब्लागर दो प्रकार के होते हैं,उन्हे ढोया जा सकता है और उन्हे दिखा कर बल-प्रदर्शन भी किया जा सकता है।

ब्लागर मीट के रोचक अनुभव:मुझे तो अब तक़ पता ही नही था कि नेताओं की तरह ब्लागर भी दो प्रकार के होते हैं।एक जबर्दस्त और दूसरा जबरदस्ती।इतना जबरदस्त ज्ञान हमको मिला रायपुर ब्लागर मीट के बाद समुद्र मंथन टाईप विचार मंथन से।मैं तो खुद को भाग्यशाली समझ रहा हूं जो मीट मे चला गया वर्ना ऐसे महान विचारक और जबरदस्त ब्लागर से पता नही कब और कैसे मुलाकात हो पाती।

वैसे उन जबर्दस्त ब्लागर भाई के बारे मे किसी को कुछ बताने का इरादा न था और ना है।वे खुद ही अपने बारे मे बता चुके हैं और हो सकता है फ़िर बता दें आखिर वे ठहरे जबरदस्त ब्लागर।हम लोग तो लगता है उनकी परिभाषा के अनुसार दूसरी केटेगरी मे आते हैं यानी जबरदस्ती ब्लागर।ये क्लासीफ़िकेशन तो समझ मे आ गया गुरूजी मगर ये बात समझ मे नही आई कि जबरदस्ती ब्लागर अपना लिखा दूसरों को जबरदस्ती कैसे पढा सकता है?बस इतनी सी शंका है अगर इसका निवारण हो जाये तो हम जबरद्स्ती ब्लागर उन उपायों पर चलकर लोगों को जबरिया पढवा-पढवा कर हो सकता है एकाध दिन जबरदस्त ब्लागरत्व को प्राप्त कर सकें।

एक निवेदन है गुरुजी जो कुछ बतायें सारी दुनिया को अपने ब्लाग पर बतायें तो अच्छा लगेगा।वरना पिछली सारी बातें आपने साथी ब्लागर के ब्लाग पर कमेण्ट के रूप मे बताई थी जो मुझे लगा कि सबको पता चलना चाहिये इसलिये मुझे गड़े हुये मुर्दे उखाड़ना पड़ रहा है।वैसे एक बात मुझ नासमझ जबरदस्ती ब्लागर को और समझ मे नही आई कि आखिर आपको कौन सा ब्लागर ढोकर लाया गया दिखा।मेरे खयाल से वंहा जितने भी जबरदस्त और आपके हिसाब से ज्यादातर जबरदस्ती ब्लागर आये थे सब अपना बोझ खुद ढोने मे सक्षम थे।कौन ऐसा था जो बोझा था और किसे किसने ढोकर लाया ये भी थोड़ा स्पष्ट हो जाता तो बड़ी कृपा हो जाती,मेरा भी ज्ञान बढ जाता।

हां एक बात और आपने बताया है कि आपको वंहा भीड़ चुनावी रैली की तरह नज़र आई।भई हम तो समझ नही पाये कि चुनावी रैली की ज़रूरत किसे है और चुनाव होने कंहा है।हम तो शुरू मे कम उपस्थिती देख कर निराश हो गये थे और सारे अतिथी ब्लागरों से सम्पर्क कर उनके आने के बारे मे पता लगाने के लिय साथियों से कहते रहे।जब सबके आने का पता चला तब जाकर मन शांत हुआ।इसी कारण कार्यक्रम निर्धारित समय से आधा घण्टा देर से शुरू हुआ।अब आप ही बताईये जबरदस्त भैया कि जंहा लोगों के आने का इंतज़ार किया जा रहा हो वंहा चुनावी रैली जैसी भीड़ आपको कंहा से नज़र आ गई।मैं आपकी इस दूसरी(पहली कल बता चुका हूं)मनुष्यों मे नही पाई जाने वाली इंद्रिय का कायल हो गया हूं।

एक बात और किनके ब्लाग नही थे जिन्हे ब्लागर बताया गया ज़रा इस राज पर से भी पर्दा उठा देते तो हृदय गार्डन-गार्डन हो जाता और फ़िर उसकी घास पर बैठ कर चना खा लेते।मेरे खयाल से जितने लोग आये थे सभी ब्लागर थे और सबको बोलने का मौका भी दिया गया।किसी जबरदस्त ब्लागर को बोलने जबरद्स्ती रोका नही गया और ना ही किसी जबरदस्ती ब्लागर को जबरदस्ती बोलने के लिये कहा गया।आपको समोसे मे धन्ना सेठ के रूपयों की बू या बदबू जो भी आ रही थी आप उसी समय कहते तो बहुत अच्छा लगता।आप वंही पर बताते कि आपके अलावा और कौन-कौन जबरद्स्त ब्लागर है तो बहुत से लोग अपनी-अपनी पोस्ट पर आपके यशगान मे रहमान को बीट कर चुके होते।किसे ढोकर लाया गया है ये बता देते तो आपको हाथों-हाथ उठाया लिया जाता।मगर मुझे मालूम है आपको ज्यादा प्रशंसा प्यारी नही है।खैर जाने दीजिये आपको न सही,मुझे नही सही,जबरदस्त को न सही,जबरद्स्ती को न सही बाकी लोगों को तो बहुत से काम है।बाकी फ़ुरसत मिलने पर फ़िर लिखेंगे।तब तक़ के लिये सभी असली ब्लागर भाईयों को इस जबरदस्ती ब्लागर का नमस्कार।पढना और जबरद्स्ती कमेण्ट भी करना।हा हा हा हा हा।


अब पता चल रहा है कि ब्लागर दो प्रकार के होते हैं,जबरदस्त और जबरदस्ती!ब्लागरों को ढोया जा सकता है और उन्हे दिखा कर बल प्रदर्शन किया जा सकता है!

Friday, January 22, 2010

रविवार को मिलेंगे ब्लागर और चर्चा करेंगे छत्तीसगढ की वास्तविक स्थिती के प्रचार-प्रसार पर

पिछले रविवार को किसी कारणवश स्थगित ब्लागर मीट इस रविवार को होने जा रही है।प्रेस क्लब मे दो घण्टे चर्चा के बाद सभी भोज पर मिलेंगे और वंहा होगा सिर्फ़ परिचय।एक दूसरे को करीब से जानने के इस अवसर पर कोई उपदेश नही,कोई टांग खिंचाई नही,बस शुद्ध पारिवारिक वातावरण मे सिर्फ़ और और सिर्फ़ पारिवारिक बातें।

इस मीट की योजना काफ़ी समय से बन रही थी लेकिन मिलना हो नही पा रहा था।भिलाई की मीट के बाद भिलाई के साथियों ने रायपुर आकर मिलने का प्रस्ताव रखा था जिसे राजतंत्र वाले राजकुमार ग्वालानी ने मुझे बताया।मैंने सहर्ष मंज़ूरी दे दी थी लेकिन तारीख के मामले मे थोड़ा गड़बड़ हो गई।उसी दिन प्रेस क्लब की एक आवश्यक बैठक होनी थी और उसके बाद मुझे यंहा राजधानी के नव-निर्वाचित पार्षदों के सम्मान समारोह मे मुख्य अतिथी के रूप मे शामिल होना था।दोनो कार्यक्रमों का समय ऐसा था कि मेरा ब्लागर मीट मे जाना संभव नही था सो मैने राजकुमार से पास अपनी छूट्टी की एप्लिकेशन भेज दी।मैने उनसे कहा कि आप लोग तयशुदा कार्यक्रम कर लिजिये पर उसने कार्यक्रम ही स्थगित कर दिया।मुझे अफ़सोस भी हुआ फ़िर नई तारीख की घोषणा भी हो गई।

इस बार मैं कोई चूक नही चाहता था।इसलिये संस्कृति वाले आदरणीय डा महेश सिन्हा जी और भिलाई के हरदिल अज़ीज़ पाब्ला जी से भी चर्चा हुई।बालकृष्ण अय्यर ने भी अचानक कार्यक्रम स्थगित करने पर नाराज़गी जताई और सारा कार्यक्रम प्लान करके करने की सलाह दी।मैने इस बारे मे पाब्ला जी से भी बात की कितने लोग आयेंगे और कितने लोगों खाने पर रुकेंगे,कितने लोग वापस लौटेंगे,इस बारे मे चर्चा हुई।रात को ठहरने की व्यवस्था नही किया जाना तय किया गया,इसलिये ज़ल्द से ज़ल्द कार्यक्रम पूरा करने पर भी महेश भैया ने ध्यान दिलाया।उनका कहना था कि कुछ लोग अगर बिलासपुर से आयेंगे तो उनकी वापसी के समय को भी ध्यान रखना पड़ेगा।सब तय करने के बाद कल महेश भैया ने फ़िर एक कार्यक्रम की तैयारियों की पूरी जानकारी मुझसे ली।और ज़रूरी कुछ निर्देश मुझे दिये।

सो इस बार हमारा ब्लाग जगत का परिवार रायपुर को दोपहर तीन बज़े मोतीबाग स्थित प्रेस क्लब मे इकट्ठा होगा।वंहा विषय आधारित चर्चा के बाद सारे लोग भाटागांव स्थित एक छोटे से फ़ार्म पर इकट्ठा होंगे और मिलकर एक दूसरे को जानने-समझने की कोशिश करेंगे।यंहा खुल कर हंसी-मज़ाक करेंगे,कोई रंज नही,कोई मलाल नही,बस प्यार ही प्यार होगा।और इस प्यार को कैसे और बढाया जाये इस बारे मे भी चर्चा करेंगे।यंहा पर राष्ट्रीय स्तर पर एक ब्लागर मीट के आयोजन के प्रस्ताव पर बहुत दिन से चर्चा हो रही है।आदरणीय दिनेशराय द्विवेदी जी के रायपुर प्रवास पर भी इस पर चर्चा हुई थी।इसे अमलीजामा पहनाने पर सभी लोगों से राय ली जायेगी।कौन कौन साथी रविवार को यंहा आ रहें हैं ये अगर हम लोगों को शनिवार की शाम तक़ भी पता चल जाये तो व्यवस्था करने मे आसानी होगी।सभी एक दूसरे से सम्पर्क कर सकते हैं और आने की सूचना दे सकतें है लेकिन सूचना अगर संस्कृति वाले डा महेश सिन्हा जी को उनके मोबाईल नम्बर 9893098332 या मुझे मेरे नम्बरों 9827138888, 9425203182 पर सूचना दे सकते हैं।आने की मंज़ूरी की सूचना सिर्फ़ असुविधाओं से बचने के लिये मांगी जा रही है,आशा ही नही मुझे पूरा विश्वास है आप सभी साथियों का सहयाग मुझे जी-भर कर मिलेगा।

यंहा अलबेला खत्री जी की बहुत याद आयेगी।पिछली बार हम सभी ब्लागर भाई उनके सम्मान के लिये भाटागांव मे इकट्ठा हुये थे।

Friday, November 6, 2009

उसने कहा महफ़ूज़ और मैने सुना मैथ्यू!नतीजा माफ़ी मांगना पड़ा मुझे!

कल दोपहर हम लोग प्रेस क्लब मे बैठे हुये थे कि मोबाईल घनघनाया और जेब से निकाल कर सीधे काल रिसीव की और अपना परमानेंट स्टार्टिंग डायलाग दाग दिया।मेरे बोल कहते ही उसने क्या कहा मुझे समझ मे नही आया और मैं जो कहने लगा वो उसे सुनाई नही पड़ रहा था शायद्।उसने कहा कि भैया आपकी आवाज़ साफ़ नही सुनाई दे रही है।भैया सुनते ही मुझे लगा लोकल प्राब्लम है इसलिये मै तत्काल अपनी स्टाईल मे आ गया और बोला,तू बोल मुझे सुनाई दे रहा है।उसके बाद काफ़ी देर बात हुई और आज जब पता चला कि मै जिससे बात कर रहा था वो,वो नही था बल्कि वो था तो मारे शर्मिंदगी के मेरा बुरा हाल था और आखिर मुझे उसे फ़ोन कर माफ़ी मांगना पड़ा।

फ़ोन पर बात करते समय मेरी गाड़ी अक्सर पटरी से उतर जाती है।और सुबह-सुबह तो गाड़ी पटरी पर ही नही होती।इस आभासी दुनिया मे आने के बाद थोड़ा बहुत पोलाईट और सोफ़्ट स्पोकन होने की बहुत ही कमज़ोर या फ़ार्मल कोशिश भी की थी मैने लेकिन ज़ल्द ही मैने यंहा भी ओरिजनल स्टाईल को ही अपनाया।यंहा भी बहुत से लोग जानने लगे हैं और धीरे-धीरे सब जान जायेंगे,जैसे कल महफ़ूज़ भाई ने जाना।
आवाज़ कम या धीमी होने की शिकायत करने के बाद भी महफ़ूज़ भाई को जब समझ मे नही आया कि किससे बात कर रहें है वे,तो उन्होने फ़िर से बताया कि मह्फ़ूज़ बोल रहा हूं लखनऊ से।अब तक़ मै भी चौंकन्ना हो गया था।लखनऊ तो मेरी समझ मे आ गया था मगर ये मैथ्यू समझ मे नही आया था।मैने अब संभल कर बात करना शुरू कर दिया था।बात निकली तो फ़िर निकलती चली गई और बहुत दूर तक़ भी गई।इस बीच मै अपने तमाम मैथ्यूओं को मेमोरी मे रिकलेक्ट करने की कोशिश के साथ बात को आगे बढा रहा था।जब कुछ समझ मे नही आया तो फ़िर वही अपना पुराना स्टाईल गरज़ होगी तो दुबारा बात करेगा नही तो अपने को कौन सा फ़र्क़ पड़ रहा है।
फ़िर मह्फ़ूज़ यानी मैथ्यू ने ब्लागर सम्मेलन की बात कही और इस मामले मे हमने खुलकर बात की।काफ़ी देर बहुत सारे विषयों पर बात करने के बाद हमारी बातचीत को मैने ही खतम किया और सोचने लगा कि ये कौन सा केरली है जो लखनऊ पंहुच गया।क्लब मे तब तक़ सब खामोश बैठे हमारी बातचीत सुन रहे थे।एक ने पूछा कौन था जिससे इतनी लम्बी बात कर ली।हम लोग बात करते हैं तो, चल फ़ोन रख बे।हो गई ना बात।और यंहा इतना लम्बा।अबे मैं नही जानता कौन था?हो ही नही सकता बिना जान-पहचान वाला इतनी देर बात करे और गाली ना खाये?मैने कहा लखनऊ से था।लखनऊ क्या लंदन से भी हो तो हम लोग नही मानेंगे कि बिना जान-पहचान के आप इतनी देर… अबे वो ब्लागर है।जभी,सब एक साथ बोले।ये ब्लागर आजकल आपको बहुत प्यारे लग रहे हैं।कितने दिन चलेगा ये?मैने कहा तुम लोग अब गाली खाने का काम कर रहे हो।और वंहा से उठ कर बिज़ी हो गया।

आज सुबह लिखने का मूड नही था,दो दिनो से थोड़ा मूड आफ़ चल रहा है,इसलिये लिखना ड्राप करके पढने बैठा।शास्त्री जी के ब्लाग पर डायरेक्टरी बनाने मे मिल रहे सहयोग वाली पोस्ट जब पढी तो कमेण्ट के दौरान महफ़ूज़ भाई का पता और फ़ोन नम्बर देखा।उनके ब्लाग का मैं न केवल रेग्यूलर विज़िटर हूं बल्कि उनका सीलिंग से बड़ा क्या बोलते है उसको,खेतों मे जो चलता है उड़ावनी फ़ैन हूं।सो उनसे बात करने की गरज़ से उस नम्बर को मोबाईल मे सेव करने लगा और जैसे ही सेव किया मेरे हाथ के तोते,कौयें,चील,गिद्ध सब उड़ गये।स्क्रीन पर लिखा हुआ आ गया दिज़ नम्बर इज़ आलरेडी एग़्ज़िस्ट।और वो नम्बर मैथ्यू के नाम पर सेव दिखा।जिसे मैने कल बात करने के बाद सेव कर लिया था।अब मेरा माथा ठनका।मुझे खयाल अपनी बदतमीज़ी का।आवाज़ नही आ रही तो मै क्या करूं?मुझे सुनाई दे रहा है तू बोल?अरे! मैने सोचा तो वो मैथ्यू नही महफ़ूज़ भाई थे,तभी शरीफ़ इंसान सब कुछ झेल कर एक फ़ोन पर आवाज़ सुनाई नही देने पर दूसरे फ़ोन पर काल कर बात करता रहा।कोई दूसरा होता तो?या फ़िर किसी ने तुझसे ऐसी बात की होती तो?मैने सोचा?तत्काल मेरे दिमाग मे मेरी ही बदतमीज़ी के रिकार्ड घूम गये।मुझे खुद पे बहुत शर्म आई और पूजा कर बाहर निकलते ही आफ़िस पहुंचने का इंतज़ार किये बिना ही कार मे बैठे-बैठे ही फ़ोन निकाला और ऊधर से आवाज़ आते ही कहा कि सारी महफ़ूज़ भाई मै कल आपको पहचान नही पाया था इसलिये थोड़ा रफ़ बात कर बैठा।सज्जन वो सच मे हैं सिर्फ़ लिखने मे ही नही ऐसा मुझे उसकी बातों से लगा।कोई बात नही कह कर हंस कर वो बात टालते रहे और मै और शर्मिंदा होकर माफ़ी मांगता रहा,एक बार नही कई-कई बार।

Thursday, October 29, 2009

अच्छा हुआ मेरा कोई दोस्त ब्लागर नही है वर्ना…………………………

मैने कल रात ईश्वर को धन्यवाद दिया कि अच्छा है उसने मेरे किसी भी दोस्त को ब्लागर नही बनाया।ईश्वर को धन्यवाद तो मैं रोज़ रात देता हूं मगर इस मामले मे कल ईश्वर पहली बार याद आये।वैसे याद तो बहुत दिनो से आ रहे थे मगर ऐसा लगा नही कि दोस्तों का ब्लागर नही होना कोई खास बात है उल्टे मै एक दो लोगों क पीछे पड़ा हुआ था कि वे लोग भी ब्लाग लिखना शुरु कर दें।पर शुकर है भगवान का मैं अभी तक़ सफ़ल नही हो पाया और ईश्वर ने उनकी सदबुद्धि मे ज़रा भी असर नही डाला।

आप सोच रहे होंगे सरक गया है लगता सुबह-सुबह्।एक तो सुबह-सुबह पहली बार कोई पोस्ट लिख रहा है और लिख भी रहा है तो अनाप-शनाप।लेकिन ऐसा कुछ नही है मैं पूरी ज़िम्मेदारी से कह रहा हूं कि अच्छा हुआ मेरा कोई दोस्त ब्लागर नही है।अब आप कहेंगे कि दोस्त के ब्लागर होने मे क्या तक़लीफ़?तक़्लीफ़ आज तक़ तो पता नही थी लेकिन ये जब से ईलाहाबाद सम्मेलन हुआ है तब से पता चल रहा है और रोज़ उस ज्ञान मे कोई न कोई भाई वृद्धि ही कर रहा है।

हम दोस्तों का भी रोज़ सम्मेलन होता है।कई बार लोकल तो कई बार स्पेशल जिसे आप रिज़नल और कई बार नेशनल भी मान सकते हैं।अब हमारे सम्मेलन मे जो सामने मिलता है उसे मौखिक सूचना दे दी जाती है और फ़िर ये उनकी ज़िम्मेदारी होती है कि वो चाहे जिसको उस मौखिक निमंत्रण को बांटे।अब इसमे किसी को फ़र्स्ट हैण्ड निमंत्रण मिलता है किसी को सेकेण्ड है और किसी किसी को कई लोगो से मुंह से ट्रांसफ़र होता हुआ मिलता है।जिसे जैसे सूचना मिलती है,जो वेन्यू बताया जाता है,वो अपनी सूविधा के आधार पर जैसे हो सकता है और जब संभव होता है पंहुच जाता है।निमंत्रण के टाईप पर कोई शिकायत नही।

फ़िर कोई ज़ल्दी पंहुच जाता है तो कोई बहुत देर से आता है।कभी मेहमान लेट तो कभी मेज़बान लेट,कभी कोई अकेला बोर होता है तो वो खुद मेहमान बनकर लोगो की पोज़िशन लेने लगता है,लेकिन किसी को इस मामले मे कोई प्राब्लम आज तक़ नही आई है।अब कल की ही बात लिजिये एक साथी मणी भाई पटेल को स्वास्थ्य की रूटीन जांच के लेने मुम्बई जाना था।इस मामले मे कुछ दिन पहले ही लम्बा डिस्कशन हुआ फ़िर तारीख तय हो गई और मणी भाई के साथ डाक्टर अजय,राकेश और गोपाल का जाना तय हुआ।सत्येंद्र ने पहले ही व्यस्त रहने की बात बता दी थी और राकेश के भी घर मे अचानक़ कोई काम आ गया सो उसका जाना ऐन टाईम पर कैंसिल हो गया मगर मणी भाई अकेले नही गई उनके साथ उनके परिवार का कोई नही गया सिवाय दोस्तों के,क्योंकि दोस्त भी परिवार का सदस्य होता है और उनके परिवार वाले इस बात पर भरोसा भी करते हैं।वैसे भी मुम्बई मे उनके हार्ट के आपरेशन के दौरान भी डाक्टर और गोपाल मौज़ूद थे।किसी ने और खुद मणी भाई ने भी राकेश के कैंसिलेशन का बुरा नही माना,डाक्टर और गोपाल के साथ जाने का आभार नही माना,किसी से साथ चलने के लिये कहा भी नही था ,बस इतना कहा था कि मुम्बई जाना है एक सम्मेलन वंहा होना चाहिये।मुम्बई मे भी डाक्टर राजेश ने पूरी तैयारी कर रखी थी।उसे भी फ़ोन पर आने की सूचना अजय ने दी मणी भाई ने नही।डाक्टर राजेश मुम्बई का बडा डाक्टर है उसने भी बुरा नही माना और वो भी मुम्बई सम्मेलन का हिस्सा रहेगा और वो जब यंहा आता है तो हमारा लोकल सम्मेलन भी बढकर रिज़नल हो जाता है।उसके आने पर भी कोई निमंत्रण नही बंटते,बस सूचना दे दी जाती है,जिसे मिलना होता है वो पंहुच जाता है।

कहने का मतलब ये कि अभी तक़ सारे दोस्तो का सत्संग मज़े से हो रहा है और रोज़ हो रहा है।कभी कोई नही आता तो कभी कोई।मगर ग्रुप मे से कुछ दोस्त रोज़ मिलते हैं।उसके बाद सत्संग मे भी जिसे जो पसंद वही पीता है-खाता है।मणी भाई की बीयर ठंड मे भी नही बदलती तो डाक्टर अजय,राकेश,लक्ष्मण और मैं वोदका से टस से मस नही होते।गोपाल,राजकुमार,संतोष,सत्येंद्र,प्रभुदीन और बहुत सारे है जिनको विस्की के अलावा कुछ नही चलता।गोपाल ब्राह्मण नही है लेकिन शुद्ध शाकाहारी है तो मै और लक्ष्मण सेमी शाकाहारी।मै ठंड मे कभी-कभार अंडा खा लेता हूं और लक्ष्मण को उससे परहेज नही है।सत्येंद्र,राकेश और संतोष ब्राह्मण है मगर बिना मांस के मदिरा उनके मैनिफ़ेस्टो मे नही है।डाक्टर और मणी भाई को फ़िश होना तो राजकुमार को फ़िश और मटन दोनो लेकिन उसे चिकन नही चाहिये और एक प्रशासनिक अफ़सर को सिर्फ़ चिकन चाहिए और कुछ नही।संडे दोपहर खुद चिकन बना कर बैठ जाता है जिस्को आना है आओ जिस्को नही आना मत आओ।किसी को कांग्रेस पसंद है तो किसी को भाजपा।कोई घोर हिंदूवादी है तो कोई सर्वधर्म समभाव वाला।संतोष को मुर्गा-मटन और शराब से लेकर सब कुछ चलता लेकिन वो बापू का दीवाना है और उनके खिलाफ़ कुछ नही सुन सकता,राजकुमार और दो तीन लोगो को लगता है बंटावारे के समय उन्होने सख्ती नही दिखाई वरना सूरत कुछ और होती।लेकिन कोई किसी के सामने अपनी बिना टांग वाली मुर्गी नही नचाता।कुछ लोग न्यूट्रल हैं,सबकी सुनते हैं।बहस रोज़ होती है किसी न किसी मामले मे लेकिन बेतुकी नही।

अरे ये तो लम्बा पेले जा रहा हूं मै।बात कंहा से निकली और कंहा पंहुच गई।कहने का मतलब ये था कि अगर मेरे सारे दोस्त या हमारा पूरा ग्रुप ब्लागर होता तो क्या हमारा रोज़ सम्मेलन हो पाता?कल तीन लोग मुम्बई मे थे वंहा से किसी ने फ़ोन करके नही बताया जांच मे क्या हुआ?आपको गरज़ है तो फ़ोन लगाईये।वैसे रोज़ डाक्टर मुझे फ़ोन लगाता है लेकिन कल मैने उसे फ़ोन लगाया।तो क्या मैं छोटा हो गया?क्या डाक्टर बड़ा हो गया?मै मुम्बई नही गया तो क्या मेरा प्यार कम हो गया?कुछ दिनो से मेरी लक्ष्मण से अनबन चल रही थी और ग्रुप का सहदेव यानी सबसे छोटा सदस्य है,मेरा पार्टनर भी।तीनो के बाहर होने पर उसको मैने अपने स्वभाव के विपरीत फ़ोन लगाया, तो क्या मैं छोटा हो गया?वो कल रात एक दूसरे साथी के साथ कार मे घूमते हुये बीयर पी रहा था।वो उसे निपटा कर मेरे पास पंहुचा और बिना किसी लाग लपेट के बोला चलो भैया आज कार मे ही बीयर पी लेते हैं?मै भी तैयार हो गया,तो क्या मै छोटा हो गया?पीने के बाद जब लौट रहे थे तो राजकुमार का फ़ोन आ गया।हम लोगो ने कहा कि हम लोगों का हो गया है तो वो बोला आ ना भाई आज यंहा कोई नही बाकि लोग भी मुम्बई है।हम लोग आधे रास्ते से लौट कर उसके साथ बैठे?तो क्या हम लोग छोटे हो गये?कहने का मतलब ये है कि आप निमंत्रण का टाईप मत देखिये उसमे छिपा प्यार देखिये।आप मेज़बान की सेवा मत देखिये उसमे छीपा प्यार देखिये?आप किसी भी सम्मेलन या समारोह मे व्यवस्था मत देखिये उसका उद्देश्य देखिये?कौन आ रहा है कौन नही इस पर मत जाईये,आप जा रहे है या नही ये देखिये?किसे दाल-रोटी मिल किसे हलवा-पुरी ये देखने की बजाये आपको अगर कोई प्यार से अचार रोटी भी खिला रहा है तो उसके साथ चुपड़ा हुआ प्यार ही देखिये बस और कुछ नही।शायद ब्लागर मीट मे ठिक इससे उल्टा हुआ और हमारे सम्मेलन मे ऐसा नही होता इसलिये हमारा सम्मेलन बराबर ज़ारी है।ऐसा भी नही कि कोई किसी से कमज़ोर है,सब एक से बढ कर एक हैं।कोई डाक्टर है तो कोई इंजिनीयर है,कोई बिल्डर है तो कोई नेता है,कोई अफ़सर है तो कोई पत्रकार है,कोई पुलिस वाला हे तो कोई ठेकेदार है।कहने का मतलब सभी अलग-अलग खोपड़ी के है मगर सबमे कामन एक ही बात है सब सिर्फ़ और सिर्फ़ प्यार देखते है उसके अलावा कुछ नही।इसिलिये मैने ईश्वर को धन्यवाद दिया कि अच्छा हुआ मेर कोई दोस्त ब्लागर नही है वर्ना………………………