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Monday, August 12, 2013
किश्तवाड पर सियासत गलत और गोधरा पर सही!वाह रे धर्मनिरपेक्षता!
कुछ नेतागण और हमारे मीडिया वाले भाई बंधू ये सवाल उठा रहे है कि किश्तवाड पर सियासत क्यों?ठीक बात है ऎसे मामलों में सियासत होनी भी नही चाहिये.पर मेरा ये सवाल है कि सियासत का सवाल सिर्फ किश्तवाड के लिये ही क्यों?गोधरा और गुजरात के लिये क्यों नही?वंहा अगर सियसत जायज है तो फिर किश्तवाड में क्यों नही? और अगर किश्तवाड में गलत है तो फिर गोधरा और गुजरात में सही क्यों?सवाल तो ढेर सारे है मगर ऎसे समय ऎसे वैसे सवाल भी गलत ही है.
Monday, July 29, 2013
कब छद्म धर्मनिरपेकक्षता से मुक्त होंगे?कब मौत मौत का फर्क़ मिटेगा?
क्या करण पांडे और पुनीत शर्मा की मौत मौत नही है? क्या उनकी ज़िंदगी ज़िंदगी नही थी?क्या इस देश में ज़िंदगी ज़िंदगी में फर्क़ होता है?क्या यंहा मौत के भी मायने अलग अलग हैं?क्या यंहा राज्य के हिसाब से मौत का आकलन होता है?क्या एनकाऊंटर सिर्फ गुजरात में होते हैं?क्या मौत पत बवाल सिर्फ अल्पसंख्यको के ही मचाया जाता है?सोहराबुद्दीन और करण पांडे में फर्क़ क्यों?इशरत जंहा और करण मे अंतर क्यों?दिल्ली और गुजरात के लिये राजधर्म अलग अलग है?क्या पुलिस पुलिस में फर्क़ होता है?स्टंट कर रहे करण पांडे और उसके साथी क्या देश के लिये खतरा थे जो उन्हे मौत के घाट उतार दिया.और फिर बाईक पिछले चक्के पर खडा भी कर र्दो तो भी गोली लगने से मौत हो जाये ऎसा जरुरी नही है?जरुर उसके नाज़ूक अंगो पर गोली लगी होगी.गुजरात में हुई हर मौत पर मोदी को हत्यारा कहते नही थकने वालो की ज़ुबान पर दिल्ली पुलिस और सरकार का नाम क्यों नही आ रहा है?क्या शीला दिक्षीत के लिये नियम अलग और नज़रिया अलग है?कब इस छद्म धर्मनिरपेक्षता से मुक्ति मिलेगी?
Monday, February 27, 2012
क्या आपने देखा है कभी रूदालियों को गोधरा-गुजरात के अलावा देश के किसी और हिस्से मे होने वाले अन्याय पर?
गोधरा-गोधरा-गोधरा.गुजरात-मोदी-दंगे-अल्पसंख्यक,अन्याय-न्याय.सुनसुन कर कान पक गये.एक ही गोधरा-गुजरात राग आलापता कथित धर्मनिरपेक्ष मीडिया किसी न किसी बहाने गोधरा रेल काण्ड के बाद फैले दंगो के ज़ख्मों पर मरहम लगाने के बहाने उसे कुरेदता आ रहा है और शायद इसी कारण उसके ज़ख्म हरे के हरे हैं.अच्छा है पीडितों को न्याय दिलाने की मुहिम चलाना अच्छा है,मगर क्या दंगे सिर्फ गुजरात में ही हुये हैं?क्या अल्पसंख्यको के साथ सिर्फ गुजरात मे ही अन्याय हुआ है?क्या कश्मीर के पण्डितो के साथ वो सब नही हुआ?क्या कश्मीरी पण्डितों की तरह इस देश में अपनी ज़मीन छोडने पर और कोई कौम मज़बूर हुई है?क्या उत्तर पूर्व में हिंदी भाषियों के साथ वो सब नही हो रहा है?क्या गुजरात के दंगों के अलावा सिक्खों के नरसंहार पर ऎसी रिपोर्ट किसी ने देखी है कभी मीडिया में?क्या कभी कभार कश्मीर के दंगा पीडितों पर भी इस तरह की बहस दिखेगी टीवी पर?क्या मानवाधिकार कार्यकर्ता कभी कश्मीरियों को न्याय दिलाने के लिये अपने कानूनी दांव पेंच का इस्तेमाल करेंगे?क्या गोधरा-गुजरात की तरह दिल्ली-कश्मीर और उत्तर पूर्व पर समय-समय पर ऎसे कार्यक्रम दिखा पायेगा?क्या अल्पसंख्यक याने सिर्फ मुसलमान या ईसाई ही होते है?क्या दिल्ली के सिक्ख,कश्मीर के पण्डित अल्पसंख्यक नही हैं?क्या धर्मनिरपेक्षता का मतलब सिर्फ मुसलमानो के हितो की बात करना है?फिर हिंदूओं के हितों की बात करना साम्प्रदायिकता क्यों?क्या आपने देखा है कभी रूदालियों को गोधरा-गुजरात के अलावा देश के किसी और हिस्से मे होने वाले अन्याय पर?मैंने तो नही देखा आज तक़.
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Sunday, September 18, 2011
क्या सिर्फ़ गुज़रात मे ही दगे गुये है?कोई तो बोलो,पंजाब नही तो दिल्ली या आसपास हुये दगों पर ही बोल दो
गुजरात माने दंगे!मोदी यानी नरसंहार!गोधरा रेल कांड का कोई माने नही,बेस्ट बेकरी कांड इंसानियत पर बदनुमा दाग!मोदी का उपवास नाटक!कांग्रेस का अनशन नाटक नही नाटक की पोल खोलने वाला!मोदी यानी राजनैतिक अछूत!और कभी दिल्ली से शुरु हुये राष्ट्रव्यापी दंगे!वो क्या नरसंहार नही थे!उन पर खामोशी के क्या मायने!उन दंगो पर कोई बहस नही!कोई कोर्ट-कचहरी नही!आखिर क्यों?क्या सिर्फ़ गुज़रात मे ही दगे गुये है?कोई तो बोलो,पंजाब नही तो दिल्ली या आसपास हुये दगों पर ही बोल दो।
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Sunday, August 29, 2010
गुजरात जैसे उन्न्त राज्य को पछाडने वाले छत्तीसगढ को क्या अब भी पिछड़ा कहेंगे?
नक्सलवाद से बुरी तरह ग्रस्त छत्तीसगढ विकास की दौड़ मे नये-नये रिकार्ड स्थापित कर रहा है।ये हम नही,छत्तीसगढ सरकार नही बल्कि केन्द्र सरकार का सांख्यिकी विभाग कह रहा है।विकास की दौड़ मे उसने गुजरात और महाराष्ट्र जैसे उन्न्त और विकसित कहलाने वाले राज्यों को पछाड कर जीडीपी यानी सकल घरेलू उत्पाद मे देश का अव्वल राज्य होने का खिताब भी अपने नाम कर लिया है।अब शायद राज्य के विपक्ष यानी कांग्रेस के नेताओं को समझ मे आया होगा कि दिल्ली से आने वाला हर केंद्रीय मंत्री छत्तीसगढ और मुख्यमंत्री डा रमन सिंह की तारीफ़ ही क्यों करता है।
छत्तीसगढ राज्य बनने के साथ ही समस्याओं से ग्रस्त एक अति पिछ्ड़े राज्य के रूप मे पहचाना जाता रहा।शुरू के ढाई साल कांग्रेस ने शासन किया और उसके बाद जनता ने उन्हे दोबारा मौका ही नही दिया।भाजपा ने सत्ता मे आने के बाद जिस तरह विकास के मोर्चे पे काम किया उसी तरह नक्सलवाद से जूझने मे उसने कोई कसर नही छोड़ी।मुख्यमंत्री पार्टी के अंदर के छिट्पुट असंतोष के साथ-साथ केन्द्र की यूपीये सरकार और उनकी पार्टी कांग्रेस से राज्य मे एक साथ जुझते रहे।इसी बीच उनके बेहद सरल व्यक्तित्व ने भी उनके लिये जनमानस मे अच्छी छवि बना दी और उनके नेतृत्व मे लड़े गये चुनाव मे जनता ने उन्हे दोबारा राज करने का मौका भी दिया।इस मौके को डा रमन सिंह ने बेकार नही जाने दिया और विकास के मामले मे उन्होने जमकर काम कराया जिसका नतीजा आज सकल घरेलू उत्पाद के मामले मे राज्य न केवल देश के अन्य सभी राज्यों से बल्कि देश के औसत भी बेहतर है ।
सच मे ये डा रमनसिंह के लिये अद्वितीय उपलब्धि ही है।राज्य बने हुये अभी मात्र दस साल ही हुये हैं और उन्हे सत्ता मे आए हुये सात साल।इतने कम समय मे सालों से और मीलों आगे दौड़ रहे विकसित राज्यों के न केवल बराबर पंहुचना बल्कि उन्हे पीछे छोड़ देना मामूली उपलब्धी नही है।इस उपलब्धि पर राज्य के लोग भी खुश हैं और मुख्यमंत्री को बधाई दे रहे हैं।
छत्तीसगढ की जिस तरह एक बेहद पिछड़े राज्य के रूप मे छ्द्म छवि बनाई गई थी उसे तोड़ने मे डा रमनसिंह सफ़ल रहें हैं।इसमे कोई शक़ नही राज्य का आधे से ज्यादा हिस्सा नक्सलवाद से प्रभावित है।इसमे कोई शक़ नही कि शहरी आबादी के मामले में अकेला मुम्बई छत्तीसगढ से मीलों आगे होगा,लेकिन सीमित साधनो से छत्तीसगढ सरकार्र ने जिस तरह काम किया है उससे विकसित कहलाने वाले साधन-सम्पन्न राज्यों को सीखना चाहिये।
इस उपलब्धि के बाद शायद लोग छत्तीसगढ को पिछड़ा कहने से पहले सोचेंगे।और अगर ये राज्य नक्सलवाद से मुक्त हो जाता है तो प्रचुर वन-संपदा और खनिजों के अकूत भंडारो से लबालब मेरे गरीब लोगों की अमीर धरती को कोई पिछड़ा कहने की हिम्मत नही कर सकेगा।तमाम राजनैतिक मतभेदों और आंदोलनों के बीच रमनसिंह और उनकी टीम ने बढिया काम किया है,वे बधाई के पात्र है और सभी कह रहे है शाबास रमनसिंह,जय छत्तीसगढ।आप क्या कहते हैं ये बताईयेगा ज़रूर्।
छत्तीसगढ राज्य बनने के साथ ही समस्याओं से ग्रस्त एक अति पिछ्ड़े राज्य के रूप मे पहचाना जाता रहा।शुरू के ढाई साल कांग्रेस ने शासन किया और उसके बाद जनता ने उन्हे दोबारा मौका ही नही दिया।भाजपा ने सत्ता मे आने के बाद जिस तरह विकास के मोर्चे पे काम किया उसी तरह नक्सलवाद से जूझने मे उसने कोई कसर नही छोड़ी।मुख्यमंत्री पार्टी के अंदर के छिट्पुट असंतोष के साथ-साथ केन्द्र की यूपीये सरकार और उनकी पार्टी कांग्रेस से राज्य मे एक साथ जुझते रहे।इसी बीच उनके बेहद सरल व्यक्तित्व ने भी उनके लिये जनमानस मे अच्छी छवि बना दी और उनके नेतृत्व मे लड़े गये चुनाव मे जनता ने उन्हे दोबारा राज करने का मौका भी दिया।इस मौके को डा रमन सिंह ने बेकार नही जाने दिया और विकास के मामले मे उन्होने जमकर काम कराया जिसका नतीजा आज सकल घरेलू उत्पाद के मामले मे राज्य न केवल देश के अन्य सभी राज्यों से बल्कि देश के औसत भी बेहतर है ।
सच मे ये डा रमनसिंह के लिये अद्वितीय उपलब्धि ही है।राज्य बने हुये अभी मात्र दस साल ही हुये हैं और उन्हे सत्ता मे आए हुये सात साल।इतने कम समय मे सालों से और मीलों आगे दौड़ रहे विकसित राज्यों के न केवल बराबर पंहुचना बल्कि उन्हे पीछे छोड़ देना मामूली उपलब्धी नही है।इस उपलब्धि पर राज्य के लोग भी खुश हैं और मुख्यमंत्री को बधाई दे रहे हैं।
छत्तीसगढ की जिस तरह एक बेहद पिछड़े राज्य के रूप मे छ्द्म छवि बनाई गई थी उसे तोड़ने मे डा रमनसिंह सफ़ल रहें हैं।इसमे कोई शक़ नही राज्य का आधे से ज्यादा हिस्सा नक्सलवाद से प्रभावित है।इसमे कोई शक़ नही कि शहरी आबादी के मामले में अकेला मुम्बई छत्तीसगढ से मीलों आगे होगा,लेकिन सीमित साधनो से छत्तीसगढ सरकार्र ने जिस तरह काम किया है उससे विकसित कहलाने वाले साधन-सम्पन्न राज्यों को सीखना चाहिये।
इस उपलब्धि के बाद शायद लोग छत्तीसगढ को पिछड़ा कहने से पहले सोचेंगे।और अगर ये राज्य नक्सलवाद से मुक्त हो जाता है तो प्रचुर वन-संपदा और खनिजों के अकूत भंडारो से लबालब मेरे गरीब लोगों की अमीर धरती को कोई पिछड़ा कहने की हिम्मत नही कर सकेगा।तमाम राजनैतिक मतभेदों और आंदोलनों के बीच रमनसिंह और उनकी टीम ने बढिया काम किया है,वे बधाई के पात्र है और सभी कह रहे है शाबास रमनसिंह,जय छत्तीसगढ।आप क्या कहते हैं ये बताईयेगा ज़रूर्।
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Thursday, June 3, 2010
ढोकला सिर्फ़ आपको ही नही हमे भी अच्छा लगता है!
ढोकला!सुनते ही मुंह मे पानी आ जाता है।नर्म और ताज़े ढोकले हो और दोस्तो का साथ हो तो फ़िर कहना ही क्या है!ढोकला अब गुजरात की डिश नही रह गया है और इसकी डिमांड हर जगह होने लगी है।ढोकले की दावत उड़ाने मे कोई पीछे नही रहता।ढोकला अब एक कामन और पाप्यूलर डिश बन गया है और बिना इसके नाश्ते का मज़ा ही नही आता।प्रेस क्लब मे भी सारे सदस्य जब ढोकले पर हाथ साफ़ कर रहे थे तो हमारे क्लब मे ही हमेशा मटरगश्ती करने वाले एक सज्जन जो क्लब के सदस्य नही है पास मे ही धींगा-मस्ती करते नज़र आये।फ़ोटोग्राफ़र राजेश सोनकर का ध्यान उन पर गया तो वो समझ गया कि उन महाशय को भी ढोकला चाहिये।सो राजेश ने उन्हे ढोकला आफ़र कर दिया और उन्होने भी ढोकले पर हाथ साफ़ करके बता दिया कि ढोकला सिर्फ़ हमे नही उन्हे भी बहुत पसंद है।आप खुद देख लिजिये कैसे मज़े से च
ट्खारे ले-लेकर
ढोकले का स्वाद लिया जा रहा है।
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Wednesday, September 9, 2009
पाक का झंडा फ़हराते न दिखाना हो तो मत दिखाओ,मगर पाक मे छपे लाखो रूपये के नकली पकड़ाने की खबर तो दिखाओ देश के असली ठेकेदारों
कोल्हापुर के मिरज़ मे पाकिस्तान का झंड़ा फ़हराने की खबरो को मीड़िया ने दबा दिया।कोई बात नही हो सकता है कि इससे उनके हिसाब से तनाव फ़ैल जाता मगर छत्तीसगढ मे पाक मे छपे दो लाख के नकली नोट पकडाने की खबर किस लिये नही दिखाई जा रही है समझ के परे है।
पाक सीमा के आसपास नही देश के हृदयस्थल छतीसगढ तक़ पाक मे छपे नकली नोटो का पंहुच जाना इस बात का सबूत है कि उन लोगो की पकड़ कितनी गहरी है।नकली नोट यंहा सालो से चलाये जा रहे हैं।हाल मे पकड़ाये नकली नोट स्कैन किये हुये मिले मगर इस बार पकड़ाये नोट छापे हुये हैं।ये बात चिंताजनक है और तारीफ़ करनी होगी पुलिस की बंगाल के माल्दा इलाके से आये मात्र उन्नीस साल के एक युवक शेख बोरजंहा को उसने कुछ ही घण्टो मे पकड लिया।उसका एक साथी फ़रार होने मे सफ़ल हो गया है।एस पी अमित कुमार और उनकी टीम इस मामले की जांच मे भीड़ी हुई है।
अब सवाल ये उठता है कि क्या ये खबर बड़ी नही है।एक न्यूज़ चैनल कल से दहाड़ मार-मार कर रो रहा है कि गुजरात मे हुआ एनकाऊंटर फ़र्ज़ी था।उसका रोना जारी है और अब उसने एक नया राग आलापना शुरू कर दिया है।उसका कहना है कि मामले का सच साम्ने आना आधा न्याय है ,पूरा न्याय तब कहलायेगा जब आरोपियों को सज़ा मिलेगी।उन्होने बाक़ायदा सवाल भी पूछने शुरू कर दिये हैं।ठीक है सही कर रहे है दोषियों को सज़ा मिलनी ही चाहिये लेकिन क्या ये नियम सिर्फ़ गुजरात के लिये लागू है?क्या महाराष्ट्र के कोल्हापुर मे गणेश जी की मुर्तियों को तोड़ने की घटना को नही दिखया गया?क्या सिर्फ़ इस्लिये कि इससे दंगे भड़क सकते थे?क्यो वंहा पुलिस की जीप पर चढ कर पाकिस्तान का झंड़ा लहराने की घट्ना को नही दिखाया गया?क्या इससे हिंदू भड़क़ जाते?क्या इस देश मे पाकिस्तान का झंडा ,वो भी दंगा करके,पुलिस की जीप पर चढ कर लहराने की एक वर्ग विशेष को छूट दे दी गई है?और भी बहुत से सवाल है,जो इस देश मे मीडिया की भूमिका पर सवाल खड़े करता है।
लाखो रूपये के नकली नोट पकड़ा रहे है,वो दिखाने का टाईम नही है।और किसी के भी बेडरूम तक़ मे घूसे जा रहे है भाई लोग्।एक भाजपा नेत्री को अश्लील एम एम एस मे घसीट दिया पता नही किसका था,बस अनुमान लगाया और कर दिया खड़ा बखेड़ा।एक अफ़सर की अपनी पत्नी के साथ अतरंग क्षणो की फ़िल्म मिली,तड़ से दिखा दिया,न तो उसकी बीबी ने शिकायत की थी और न ही उसके परिवार मे किसी ने।बस कुछ ठेकेदारो ने भुगतान रोकने वाले अफ़सर को ब्लैकमेल करना चाहा और सफ़ल नही होने पर मिडिया को फ़िल्म मुहैया करा दी और मामला समाज-सुधार का हो गया,ब्लैकमेलिंग का नही।
ऐसे एक नही सैकडो उदाहरण है मगर क्या करें,मीडिया को तो पिलीया हो चुका हैउसे तो पीला ही नज़र आयेगा।आज सुबह से मै नेशनल न्यूज़ चैनलो पर नकली नोटो की खबर ढूंढ रहा हुं,जंहा से शेख नकली नोत लेकर आया है उस जगह माल्दा की खबर आ गई मगर रायपुर की नही।गुस्सा तो था ही सुरेश चिपलुणकर की पोस्ट पढ कर गुस्सा और बढ गया तो मै भी लिख बैठा।मुझे लिंक देना आता नही इसलिये क्षमा चाहता हूं,मगर आपसे अनुरोध ज़रूर करूंगा कि सुरेश जी के ब्लाग पर ज़रूर जाकर उनकी पोस्ट को पढे।
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