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Saturday, January 28, 2012
अगर यु पी के लोग महाराष्ट्र में मज़दूरी करने की वजह से आपको भिखरी नज़र आये तो इटली में मज़दूरी करते पंजाबी लोग आपको भिखारी क्यों नही लगे?
वाह क्या कहना है आपका राहुल जी!मान गये आपको!अगर यु पी का आदमी रोज़गार के लिये महाराष्ट्र जाता है तो आप कहते है कि यु पी के लोग महाराष्ट्र में भीख मांग रहे हैं और जब आप को पंजाब के लोग इटली के खेतों में मज़दूरी करते नज़र आते है तो आप कहते हैं कि पंजाब के लोग इटली को चला रहे हैं.अगर यु पी के लोग महाराष्ट्र में मज़दूरी करने की वजह से आपको भिखरी नज़र आये तो इटली में मज़दूरी करते पंजाबी लोग आपको भिखारी क्यों नही लगे?एक ही काम के लिये आपके दो दो नज़रिये क्यों?एक ही काम के लिये आपकी दो दो परिभाषा क्यों?कंही इसलिये तो नही कि आप भी दो नस्लो के प्रतिनिधी हैं?कंही इसलिये तो नही कि इटली आपका ननिहाल है?आखिर क्यों फर्क़ है आपके नज़रिये में?क्या सिर्फ चुनावी नज़रिया है?पंजाब के लोगों की तारीफ और युपी के लोगो के ज़ख्मों को कुरेद कर उसपर मरहम लगा कर सिर्फ और सिर्फ वोट बटोरना ही आपका उद्देश्य है?
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Sunday, November 27, 2011
अफ़सोस!वृद्धाश्रम बनते जा रहे हैं गाँव!कैसे कहें कि भारत गांवों में बसता है?
गाँव अब गाँव नहीं रहे बल्कि वृध्दाश्रम बनते जा रहे हैं। ऐसा मुझे सोमवार को लगा जब मैं अपने ननिहाल गया । वहां जाकर ऐसा लगा कि गाँव को किसी की नज़र लग गई है। गांव में जिस भी घर में गया वहां बुजुर्गों के अलावा कोई नहीं मिला। बचपन के संगी-साथियों में से कोई रोजी-रोटी के लिए तो कोई बच्चों की शिक्षा-दीक्षा के बहाने गाँव छोड़ चुका था।
एकदम अजनबी सा लगने लगा था मुझे अपना ननिहाल। छोटा सा गाँव धानोरा मेरा ननिहाल है महाराष्ट्र के अमरावती जिले में। बचपन से लेकर जवानी तक गर्मियों और दीपावली की छुट्टियाँ मैने वहीं बिताई थी। शहर के फुटबॉल, क्रिकेट को छोड़कर गांव की अमराइयों में, डाब-डुबली, (पेड़ों पर छूकर आऊट करने का खेल) और गिल्ली डंडा खेला करते थे। थक जाते तो पास में बहती छोटी सी खोलाट नदी के किनारों और कहीं-कहीं जमा पानी में तैरा करते थे। तैरना भी मुझे गाँव के ही दूर के मौसेरे भाई विनोद और अविनाश ने सिखाया था। खेल और तैरकर थक कर चूर होकर लौटते समय जिस घर में पहले खाना बना मिलता वहीं खा लेते थे। पता ही नहीं चलता था कब दिन निकलता था और कब रात होती थी। और फिर कब दूसरा दिन निकल आता।
गर्मियों के दो महीने की और दीपावली की एक महीने की छुट्टियाँ गाँव में ही बीतती थी। पूरे गाँव का भांजा था मैं। सभी घरों में आना-जाना, खाना और सभी से उतना ही प्यार मिलता था। एकदम शुध्द प्यार। कभी-कभी खेतों पर काम करने वालों के साथ भी खाना खा लेता था। वो तीखी मिर्च का ठेसा और ज्वार की रोटियों का स्वाद भूलाए नहीं भूलता। दीपावली की छुट्टियाँ खत्म होते ही गर्मियों का इंतजार रहता था और गर्मियाँ खत्म होते ही दीपावली का।
सब कुछ एकाएक बदला सा लगने लगा था। जब मैं सालों बाद कुछ दिनों के लिए गाँव में रूका। बगल में रहने वाली अनु मावशी (मराठी में मौसी को मावशी कहते हैं) के घर पर ताला लटका था पता चला कि वो जानवरों के लिए बने बाड़े में कमरा बनवाकर रहने लगी है। विन्या ,पम्या के बारे में पूछा तो दोनों बगल के तहसील मुख्यालय में रहने लगे हैं। खुद गाँव में पढ़कर बड़े हुए पम्या और विन्या को अब गाँव का स्कूल पसंद नहीं आ रहा है। बच्चों की खातिर उस माँ को छोड़कर चले गए जिसने उन्हें पाल-पोसकर बच्चे से बड़ा बनाया। आगे निकलकर गाँव के जाने-माने मराठा परिवार के यहाँ गया, वहाँ भी वही हाल था। और यही हाल गाँव के बड़े साहुकार परिवार का था। परिवार के मुखिया नहीं रहे थे। उनका बड़ा लड़का गाँव का सरपंच बन गया था। सोचा उससे मुलाकात हो जाएगी। लेकिन वो भी वापस शहर जा चुका था। वो शहर से कुछ घंटों के लिए रोज गाँव आता है। दिवाकर से प्रभाकर और अनिल से सुनील पक्या (प्रकाश ) से मन्या (मनोहर) सभी रोजी-रोटी और बच्चों की शिक्षा-दीक्षा के लिए शहर में बस गए थे।
अनु मावशी से मिला तो दिमाग खराब हो गया। हमेशा हंसते-खिलखिलाते रहने वाली अनु मावशी खटिया पकड़ चुकी है। उनका सबसे बड़ा लड़का भाऊ जरूर उनके बगल में मकान बनाकर रहता है। मगर वो बंटवारे से नाराज चल रहा है।वहिनी (भाभी) का भी यही हाल है। भाऊ का कहना है छोटे भाईयों की पढ़ाई के लिए उन्होंने पढ़ाई छोड़ी थी। और अब जब बंटवारा हुआ तो भी छोटों को मन पसंद खेत और मकान दे दिए गए। वे यहाँ बाड़े में आ गए हैं। दोनों के बारे में मावशी की राय ठीक नहीं थी। और पम्या व विन्या के बारे में तो और गलत।
पुराने दिनों को याद कर अनु मावशी रो पड़ी थी रोते-रोते ही उन्होंने एक कड़वा सच भी कह दिया। उन्होंने कहा कि गाँव अब बूढ़े लोगों का बसेरा हो गया है। जवानों को तो शहर की हवा लग गई है। हम लोग यहाँ पुराने ढह रहे मकानों की चौकीदारी करते आखिरी सांस का इंतजार कर रहे हैं। उनसे मिलकर लौटते समय अच्छा नहीं लग रहा था। नदी की ओर गया तो छोटे से स्टाप डेम ने नदी को भी गाँव की महिलाओं की तरह बूढ़ी बना दिया था। अमराईयां अचानक बबूल के जंगलों की तरह नज़र आने लगी थी। रेखा मावशी से मिलकर जब वापस लौटने लगा तो मन और खट्टा हो चला था। उनके बाड़े में बहुत सी दीवारें उठ गई थी। दीवारें जो सिर्फ घरों को ही नहीं दिलों को भी बांट चुकी थी। गाँव में अब बड़े-बड़े बाड़े नहीं रह गए। बाड़े तो क्या अब गोठान भी नहीं रहा। वहाँ गोधुली बेला में अब धूल नहीं उठती। गाय-बछड़ों के गले की घंटियाँ लाजवाब संगीत नहीं छेड़ती। अब उठता है ट्रक, ट्रैक्टर या बसों के आने के बाद धूल का गुबार और घंटियों के सुमधुर संगीत के बजाय सुनाई पड़ते हैं कर्कश हॉर्न। अब गाँव के ग्राम पंचायत का रेडियो भी नहीं बजता। लोग रात को विविध भारती या ऑल इंडिया रेडियो के गानों का इंतजार नहीं करते।अधिकांश घरों में टीवी आ गया है। इसलिए शाम होने के बाद लोग ग्राम पंचायत भवन में इकठ्ठा भी नहीं होते। गाँव के बदल जाने का सदमा लिए मैं वापस लौट रहा था। गाँव से शहर आने के रास्ते में अंबापुर वाले मारूति के दर्शन किए। वहाँ मुझे अपने सगे मामा अरविंद के बाल सखा सुरेश मानकर मिल गए। बाकी कसर उन्होंने पूरी कर दी। मैने पूछा मामा यहाँ? गाँव......... बीच में मेरी बात काटते हुए उन्होंने कहा गाँव में रखा ही क्या है भांजे? बस अब बजरंगबली की सेवा करता हूँ। ये अच्छा है, इसके पास न छल है न कपट। मैं हक्का-बक्का था। धीरे से पूछा गाँव के लोग कुछ बदले से नज़र आए। अपनी आदत के अनुसार उन्होंने जोरदार ठहाका लगाया और गाँव के बदलने का महत्वपूर्ण कारण भी बता दिया। उन्होंने कहा कि पंचायत के चुनावों के बाद गाँव में कई पार्टियाँ बन गई है। और बाकी कसर दारू ने पूरी कर दी। अच्छा है तुम लोग शहर में रहते हो ,वहीं रहो ज्यादा अच्छा है। गाँव में अब कुछ नहीं रखा है। उनकी बातें मेरे कानों में अब भी गूँज रही है। अब जबकि मैं लगभग साढ़े 4 सौ किलोमीटर दूर वापस रायपुर आ गया हूँ। मुझे लगता है कमोबेश यही हालत हर गाँव की होती जा रही है।(ये पोस्ट 15 जुलाई 2008 को लिखी थी।इस बार भी गांव जाकर कुछ दिन रुकना चाहा मगर हालत बिल्कुल वैसी ही थी,हां अब अनु मावशी इस दुनिया में नही रही)पार्टीबज़ियों के कारण बहुत से मामा जिनकी गोद में मेरा बचपन गुज़रा,उन्होने सिर्फ़ मुस्कुरा कर इतना ही पूछा कब आया और कौन-कौन आया?बस न घर चलने के किये कहा और ना कोई बात।पंचायत चुनावों का ये दुष्परिणाम शायद मैने पहली बार महसूस किया है गांव के कई टुकड़े हो चुके है।लिखने को बहुत कुछ है मगर बचपन याद कर दिल भर आता है,शायद इसिलिये नया कुछ ना लिखते हुये पुरानी पोस्ट रिठेल कर रहा हूं,हो सकता है आप लोग मुझसे ज्यादा खुशकिस्मत हो,जो आपका गांव ना बदला हो।अगर ऐसा कुछ हो तो मुझे भी बताईयेगा।
एकदम अजनबी सा लगने लगा था मुझे अपना ननिहाल। छोटा सा गाँव धानोरा मेरा ननिहाल है महाराष्ट्र के अमरावती जिले में। बचपन से लेकर जवानी तक गर्मियों और दीपावली की छुट्टियाँ मैने वहीं बिताई थी। शहर के फुटबॉल, क्रिकेट को छोड़कर गांव की अमराइयों में, डाब-डुबली, (पेड़ों पर छूकर आऊट करने का खेल) और गिल्ली डंडा खेला करते थे। थक जाते तो पास में बहती छोटी सी खोलाट नदी के किनारों और कहीं-कहीं जमा पानी में तैरा करते थे। तैरना भी मुझे गाँव के ही दूर के मौसेरे भाई विनोद और अविनाश ने सिखाया था। खेल और तैरकर थक कर चूर होकर लौटते समय जिस घर में पहले खाना बना मिलता वहीं खा लेते थे। पता ही नहीं चलता था कब दिन निकलता था और कब रात होती थी। और फिर कब दूसरा दिन निकल आता।
गर्मियों के दो महीने की और दीपावली की एक महीने की छुट्टियाँ गाँव में ही बीतती थी। पूरे गाँव का भांजा था मैं। सभी घरों में आना-जाना, खाना और सभी से उतना ही प्यार मिलता था। एकदम शुध्द प्यार। कभी-कभी खेतों पर काम करने वालों के साथ भी खाना खा लेता था। वो तीखी मिर्च का ठेसा और ज्वार की रोटियों का स्वाद भूलाए नहीं भूलता। दीपावली की छुट्टियाँ खत्म होते ही गर्मियों का इंतजार रहता था और गर्मियाँ खत्म होते ही दीपावली का।
सब कुछ एकाएक बदला सा लगने लगा था। जब मैं सालों बाद कुछ दिनों के लिए गाँव में रूका। बगल में रहने वाली अनु मावशी (मराठी में मौसी को मावशी कहते हैं) के घर पर ताला लटका था पता चला कि वो जानवरों के लिए बने बाड़े में कमरा बनवाकर रहने लगी है। विन्या ,पम्या के बारे में पूछा तो दोनों बगल के तहसील मुख्यालय में रहने लगे हैं। खुद गाँव में पढ़कर बड़े हुए पम्या और विन्या को अब गाँव का स्कूल पसंद नहीं आ रहा है। बच्चों की खातिर उस माँ को छोड़कर चले गए जिसने उन्हें पाल-पोसकर बच्चे से बड़ा बनाया। आगे निकलकर गाँव के जाने-माने मराठा परिवार के यहाँ गया, वहाँ भी वही हाल था। और यही हाल गाँव के बड़े साहुकार परिवार का था। परिवार के मुखिया नहीं रहे थे। उनका बड़ा लड़का गाँव का सरपंच बन गया था। सोचा उससे मुलाकात हो जाएगी। लेकिन वो भी वापस शहर जा चुका था। वो शहर से कुछ घंटों के लिए रोज गाँव आता है। दिवाकर से प्रभाकर और अनिल से सुनील पक्या (प्रकाश ) से मन्या (मनोहर) सभी रोजी-रोटी और बच्चों की शिक्षा-दीक्षा के लिए शहर में बस गए थे।
अनु मावशी से मिला तो दिमाग खराब हो गया। हमेशा हंसते-खिलखिलाते रहने वाली अनु मावशी खटिया पकड़ चुकी है। उनका सबसे बड़ा लड़का भाऊ जरूर उनके बगल में मकान बनाकर रहता है। मगर वो बंटवारे से नाराज चल रहा है।वहिनी (भाभी) का भी यही हाल है। भाऊ का कहना है छोटे भाईयों की पढ़ाई के लिए उन्होंने पढ़ाई छोड़ी थी। और अब जब बंटवारा हुआ तो भी छोटों को मन पसंद खेत और मकान दे दिए गए। वे यहाँ बाड़े में आ गए हैं। दोनों के बारे में मावशी की राय ठीक नहीं थी। और पम्या व विन्या के बारे में तो और गलत।
पुराने दिनों को याद कर अनु मावशी रो पड़ी थी रोते-रोते ही उन्होंने एक कड़वा सच भी कह दिया। उन्होंने कहा कि गाँव अब बूढ़े लोगों का बसेरा हो गया है। जवानों को तो शहर की हवा लग गई है। हम लोग यहाँ पुराने ढह रहे मकानों की चौकीदारी करते आखिरी सांस का इंतजार कर रहे हैं। उनसे मिलकर लौटते समय अच्छा नहीं लग रहा था। नदी की ओर गया तो छोटे से स्टाप डेम ने नदी को भी गाँव की महिलाओं की तरह बूढ़ी बना दिया था। अमराईयां अचानक बबूल के जंगलों की तरह नज़र आने लगी थी। रेखा मावशी से मिलकर जब वापस लौटने लगा तो मन और खट्टा हो चला था। उनके बाड़े में बहुत सी दीवारें उठ गई थी। दीवारें जो सिर्फ घरों को ही नहीं दिलों को भी बांट चुकी थी। गाँव में अब बड़े-बड़े बाड़े नहीं रह गए। बाड़े तो क्या अब गोठान भी नहीं रहा। वहाँ गोधुली बेला में अब धूल नहीं उठती। गाय-बछड़ों के गले की घंटियाँ लाजवाब संगीत नहीं छेड़ती। अब उठता है ट्रक, ट्रैक्टर या बसों के आने के बाद धूल का गुबार और घंटियों के सुमधुर संगीत के बजाय सुनाई पड़ते हैं कर्कश हॉर्न। अब गाँव के ग्राम पंचायत का रेडियो भी नहीं बजता। लोग रात को विविध भारती या ऑल इंडिया रेडियो के गानों का इंतजार नहीं करते।अधिकांश घरों में टीवी आ गया है। इसलिए शाम होने के बाद लोग ग्राम पंचायत भवन में इकठ्ठा भी नहीं होते। गाँव के बदल जाने का सदमा लिए मैं वापस लौट रहा था। गाँव से शहर आने के रास्ते में अंबापुर वाले मारूति के दर्शन किए। वहाँ मुझे अपने सगे मामा अरविंद के बाल सखा सुरेश मानकर मिल गए। बाकी कसर उन्होंने पूरी कर दी। मैने पूछा मामा यहाँ? गाँव......... बीच में मेरी बात काटते हुए उन्होंने कहा गाँव में रखा ही क्या है भांजे? बस अब बजरंगबली की सेवा करता हूँ। ये अच्छा है, इसके पास न छल है न कपट। मैं हक्का-बक्का था। धीरे से पूछा गाँव के लोग कुछ बदले से नज़र आए। अपनी आदत के अनुसार उन्होंने जोरदार ठहाका लगाया और गाँव के बदलने का महत्वपूर्ण कारण भी बता दिया। उन्होंने कहा कि पंचायत के चुनावों के बाद गाँव में कई पार्टियाँ बन गई है। और बाकी कसर दारू ने पूरी कर दी। अच्छा है तुम लोग शहर में रहते हो ,वहीं रहो ज्यादा अच्छा है। गाँव में अब कुछ नहीं रखा है। उनकी बातें मेरे कानों में अब भी गूँज रही है। अब जबकि मैं लगभग साढ़े 4 सौ किलोमीटर दूर वापस रायपुर आ गया हूँ। मुझे लगता है कमोबेश यही हालत हर गाँव की होती जा रही है।(ये पोस्ट 15 जुलाई 2008 को लिखी थी।इस बार भी गांव जाकर कुछ दिन रुकना चाहा मगर हालत बिल्कुल वैसी ही थी,हां अब अनु मावशी इस दुनिया में नही रही)पार्टीबज़ियों के कारण बहुत से मामा जिनकी गोद में मेरा बचपन गुज़रा,उन्होने सिर्फ़ मुस्कुरा कर इतना ही पूछा कब आया और कौन-कौन आया?बस न घर चलने के किये कहा और ना कोई बात।पंचायत चुनावों का ये दुष्परिणाम शायद मैने पहली बार महसूस किया है गांव के कई टुकड़े हो चुके है।लिखने को बहुत कुछ है मगर बचपन याद कर दिल भर आता है,शायद इसिलिये नया कुछ ना लिखते हुये पुरानी पोस्ट रिठेल कर रहा हूं,हो सकता है आप लोग मुझसे ज्यादा खुशकिस्मत हो,जो आपका गांव ना बदला हो।अगर ऐसा कुछ हो तो मुझे भी बताईयेगा।
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Sunday, August 29, 2010
गुजरात जैसे उन्न्त राज्य को पछाडने वाले छत्तीसगढ को क्या अब भी पिछड़ा कहेंगे?
नक्सलवाद से बुरी तरह ग्रस्त छत्तीसगढ विकास की दौड़ मे नये-नये रिकार्ड स्थापित कर रहा है।ये हम नही,छत्तीसगढ सरकार नही बल्कि केन्द्र सरकार का सांख्यिकी विभाग कह रहा है।विकास की दौड़ मे उसने गुजरात और महाराष्ट्र जैसे उन्न्त और विकसित कहलाने वाले राज्यों को पछाड कर जीडीपी यानी सकल घरेलू उत्पाद मे देश का अव्वल राज्य होने का खिताब भी अपने नाम कर लिया है।अब शायद राज्य के विपक्ष यानी कांग्रेस के नेताओं को समझ मे आया होगा कि दिल्ली से आने वाला हर केंद्रीय मंत्री छत्तीसगढ और मुख्यमंत्री डा रमन सिंह की तारीफ़ ही क्यों करता है।
छत्तीसगढ राज्य बनने के साथ ही समस्याओं से ग्रस्त एक अति पिछ्ड़े राज्य के रूप मे पहचाना जाता रहा।शुरू के ढाई साल कांग्रेस ने शासन किया और उसके बाद जनता ने उन्हे दोबारा मौका ही नही दिया।भाजपा ने सत्ता मे आने के बाद जिस तरह विकास के मोर्चे पे काम किया उसी तरह नक्सलवाद से जूझने मे उसने कोई कसर नही छोड़ी।मुख्यमंत्री पार्टी के अंदर के छिट्पुट असंतोष के साथ-साथ केन्द्र की यूपीये सरकार और उनकी पार्टी कांग्रेस से राज्य मे एक साथ जुझते रहे।इसी बीच उनके बेहद सरल व्यक्तित्व ने भी उनके लिये जनमानस मे अच्छी छवि बना दी और उनके नेतृत्व मे लड़े गये चुनाव मे जनता ने उन्हे दोबारा राज करने का मौका भी दिया।इस मौके को डा रमन सिंह ने बेकार नही जाने दिया और विकास के मामले मे उन्होने जमकर काम कराया जिसका नतीजा आज सकल घरेलू उत्पाद के मामले मे राज्य न केवल देश के अन्य सभी राज्यों से बल्कि देश के औसत भी बेहतर है ।
सच मे ये डा रमनसिंह के लिये अद्वितीय उपलब्धि ही है।राज्य बने हुये अभी मात्र दस साल ही हुये हैं और उन्हे सत्ता मे आए हुये सात साल।इतने कम समय मे सालों से और मीलों आगे दौड़ रहे विकसित राज्यों के न केवल बराबर पंहुचना बल्कि उन्हे पीछे छोड़ देना मामूली उपलब्धी नही है।इस उपलब्धि पर राज्य के लोग भी खुश हैं और मुख्यमंत्री को बधाई दे रहे हैं।
छत्तीसगढ की जिस तरह एक बेहद पिछड़े राज्य के रूप मे छ्द्म छवि बनाई गई थी उसे तोड़ने मे डा रमनसिंह सफ़ल रहें हैं।इसमे कोई शक़ नही राज्य का आधे से ज्यादा हिस्सा नक्सलवाद से प्रभावित है।इसमे कोई शक़ नही कि शहरी आबादी के मामले में अकेला मुम्बई छत्तीसगढ से मीलों आगे होगा,लेकिन सीमित साधनो से छत्तीसगढ सरकार्र ने जिस तरह काम किया है उससे विकसित कहलाने वाले साधन-सम्पन्न राज्यों को सीखना चाहिये।
इस उपलब्धि के बाद शायद लोग छत्तीसगढ को पिछड़ा कहने से पहले सोचेंगे।और अगर ये राज्य नक्सलवाद से मुक्त हो जाता है तो प्रचुर वन-संपदा और खनिजों के अकूत भंडारो से लबालब मेरे गरीब लोगों की अमीर धरती को कोई पिछड़ा कहने की हिम्मत नही कर सकेगा।तमाम राजनैतिक मतभेदों और आंदोलनों के बीच रमनसिंह और उनकी टीम ने बढिया काम किया है,वे बधाई के पात्र है और सभी कह रहे है शाबास रमनसिंह,जय छत्तीसगढ।आप क्या कहते हैं ये बताईयेगा ज़रूर्।
छत्तीसगढ राज्य बनने के साथ ही समस्याओं से ग्रस्त एक अति पिछ्ड़े राज्य के रूप मे पहचाना जाता रहा।शुरू के ढाई साल कांग्रेस ने शासन किया और उसके बाद जनता ने उन्हे दोबारा मौका ही नही दिया।भाजपा ने सत्ता मे आने के बाद जिस तरह विकास के मोर्चे पे काम किया उसी तरह नक्सलवाद से जूझने मे उसने कोई कसर नही छोड़ी।मुख्यमंत्री पार्टी के अंदर के छिट्पुट असंतोष के साथ-साथ केन्द्र की यूपीये सरकार और उनकी पार्टी कांग्रेस से राज्य मे एक साथ जुझते रहे।इसी बीच उनके बेहद सरल व्यक्तित्व ने भी उनके लिये जनमानस मे अच्छी छवि बना दी और उनके नेतृत्व मे लड़े गये चुनाव मे जनता ने उन्हे दोबारा राज करने का मौका भी दिया।इस मौके को डा रमन सिंह ने बेकार नही जाने दिया और विकास के मामले मे उन्होने जमकर काम कराया जिसका नतीजा आज सकल घरेलू उत्पाद के मामले मे राज्य न केवल देश के अन्य सभी राज्यों से बल्कि देश के औसत भी बेहतर है ।
सच मे ये डा रमनसिंह के लिये अद्वितीय उपलब्धि ही है।राज्य बने हुये अभी मात्र दस साल ही हुये हैं और उन्हे सत्ता मे आए हुये सात साल।इतने कम समय मे सालों से और मीलों आगे दौड़ रहे विकसित राज्यों के न केवल बराबर पंहुचना बल्कि उन्हे पीछे छोड़ देना मामूली उपलब्धी नही है।इस उपलब्धि पर राज्य के लोग भी खुश हैं और मुख्यमंत्री को बधाई दे रहे हैं।
छत्तीसगढ की जिस तरह एक बेहद पिछड़े राज्य के रूप मे छ्द्म छवि बनाई गई थी उसे तोड़ने मे डा रमनसिंह सफ़ल रहें हैं।इसमे कोई शक़ नही राज्य का आधे से ज्यादा हिस्सा नक्सलवाद से प्रभावित है।इसमे कोई शक़ नही कि शहरी आबादी के मामले में अकेला मुम्बई छत्तीसगढ से मीलों आगे होगा,लेकिन सीमित साधनो से छत्तीसगढ सरकार्र ने जिस तरह काम किया है उससे विकसित कहलाने वाले साधन-सम्पन्न राज्यों को सीखना चाहिये।
इस उपलब्धि के बाद शायद लोग छत्तीसगढ को पिछड़ा कहने से पहले सोचेंगे।और अगर ये राज्य नक्सलवाद से मुक्त हो जाता है तो प्रचुर वन-संपदा और खनिजों के अकूत भंडारो से लबालब मेरे गरीब लोगों की अमीर धरती को कोई पिछड़ा कहने की हिम्मत नही कर सकेगा।तमाम राजनैतिक मतभेदों और आंदोलनों के बीच रमनसिंह और उनकी टीम ने बढिया काम किया है,वे बधाई के पात्र है और सभी कह रहे है शाबास रमनसिंह,जय छत्तीसगढ।आप क्या कहते हैं ये बताईयेगा ज़रूर्।
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Wednesday, July 8, 2009
मिलिये युवा कार्टूनिस्ट निशांत होता से
निशांत हमारे बगल के घर के बगल मे रहते हैं। लगभग साल भर अगल-बगल रहने के बाद भी कभी परिचय का मौका नही आया था। उनके पिता से जरूर बात हो जाती थी। अभी हाल मे कालोनी की खस्ता-हाल सड़को मे से एक अपने घर के सामने वाली सड़क को जब हमने बनवाना शुरू किया तो उनसे परिचय हुआ।दरअसल उन्का विवाह तय हो चुका था और सड़क बनाने की सरकारी रफ़्तार से वे चिंतित थे। मैने उन्हे आश्वस्त किया कि उनके विवाह के पहले सड़क बन जायेगी। इस दौरान काफ़ी बात हुई और मैने उन्हे ब्लाग के बारे मे बताया। उन्होने अपने कार्टून ब्लाग पर डालने की इच्छा जताई। फ़िलहाल वे मेरे ब्लाग पर कार्टून पोस्ट करके शुरूआत कर रहे हैं।ज़ल्द ही उनका अपना ब्लाग होगा। ये मेरे लिये भी गर्व की बात है कि मैने अपने पड़ोसी तक़ को ब्लागर बना ड़ाला।निशांत यंहा छत्तीसगढ,मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र से प्रकाशित होने वाले मध्य-भारत के लोकप्रिय अख़बार नव-भारत के लिये कार्टून बनाते हैं।न्यायिक सेवा मे जाना उनका लक्ष्य है और उसकी तैयारी मे जुटे है। निशांत युवा जरूर है मगर विषयों के मामले मे काफ़ी परिपक्व हैं।ताज़ा घटनाक्रम पर तो उन्की नज़र रहती ही है,वे सामाजिक मुल्यो की नब्ज़ पर भी समय-समय पर हाथ धरते रहते हैं।
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