जो कम मैँ सालों से नही कर पाया इस साल वो करने की ख़बर शहर मेँ फैली.सुबह-सुबह मुझे फोन आया और सीधे सवाल किया गया कँहा है बे.मैंने कहा घर पर तो उधार से जवाब आया कि तो न्यूज चैनल मेँ क्या दिखा रहे हैँ कि दिखा रहे हैँ कि तू भाग गया है.क्यों भागूँगा मैँ?मैंने सवाल किया तो उधार से जवाब आया साले न्यूज देख तो पता चल जायेगा.और जब मैंने न्यूज देखी तो मेरा सर चकरा गया.मुझे तब पता चला कि मैँ शादी कर रहा हूँ.आप भी देखिये और उठाईये मज़ा इस होली न्यूज का.
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Saturday, March 19, 2011
Thursday, June 3, 2010
ढोकला सिर्फ़ आपको ही नही हमे भी अच्छा लगता है!
ढोकला!सुनते ही मुंह मे पानी आ जाता है।नर्म और ताज़े ढोकले हो और दोस्तो का साथ हो तो फ़िर कहना ही क्या है!ढोकला अब गुजरात की डिश नही रह गया है और इसकी डिमांड हर जगह होने लगी है।ढोकले की दावत उड़ाने मे कोई पीछे नही रहता।ढोकला अब एक कामन और पाप्यूलर डिश बन गया है और बिना इसके नाश्ते का मज़ा ही नही आता।प्रेस क्लब मे भी सारे सदस्य जब ढोकले पर हाथ साफ़ कर रहे थे तो हमारे क्लब मे ही हमेशा मटरगश्ती करने वाले एक सज्जन जो क्लब के सदस्य नही है पास मे ही धींगा-मस्ती करते नज़र आये।फ़ोटोग्राफ़र राजेश सोनकर का ध्यान उन पर गया तो वो समझ गया कि उन महाशय को भी ढोकला चाहिये।सो राजेश ने उन्हे ढोकला आफ़र कर दिया और उन्होने भी ढोकले पर हाथ साफ़ करके बता दिया कि ढोकला सिर्फ़ हमे नही उन्हे भी बहुत पसंद है।आप खुद देख लिजिये कैसे मज़े से च
ट्खारे ले-लेकर
ढोकले का स्वाद लिया जा रहा है।
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रायपुर प्रेस क्लब
Friday, March 5, 2010
इश्क़ मे ज़ालिम तेरे हमे रिक्शा तक़ चलाना पड़ा मगर तू है के फ़िर भी ………………
कह्ते है इश्क़ निकम्मा बना देता है लेकिन हमने इसे झूठलाते हुये रिक्शा तक़ खींच डाला।मगर हाय रे किस्मत!सालों साल से सिंगल होने का ताना सहते-सहते परेशान होने के बाद एक रोज़ अंदर से हूक उठी और हमने भी एलान कर दिया कि बहुत हो गया ये सिंगल होने का नया शब्दार्थ आवारा या छुट्टा सांड सुनते-सुनते।अब हम भी डबल हो जाते हैं।दोस्तों ने कहा कि तेरे लिये तो देर आयद दुरूस्त आयद भी नही कह सकते।मैने पूछा क्यों तो डाक्टर का जवाब था समझ ले तू एक्स्पायरी डेट की दवा है।

इस बात पर कुछ दोस्त हमारे समर्थन मे आ गये।उन्होने डाक्टर को शहर के पुराने पके हुये आमों की लिस्ट सुना दी।इस पर डाक्टर बोला वो तो ठीक है मगर इसको तो ताज़ी सब्जी होना और ये खरीदने निकला है शाम को।अब तो जो है सो है।वैसे भी बैगर्स आर नाट द चूज़र्स।ये सुनकर मैं भड़का और बोला अबे बेगर्स किसको कह रहे हो।सबने बीच-बचाव करके मामला ठंडा किया और डाक्टर ने कहा वो तो उदाहरण था।मैने कहा कोई उससे अच्छा और कोई नही मिला क्या?तो डाक्टर ने कहा कि बेटा समझ ले तो सेल मे लटक गया है।किसी ज़रूरतमंद को पसंद आया तो ठीक नही तो लटके रहना!और हां इसमे च्वाईस से लेकर प्राईज़ और सारी कंडिशन तेरी नही खरीददार की रहेगी।
इस पर मणी भाई,पुराने दिलफ़ेंक सत्येन्द्र,जयंती लाल,राजकुमार और डा गोपाल ने कहा अरे छोडो डाक्साब्।अपना लीडर आज भी 50 बट लुक्स थट्टी है।कंही भी खपा देंगे।अब डाक्टर भड़का सालो मुझे कहते हो लीडर की इज़्ज़त का ख्याल करो और उसे खपा दोगे कहते हो।अबे क्या वो खोटा सिक्का है?सिर्फ़ घिस गया है समझ मे नही आता कौन से सन का है बाकी सब तो ठीक ही ना?अब मै बोला बस डाक्साब आपका और बाकी भाईयों का प्यार देख कर मेरी आंख से इस गर्मी मे भी म्यूनिसिपाल्टी के नल की तरह आंसूओ की धार बह निकलेगी।समझ मे नही आता आप लोगों का शुक्रिया कैसे अदा करूं।आप जैसे दोस्त हों तो फ़िर दुश्मनों की क्या दरकार!
मैने इस ग्रुप से छुटकारा लिया और सीधे पहुंचा प्रेस क्लब्।वंहा अपनी चंडाल चौकडी को तलब किया और उनके सामने अपनी समस्या रखी।पहली बार मुझे प्राब्लम में फ़ंसा देख साले ऐसे खुश हुये जैसे जाल मे फ़ंसे हुये शेर को देख कर चूहा खुश हुआ था।तीनों मे सबसे खुराफ़ाती प्रभूदीन गुप्ता ने कहा गुरूदेव ये तो नक्सलवाद से भी बडी समस्या है।मैने जैसे ही उसे घूर के देखा,शिशुपाल त्रिपाठी और दुर्योधन शुक्ला ने उसे डांटा और कहा कि तू चुप रह बे भैया सीरियस दिख रहे हैं और तू मज़ाक कर रहा है।अब प्रभूदीन भड़क गया।वो बोला मैं मज़ाक कर रहा हूं।बेटा अपन तीनो की शादी कैसे हुई पता है ना।अगर सच बोलकर ट्राई करते ना तो किसी सेल मे भैया के बगल वाले हैंगर पर ही लटके मिलते।
अबे चुप कर और दिमाग लगा और मामला सुलझा।प्रभुदीन को तो मौका मिल गया था।वो बोला क्यों अपने मामले अपन लोगों ने खुद निपटाये थे ना।मैं तो गुप्ता होकर ठकुराईन को भगा लाया था।दम है तो भगा लाये किसी को?मैने कहा अबे चैलेंज़ मत कर?प्रभुदीन बोला गुरूदेव चैलेंज़ स्वीकारने का टाईम पूरा हुये ज़माना गुज़र गया है।अब तो बस किसी को बहला-फ़ुसला को फ़ंसा लो तो हो सकता है आपकी ये अंतिम इच्छा पूरी भी हो जाये।
मौका देख कर शिशुपाल और दुर्योधन बोले तो बता ना कोई आसान तरीका।वो बोला भैया देखो यंहा के लोकल लोग तो आपको जान गये है कि आप बजरंगी हो और थोड़े से खसकी भी।मैने जैसे ही कुछ कहना चाहा तो वो बोला अगर मामला सुलझना है तो गाली-गलौज़ और धमकी-चमकी नही चलेगी।मैने फ़िर से कुछ कहना तो वो बोला देख लो तुम लोग भी।तो दुर्योधन और शिशुपाल बोले गुरूदेव जाने दो गुस्सा तो अपन बाद मे भी कर लेंगे।पहले इसकी खोपड़ी का फ़ायदा उठा लेतें हैं।हम लोगों की नैया भी यही पार लगाया है।
मैने अचानक़ सुर बदला और महंगाई के इस दौर मे भी उसमे से नमक निकाल कर पूरी शक्कर उंडेल दी।मैने कहा कि बता भाई प्रभूदीन!वो बोला मदद तो मैं कर दूंगा लेकिन आप आज से बात-बात में, घर मे बता दूंगा, और ये बंद कर, वो बंद कर, तेरा लिवर खराब है, सब बंद करना पड़ेगा।मैंने उसे घूर कर देखा तब तक़ शिशुपाल और दुर्योधन दोनो बोल पड़े ठीक है ठीक है!वो बोला देखा गुरूदेव इन लोगों को मेरे से अच्छा समझते थे ना,ये साले मेरे बहाने अपना भी प्राब्लम साल्व कर रहे हैं और बता रहे हैं कि आपका प्राब्लम साल्व करा रहे हैं।
मैने भड़क कर उससे कहा बताना है तो बता नही तो मैं जा रहा हूं रूपकला ग्रूप्।वंहा तो सभी भगा-भगा कर लाये हैं।उनसे पूछ लूंगा।वो बोला गुरूदेव उस दौर मे कोशिश करते ना तो एमेरजेंसी के बाद जनता लहर मे राजनारायण टाईप जीत भी जाते।मगर अब तो टाईम निकल चुका है।मुझे भी लगा कि शायद वो सच कर रहा है।मेरे चेहरे को धीरे-धीरे बिज़ली कटौती वाले इलाके के बल्ब की तरह बुझते देख प्रभूदीन का चेहरा चमक गया।वो बोला गुरूदेव यंहा तो आपकी दाल गलने वाली नही है और महाराष्ट्र मे तो मराठी लोग तो झाड़ू भी खरीदते हैं तो कई दुकानों मे मोल भाव कर।वंहा भी मुश्किल है।मैने कहा प्राब्ल्म नही आईडिया बता साले!
वो बोला आईडिया तो है लेकिन थोड़ा कठीन है।मैं बोला बता मैं कुछ भी कर सकता हूं।वो बोला ये हमारे ज़माने का इश्क़ नही है गुरूदेव जब तेरे लिये चांद तारे तोड़ लाऊंगा और लिखता हूं खून से स्याही ना समझना,जैसे सड़ियल डायलाग पर लड़किया मर-मिटा करती थी।मैने कहा कि अब क्या हो गया है।वो बोला अब लडकिया थ्रिल चाहती है।एडवेंचर चाहती हैं।मैं बोला तू आईडिया बता।वो बोला,भड़कना मत।आजकल गुरूदेव लड्किया जो हैं ना वो फ़िल्मी स्टाईल से फ़ंसती है।एक चक्के पे बाईक तो आप चला नही पाओगे।काफ़ी-शाप मे आप सिगरेट से धुयें के छ्ल्ले भी नही उड़ा सकते,खांस-खांस कर मर जाओगे।और आपकी खांसी देख कर वो भी समझ जायेगी कि शादी डायरेक्ट विधवा होने की गारंटी है।
अबे! मैं बोला,साले तरीका बता रहा है या मौका देख कर भड़ास निकाल रहा है।वो बोला आपके साथ यही समस्या है।क्या करोगे शादी करके?बात-बात मे भाभी से अकड़ोगे और झगड़ोगे और हम लोगों को फ़िर वही समस्या सुलझाने का काम करना पड़ेगा।मैने कहा अबे वो सब छोड़ तू तरीका बता।गुरूदेव अब अपने पास बाहर से आने वाले आईटम को फ़ंसाने के अलावा कोई चारा नही है।तो!तो क्या बाहर से जो फ़्लाईट से आयेगी,उसे लेने तो कार आयेगी,बस से जो आयेगी वो भी लोकल ही होगी।अपने को रेल से आने वाले आईटम को सेट करना पड़ेगा।कैसे?वो बोला अपन सब रो रेल्वे स्टेशन के रिक्शा अड्डे पे रहेंगे और रिक्शे वालों को अच्छी सुंदर लड़की को नही बैठाने और आपके लिये छोड़ने का आर्डर कर देंगे।जीआरपी और एसआरपी वालों को भी सेट कर लेंगे आप बाहर से आई लड़की को रिक्शे में बिठा कर ले जाना और सुनसान जगह मे हम लोग उसे छेड़ेंगे।आप हम लोगों को मार कर हीरो बन जाना और देखना एक दो मामले के बाद जो पहले सेट हो जाये उसी से हिप-हिप हुर्रे।अबे इसमे तो मुझे रिक्शा चलाना पड़ेगा।तो क्या हम लोग चलायेंगे?और सुनो ये डिज़ायन वाला कुर्ता पज़ामा नही चलेगा समझे!थोड़ा रिक्शेवाला स्टाईल मे कपड़े पहनना पड़ेगा।मरता क्या ना करता सालों ने जो-जो बताया वो कर रहा हूं।और तो और प्रेस क्लब मे मेरे ही महासचिव नवभारत के छायाकार गोकुल सोनी ने तो हद कर दी।मेरी फ़ोटो खींच भी ली और नानसेंस टाईम्स मे छाप भी दी।आपको कैसी लगी मेरी ये तस्वीर और कहानी बताईयेगा ज़रुर।

Thursday, February 4, 2010
अब सरकार पेट्रोल और डीज़ल की कीमत जितनी चाहे बढा ले मुझे फ़र्क़ नही पड़ने वाला!सफ़ारी बेच के नई गाड़ी ली है मैने!न फ़िल इट न शट इट बस फ़ारगेट इट!
पेट्रोल और डीज़ल के दाम बढेंगे!न्यूज़ चैनल पर सुनकर और अख़बारों मे पढकर दिमाग खराब हो जाता था।एक तो वैसे ही सफ़ारी का माईलेज कम और फ़िर बढती कीमते बार-बार मुझे गाड़ी बदलने के लिये सोचने पर मज़बूर कर रही थी।एक बार फ़िर पेट्रोल-डीज़ल के दाम बढने का हल्ला मचा तो मैने गाड़ी बदल ही ली।गाड़ी भी तक़दीर से मिली कि सरकार अब चाहे जितना दाम बढा ले पेट्रोल और डीज़ल का मुझे रत्ती भर फ़र्क़ नही पड़ने वाला।
अरे बाबा बताता हूं कौन सी ग़ाड़ी है।इतना उतावला होने की ज़रूरत नही है।वैसे इस गाड़ी के बारे मे मैं जानता नही था।मुझे बताया प्रेस क्लब के महासचिव और दैनिक नवभारत के फ़ोटोग्राफ़र गोकुल सोनी ने।गोकुल भी अपने ब्लागर भाई बनने वाले हैं और अपना ब्लाग शुरू करने जा रहे हैं।हां तो मैं बता रहा था नई गाड़ी के बारे मे।गोकुल को जब मैने बताया यार गोकुल ये ब्लागर मीट मे बहुत ज्यादा खर्चा हो गया है और इससे मेरा बजट गड़बड़ा गया है।अब ये काला हाथी,(सफ़ेद इसलिये नही क्योंकि मेरी गाड़ी का रंग सफ़ेद नही काला है)पालना मुश्किल हो गया है।दूसरी गाड़ी खरीदनी है कौन सी खरीदूं।इतना सुनते ही गोकुल ने कहा कि एक बढिया माडल लांच हुआ है,कंपनी का तो पता नही आप बोलो तो मैं दिखा देता हूं,जमे तो खरीद लो।मैने पूछा माईलेज क्या देगी!गोकुल ने कहा की ये सब तो पूछने की ज़रूरत ही नही है।
मैं भी तुरंत तैयार हो गया और जब गोकुल सोनी ने मुझे गाड़ी दिखाई तो मुझे लगा कि ये है सरकार की पेट्रोलियम पालिसी का असली जवाबब बढाये सरकार जितना चाहे दाम।गाड़ी ऐसी है कि आम के आम और गुठलियों के भी दाम्।लिजिये हिच्काक इश्टाईल मे सस्पेंस ज्यादा नही खिचूंगा।आप भी देखिये मेरी नई गाड़ी गोकुल सो
नी और नवभारत के सौजन्य से। और हां जिन भाईयों को पेट्रोल और डीज़ल के बढते दामों से बचाने वाली इस गाड़ी को खरीदना हो वे तत्काल बतायें।स्टाक सीमित है और एक बुकिंग आ भी गई है।जी के अवधिया ने इस खरीदने की इच्छा जाहिर की है।फ़िर न कहना बताया नही।रस्ते का माल सस्ते मे।बुकिंग ओपन्।
नी और नवभारत के सौजन्य से। और हां जिन भाईयों को पेट्रोल और डीज़ल के बढते दामों से बचाने वाली इस गाड़ी को खरीदना हो वे तत्काल बतायें।स्टाक सीमित है और एक बुकिंग आ भी गई है।जी के अवधिया ने इस खरीदने की इच्छा जाहिर की है।फ़िर न कहना बताया नही।रस्ते का माल सस्ते मे।बुकिंग ओपन्।
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Tuesday, January 26, 2010
खून की नदियां बहाना डेमोक्रेटिक और उनके समर्थकों का विरोध करने वाले अनडेमोक्रेटिक,वाट ए क्लासीफ़िकेशन सर जी!
कल एक फ़ोन आया।उधर जो विद्वान थे उन्होने बिना किसी औपचारिकता के रायपुर प्रेस कलब को अनडेमोक्रेटिक ठहरा दिया।कारण रायपुर प्रेस क्लब की बैठक मे लिया गया फ़ैसला था,जिसमे बाहर से आकर स्थानीय मीडिया को बिकाऊ और गैर ज़िम्मेदार कहने वालों का विरोध किया गया था।बैठक मे ये फ़ैसला भी लिया गया था कि ऐसे लोगों को और उनके समर्थकों को प्रेस क्लब अपना मंच नही
देगा।बस यही उन्हे नागवार गुज़रा।इसे उन्होने सीधे-सीधे अभिव्यक्ति पर हमला समझा और लगे ज़िरह करने।जिस तरह से वे ज़िरह कर रहे थे ऐसा लगता है कि वे स्वतंत्र या निष्पक्ष न हो कर उन लोगों के पैरवीकार हो जो बस्तर के हरी-भरी वादियों को खून से लाल क रहे हों।मुझे ये समझ नही आया कि घर मे घुस कर बेवज़ह बिना किसी ठोस आधार के हम सब लोगों को कोई अगर बिकाऊ कहता है तो उसका विरोध करना अनडेमोक्रेटिक कैसे हो गया?या फ़िर हमारे प्रदेश मे खून की होली खेलने वालों के पक्ष मे कांट्रेक्ट पर रोने वाले रूदाली डेमोक्रेट कैसे हो गये?जिनका डेमोक्रेसी पर विश्वास ही नही है,जो बंदूक की नोक पर या खूनी क्रांति के जरिये सत्ता हासिल करना चाहते हैं,उनका समर्थन करना डेमोक्रेटिक कैसे है?ऐसे लोगों को जो डेमोक्रेसी पर विश्वास नही करते,का विरोध अनडेमोक्रेटिक कैसे हो सकता है?

खैर जाने दिजिये! ऐसे लोगों के लिये सिर्फ़ और सिर्फ़ ईश्वर से प्रार्थना ही की जा सकती है कि उन्हे थोड़ी बहुत सद्बुद्धी दे।वैसे जिस फ़ैसले को सारे छत्तीसगढ मे समर्थन मिल रहा है और जिस फ़ैसले पर शहर के बुद्धिजीवियों ने भी एक बैठक लेकर समर्थन की मुहर लगा दी वो फ़ैसला अनडेमोक्रेटिक कैसे हो सकता है?हो सकता है कि दिल्ली के सज्जन शायद दिल्ली यानी देश की राजधानी मे रहने के कारण देश के दूसरे हिस्सों मे रहने वाले लोगों से ज्यादा समझदार हों! या देश के अन्य छोटे शहरों मे रहने वाले लोग निपट गंवार या देहाती हो और वे ही सिर्फ़ होशियार हों!जो भी मुझे ये समझ नही आया दिल्ली मे बैठे लोगों को रायपुर प्रेस क्लब और उससे जुड़े साथियों के सक्रिय होते डेमोक्रेसी की चिंता क्यों सताने लगी?उन्हे इस बात पर कभी चिंता क्यों नही होती कि बस्तर के भीतरी क्षेत्र मे रात को ज़िंदगी ठहर जाती है।जंगलों में अब पक्षियों का कलरव नही बंदूक के फ़ायर गूंजते रहते हैं।शेर की दहाड़ तो कब की गायब हो चुकी है अब तो सिर्फ़ बारूदी सुरंगों के धमाके सुनाई देते हैं।अब जंगलों मे महुये की मदमस्त कर देने वाली खूश्बू नही बल्कि खून की बदबू फ़ैली हुई है।जंगल ऊपर से भले ही हरे दिखते हो अंदर जाओ तो खून से लाल हो चुके हैं।जिस आदिवासी के साथ हुये अन्याय की बात और वंहा विकास न किये जाने की आड़ लेकर खूनी संघर्ष चल रहा है उसी बस्तर मे स्कूल भवन,पंचायत भवन और विकास की ओर जाने वाली सड़कों को नक्सली बारूद से उड़ा दे रहे हैं।विकास की बात करते हैं तो स्कूल अस्पताल,पंचायत भवन और रेस्ट हाऊस क्यों तोड़े जा रहे हैं।सबसे चौंकाने वाली बात तो ये है बस्तरिहा के साथ अन्याय होने का रोना रोने वाले सभी रूदाली आंध्र-प्रदेश और दूसरे प्रांतो के हैं।बस्तर या छत्तीसगढ के लोगों को उनके नेतृत्व मे काम करना पड़ता है जिनके खुद के प्रदेश में विकास के लिये लड़ाई लडने के बहुत से कारण साफ़ नज़र आते हैं।मगर वे वंहा क्यों ऐसा करेंगे?वे तो वंहा तब संघर्ष करते थे जब वंहा कांग्रेस की सरकार नही होती थी।जब से वंहा कांग्रेस सत्ता मे आई है शायद विकास का पैमाना ही बदल गया है और उनके चशमे से विकास मे अब भाजपा शासित छत्तीसगढ और बीजद शासित उड़िसा ही बाकी रह गया है।
आखिर ये दोगला पन क्यों?
खैर ये उनका अपना मामला है लेकिन सिर्फ़ रायपुर प्रेस क्लब के ही विरोध करने से इतनी बैचैनी क्यों?इतनी तेज़ हलचल क्यों?यंहा के विरोध की शुरूआत से दिल्ली मे बैठे लोगों को तक़लीफ़ क्यों?उन्हे ये अनडेमोक्रेटिक नज़र आ रहा है क्यों?क्या चुपचाप गालिंया सुनना ही डेमोक्रेटिक होता है?मैने उन सज्जन को बार-बार बताने की कोशिश की,कि उन्हे हम बोलने से नही रोक रहे हैं।उन्हे जो भी बक़वास करना है करे लेकिन उन्हे हम अपने घर मे बैठ कर बक़वास करने नही देंगे।उन्हे ये भी बताया कि अगर हम लोग मानवाधिकारवादियों के विरोधी होते तो हम लोग प्रेस क्लब मे आई मेधा पाटकर,संदीप पाण्डेय का प्रायोजित विरोध करने वाले से लडते-भीड़ते नही।तमाशाई बनी पुलिस के सामने मेधा एण्ड कंपनी को मारपीट पर उतारू भीड से बचाकर सुरक्षित नही ले जाते और तो और उन्हे प्रेस क्लब मे कान्फ़्रेंस की अनुमति ही नही देते।मगर ये सब बातें उनके दिमाग मे क्यों घुसती भला।वे तो लगता है मोटी फ़ीस लेकर निर्दोष लोगों का खून बहाने वालों की पैरवी करने को डेमोक्रेसी मानने वाले विद्वान थे।
खैर जिसे जो समझना है समझे मुझे लगा कि गणतंत्र दिवस पर मैं भी इस नये क्लासीफ़िकेशन का मतलब आप लोगो से पूछ लूं। हो सकता है मुझे कुछ और नई परिभाषा जानने को मिल जाये।
खून की नदियां बहाना डेमोक्रेटिक और उनके समर्थकों का विरोध
करने वाले अनडेमोक्रेटिक,वाट ए क्लासीफ़िकेशन सर जी!
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