सूत न कपास जुलाहों में लट्ठम-लट्ठा!मुहावरा आजकल सुनाई नही पड़ता,कभी स्कूल मे पढाया जाता था।ये याद ललित-अनिल प्रकरण के संदर्भ में।इस मामले में सिर्फ़ दो लोग खामोश रहे एक ललित और दूसरा मैं यानी अनिल।ललित तो अभी भी कुछ कहना नही चाहता और मैं भी,लेकिन जिस तरह से टंकी को लेकर सभी लिख रहे हैं उससे मुझे ऐसा लगा कि सच सामने आना ही चाहिये वरना भ्रम और बढता चला जायेगा।सो जो कुछ हुआ उसे आप लोगों के सामने रख रहा हूं,सच जस का तस।
ललित से पहली मुलाकात ब्लाग पर नही हुई थी,वो मेरे साथ सालों पहले एक अख़बार मे काम कर चुका है।उसके बाद सालों का गैप और फ़िर ब्लाग पर मुलाकात और फ़िर आमने-सामने भेंट।पुराने रिश्ता रिनिव होने के बाद और गहरा होता चला गया और मुलाकात-फ़ोन का सिलसिला भी बढा।वो मुझे अच्छा लगता है और उसकी साफ़गोई और संवेदनशीलता को मैं अच्छी तरह से पहचानता हूं।
इस बीच कई बार फ़ोन पर बातचीत मे मैंने उसके शहर नही आने और घर मे ही घुसे रहने पर आपत्ति की तो उसने हमेशा हंस कर यही कहा कि भैया ब्लाग से फ़ुरसत ही नही मिल पाती।वो खुद के अलग-अलग ब्लाग पर तो लिखता ही था,साथ ही अपनी चर्चा के अलावा कुछ दुसरी चर्चाओं में भी हाथ बंटाता था।
एक बार नही कई के बार इस जवाब ने, कि मुझे ब्लाग से फ़ुरसत नही मिलती मुझे थोड़ा चिंता होती थी और उस दिन भी मुझे एक मेल आया था जो ललित के नाम से था।वास्तव मे वो जवाब था मेरे मेल का।मैंने सीधे ललित को फ़ोन लगाया और उस जवाब के बारे में पूछा तो वो हमेशा की तरह हंसा और उसने कहा आपको मालूम-वालूम रहता नही किसी भी मेल को खोल देते हो,किसी साईट को आपने क्लिक किया होगा,तो उसका मेल आपकी लिस्ट के हिसाब से मेरे पास आया होगा और मैने ऐसे मेल के लिये आटो आन्सर शुरू कर रखा है जिससे आपके पास जवाब आ गया होगा।इसके बाद मैने फ़िर उससे बहुत दिनों से मुलाकात नही होने पर नाराज़गी ज़ाहिर कि तो उसका वही जवाब आया भैया देख तो रहो इसी मे लगा रहता हूं,फ़ुरसत ही नही मिलती।
बस ये जवाब मेरी चिंता को और गहरा कर गया।मुझे लगा ये इसी तरह ब्लागिंग मे इन्वाल्व रहेगा तो बाकी काम कब करेगा।इस तरह तो ये बाकी दुनिया से कटता जा रहा है।मुझे पता है इस आभासी दुनिया का आकर्षंण और नशा बहुत खतरनाक भी हो सकता है।इस बारे में खुद ललित ने कुछ समय पहले एक पोस्ट लिख मे लिखा था कि घर-परिवार वाले,दोस्त-यार रिश्तेदार सब उनसे इस ब्लागिंग के कारण नाराज रहने लगे हैं।इसके अलावा घर की शादी के दौरान भी वो पोस्ट लिखता रहा।
कुल-मिलाकर बात ये है कि मुझे उसके ब्लागिंग के नशे में डूबने का खतरा मह्सूस हुआ और उसके शुभचिंतक और बड़े भाई होने के नाते मैं इस बारे मे सोचने लगा।ललित को काम की ज़रूरत नही है।वो आर्थिक रूप से सक्षम है और अच्छा-खासा समृद्ध किसान है।लेकिन कोई भी कितना भी सक्षम हो अगर घर से न निकले हर वक्त कम्प्यूटर से चिपका रहे तो ये उसके लिये अच्छे संकेत नही है।बस इसी बात को लेकर मैंने उसे इससे थोड़ा दूर करने के लिये सोचा।मुझे मालूम था ललित ज़िद्दी है और भावुक भी,सो उसे समझाने से असर पडने वाला नही सो मैने उसके दूसरे गुण जो आजकल की दुनिया के लिये अवगुण भी हो सकता है को इस्तेमाल किया।
मैने उसको ठेस लगाने वाली टिपण्णी सोच-समझ के की ताकी वो दुःखी हो जाये और इससे अलग हो जाये।कुछ समय बाद उसे सारी बात मैं बताता।सब कुछ हुआ मेरी योजना के अनुसार टिपण्णी पढते ही ललित को झटका लगा और उसने मुझे फ़ोन किया।एक बार नही कई बार।मैने उसका फ़ोन जान-बूझकर नही उठाया ताकि उसका दुःख और बढे और वि इंटरनेट के खतरनाक हो चले नशे से दूर हो सके,ये मेरा खयाल था।मैं मान रहा था कि उसे इंटरनेट और ब्लागिंग की लत लग गई है,जैसा कि कई साथी अपनी पोस्ट मे लिख चुके हैं कि ये नशा है और ऐसा ही कुछ मैंने भी अनुभव किया है,बस इसलिये उसकी चिंता मुझे हो रही थी।खैर ललित ने मेरे फ़ोन नही उठाने पर मुझे एक एसएमएस भी किया और कहा कि आप अगर जवाब नही देंगे तो मैं ब्लागिंग छोड़ दूंगा मैं आपके स्नेह से वंचित नही होना चाहता।एसएमएस पढ कर मुझे बहुत दुःख हुआ और ऐसा लगा जवाब दे ही दूं।फ़िर मैने जैसे-तैसे खूद पर काबू पाया और उसे जवाब नही दिया।
और तब ललित ने दुःखी होकर ब्लागिंग से अलविदा कहने वाली पोस्ट डाल दी।यंहा तक़ तो सब कुछ मेरी योजना के अनुरूप ही हुआ था।ललित ने भी कमेण्ट का आप्शन बंद कर सब कुछ बंद कर दिया था मगर गलती तो हो चुकी थी।मेरा कमेण्ट उसने पढा तो जरूर मगर उसे डिलीट नही कर पाया क्योंकि उस ब्लाग पर माडरेशन नही था और एडमिन किसी और के पास था।सो जैसा की मैने सोचा था ललित कमेण्ट पढ कर उसे डिलीट कर देगा वैसा हुआ नही और वो पब्लिश हो गया।
और फ़िर ललित के चाहने वाले उस कमेण्ट तक पंहुचे और अपनी खोज़ी बुद्धी का परिचय देते हुये सब कुछ सामने लाने और ललित से हमदर्दी दिखाने के लिये होड़ मच गई।इस बीच किसी ने न तो मुझसे पूछा और शायद ललित भी इस मामले मे खामोश ही था।सबसे पहले फ़ोन आया संजीत त्रिपाठी का वो छोटा होने के कारण मुंहलगा भी सो उसाने इस मामले में पूछा और डांट खाकर चुप हो गया और फ़िर दूसरे दिन ही उसने बात की।उसके बाद फ़ोन आया बी एस पाब्ला का जिन्होने सिर्फ़ एक लाईन मे पूछा कि वो कमेण्ट आपका है और मेरे हां कहते ही ठीक है कहकर फ़ोन कट्।कोई कुछ सुनने को खाली नही ,कोई कुछ समझने को खाली नही।दंगल मच गया ब्लाग जगत में।कुछ लोगों को मौका मिल गया मुझे कोसने का और कुछ को इसमे गलतफ़हमी नज़र आई।उसके बाद से तो ये हाट टापिक हो गया ब्लाग जगत का।कुछ को तो ऐसा लगा कि मैं ललित की बढती लोकप्रियता से घबरा कर षडयंत्र करके उन्हे रवाना कर रहा हूं।कुछ को मैं पीठ मे छूरा भोंकने वाला और कुछ को गंदा नज़र आया।यंहा के लोगों को तो पता है की मैं गुस्सैल हूं लेकिन वे ये भी तो जानते हैं कि मेरा गुस्सा ज्यादा देर तक़ नही टिकता।फ़िर भी किसी ने कुछ नही पूछा।खैर मुझे किसी से कोई शिकायत भी नही थी और मैं जो चाहता था वो हो गया था,इसलिये मैने खामोश ही रहना बेहतर समझा।
मगर इस मामले के पीछे कोई और कारण है,ये बात खुशदीप सहगल समझ गये थे।उन्होने मुझे फ़ोन किया और ललित को भी।वो दोनो के बीच के रिश्ते की मधुरता को महसूस कर गये और फ़िर एक पत्रकार के दिमाग के अनुसार उन्होने मामले की तह तक़ जाना जरूरी समझा और उसे पता करने मे वे सफ़ल भी रहे।उन्होने मुझसे कहा कि इस मामले में भ्रम बढता जा रहा है आप ललित से बात करिये।मैने उन्हे बताया कि इससे तो वो फ़िर वापस आ जायेगा,तो खुशदीप ने कहा कि आप उसे समझाईये वो समझ जायेगा।मैने फ़ोन लगाया,फ़ोन उठा नही।मैने खुशदीप को एसएमएस करके बता दिया।शाम को ललित का फ़ोन आया और उसके बाद मैंने उसे सारी बात बता दी।उसने भी मेरी सद्भावना को समझा और कहा भैया मैं मैं अब ब्लाग नही लिखूंगा।
मैने उसे बताया कि सभी खाये-पीये-अधाये लोग ब्लागिंग कर रहे हैं और वे काम के बाद फ़ुरसत के समय इसे करते हैं।एक तुम हो जो सब कूछ छोड़ कर ये कर रहे हो।कितने लोगों को पता है कि इसके चक्कर मे तुम घर से बाहर तक़ नही निकल पा रहे हो।वो समझदार है जो मेरी बात समझा और मेरे उसे कडुवे कमेण्ट के पीछे छीपी मिठास को पहचान गया।इसके बाद उसनेऔर मैने खामोशी ओढ ली।मगर शेष लोगों ने इस हाट टापिक को हाट ही रखा।
दूसरे दिन पाब्ला जी का सुबह-सुबह फ़ोन आया और उन्होने शाम को मिलने की बात कही।शाम को वे दफ़्तर आये और उन्होने बताया कि ललित से मिलकर आ रहा हूं।मैं हंसा और वे भी।फ़िर इधर उधर की बाते हुई,ब्लाग पर मचे शोर की भी।इस पर उन्होने कहा कि मैं इस पर लिख देता हूं,मैने कहा जैसी आपकी मर्ज़ी।उन्होने लिखा भी और सब कुछ ठीक हो जाने की बात भी बताई और गलतफ़हमी दूर होने की घोषणा भी कर दी।उसके बाद माहुल थोड़ा ठंडा हुआ मगर पूरी तरह शांत नही हुआ।आज फ़िर मैने ललित से बात की और कहा कि मैं इस पर कुछ लिख दूं,उसने कहा जैसा आप चाहें।
ललित सच मे बेहद संवेदनशील और बढिया इंसान जिसे मैं नेट के जंगल मे खोते हुये नही देखना चाह्ता था बस इसलिये मैने वो कडा कदम उठाया था।ठीक वैसे ही जैसे एक डाक्टर लाईलाज बीमारी के लिये चीर-फ़ाड़ करता है,आप उसे तो कसाई नही कहते ना,तो फ़िर मैं कैसे कसाई हो गया?मुझे लगता है कि शायद अब इस बात को लोग समझ लेंगे और अपनी राय बनाना बंद कर देंगे।अगर ऐसा करते है तो अच्छा है नही तो फ़िर देश तो चल ही रहा है ब्लागजगत भी चलता ही रहेगा।मेरा ये लिखने ला पोस्ट किसी का भी दिल दुखाना नही है बल्कि उनसे अनुरोध करना है कि जैसा दिखता है ज़रूरी नही वो वैसा ही हो,कृपा कर उसे जांच लें।
Showing posts with label अनिल पुसदकर।. Show all posts
Showing posts with label अनिल पुसदकर।. Show all posts
Wednesday, April 14, 2010
Friday, March 5, 2010
इश्क़ मे ज़ालिम तेरे हमे रिक्शा तक़ चलाना पड़ा मगर तू है के फ़िर भी ………………
कह्ते है इश्क़ निकम्मा बना देता है लेकिन हमने इसे झूठलाते हुये रिक्शा तक़ खींच डाला।मगर हाय रे किस्मत!सालों साल से सिंगल होने का ताना सहते-सहते परेशान होने के बाद एक रोज़ अंदर से हूक उठी और हमने भी एलान कर दिया कि बहुत हो गया ये सिंगल होने का नया शब्दार्थ आवारा या छुट्टा सांड सुनते-सुनते।अब हम भी डबल हो जाते हैं।दोस्तों ने कहा कि तेरे लिये तो देर आयद दुरूस्त आयद भी नही कह सकते।मैने पूछा क्यों तो डाक्टर का जवाब था समझ ले तू एक्स्पायरी डेट की दवा है।

इस बात पर कुछ दोस्त हमारे समर्थन मे आ गये।उन्होने डाक्टर को शहर के पुराने पके हुये आमों की लिस्ट सुना दी।इस पर डाक्टर बोला वो तो ठीक है मगर इसको तो ताज़ी सब्जी होना और ये खरीदने निकला है शाम को।अब तो जो है सो है।वैसे भी बैगर्स आर नाट द चूज़र्स।ये सुनकर मैं भड़का और बोला अबे बेगर्स किसको कह रहे हो।सबने बीच-बचाव करके मामला ठंडा किया और डाक्टर ने कहा वो तो उदाहरण था।मैने कहा कोई उससे अच्छा और कोई नही मिला क्या?तो डाक्टर ने कहा कि बेटा समझ ले तो सेल मे लटक गया है।किसी ज़रूरतमंद को पसंद आया तो ठीक नही तो लटके रहना!और हां इसमे च्वाईस से लेकर प्राईज़ और सारी कंडिशन तेरी नही खरीददार की रहेगी।
इस पर मणी भाई,पुराने दिलफ़ेंक सत्येन्द्र,जयंती लाल,राजकुमार और डा गोपाल ने कहा अरे छोडो डाक्साब्।अपना लीडर आज भी 50 बट लुक्स थट्टी है।कंही भी खपा देंगे।अब डाक्टर भड़का सालो मुझे कहते हो लीडर की इज़्ज़त का ख्याल करो और उसे खपा दोगे कहते हो।अबे क्या वो खोटा सिक्का है?सिर्फ़ घिस गया है समझ मे नही आता कौन से सन का है बाकी सब तो ठीक ही ना?अब मै बोला बस डाक्साब आपका और बाकी भाईयों का प्यार देख कर मेरी आंख से इस गर्मी मे भी म्यूनिसिपाल्टी के नल की तरह आंसूओ की धार बह निकलेगी।समझ मे नही आता आप लोगों का शुक्रिया कैसे अदा करूं।आप जैसे दोस्त हों तो फ़िर दुश्मनों की क्या दरकार!
मैने इस ग्रुप से छुटकारा लिया और सीधे पहुंचा प्रेस क्लब्।वंहा अपनी चंडाल चौकडी को तलब किया और उनके सामने अपनी समस्या रखी।पहली बार मुझे प्राब्लम में फ़ंसा देख साले ऐसे खुश हुये जैसे जाल मे फ़ंसे हुये शेर को देख कर चूहा खुश हुआ था।तीनों मे सबसे खुराफ़ाती प्रभूदीन गुप्ता ने कहा गुरूदेव ये तो नक्सलवाद से भी बडी समस्या है।मैने जैसे ही उसे घूर के देखा,शिशुपाल त्रिपाठी और दुर्योधन शुक्ला ने उसे डांटा और कहा कि तू चुप रह बे भैया सीरियस दिख रहे हैं और तू मज़ाक कर रहा है।अब प्रभूदीन भड़क गया।वो बोला मैं मज़ाक कर रहा हूं।बेटा अपन तीनो की शादी कैसे हुई पता है ना।अगर सच बोलकर ट्राई करते ना तो किसी सेल मे भैया के बगल वाले हैंगर पर ही लटके मिलते।
अबे चुप कर और दिमाग लगा और मामला सुलझा।प्रभुदीन को तो मौका मिल गया था।वो बोला क्यों अपने मामले अपन लोगों ने खुद निपटाये थे ना।मैं तो गुप्ता होकर ठकुराईन को भगा लाया था।दम है तो भगा लाये किसी को?मैने कहा अबे चैलेंज़ मत कर?प्रभुदीन बोला गुरूदेव चैलेंज़ स्वीकारने का टाईम पूरा हुये ज़माना गुज़र गया है।अब तो बस किसी को बहला-फ़ुसला को फ़ंसा लो तो हो सकता है आपकी ये अंतिम इच्छा पूरी भी हो जाये।
मौका देख कर शिशुपाल और दुर्योधन बोले तो बता ना कोई आसान तरीका।वो बोला भैया देखो यंहा के लोकल लोग तो आपको जान गये है कि आप बजरंगी हो और थोड़े से खसकी भी।मैने जैसे ही कुछ कहना चाहा तो वो बोला अगर मामला सुलझना है तो गाली-गलौज़ और धमकी-चमकी नही चलेगी।मैने फ़िर से कुछ कहना तो वो बोला देख लो तुम लोग भी।तो दुर्योधन और शिशुपाल बोले गुरूदेव जाने दो गुस्सा तो अपन बाद मे भी कर लेंगे।पहले इसकी खोपड़ी का फ़ायदा उठा लेतें हैं।हम लोगों की नैया भी यही पार लगाया है।
मैने अचानक़ सुर बदला और महंगाई के इस दौर मे भी उसमे से नमक निकाल कर पूरी शक्कर उंडेल दी।मैने कहा कि बता भाई प्रभूदीन!वो बोला मदद तो मैं कर दूंगा लेकिन आप आज से बात-बात में, घर मे बता दूंगा, और ये बंद कर, वो बंद कर, तेरा लिवर खराब है, सब बंद करना पड़ेगा।मैंने उसे घूर कर देखा तब तक़ शिशुपाल और दुर्योधन दोनो बोल पड़े ठीक है ठीक है!वो बोला देखा गुरूदेव इन लोगों को मेरे से अच्छा समझते थे ना,ये साले मेरे बहाने अपना भी प्राब्लम साल्व कर रहे हैं और बता रहे हैं कि आपका प्राब्लम साल्व करा रहे हैं।
मैने भड़क कर उससे कहा बताना है तो बता नही तो मैं जा रहा हूं रूपकला ग्रूप्।वंहा तो सभी भगा-भगा कर लाये हैं।उनसे पूछ लूंगा।वो बोला गुरूदेव उस दौर मे कोशिश करते ना तो एमेरजेंसी के बाद जनता लहर मे राजनारायण टाईप जीत भी जाते।मगर अब तो टाईम निकल चुका है।मुझे भी लगा कि शायद वो सच कर रहा है।मेरे चेहरे को धीरे-धीरे बिज़ली कटौती वाले इलाके के बल्ब की तरह बुझते देख प्रभूदीन का चेहरा चमक गया।वो बोला गुरूदेव यंहा तो आपकी दाल गलने वाली नही है और महाराष्ट्र मे तो मराठी लोग तो झाड़ू भी खरीदते हैं तो कई दुकानों मे मोल भाव कर।वंहा भी मुश्किल है।मैने कहा प्राब्ल्म नही आईडिया बता साले!
वो बोला आईडिया तो है लेकिन थोड़ा कठीन है।मैं बोला बता मैं कुछ भी कर सकता हूं।वो बोला ये हमारे ज़माने का इश्क़ नही है गुरूदेव जब तेरे लिये चांद तारे तोड़ लाऊंगा और लिखता हूं खून से स्याही ना समझना,जैसे सड़ियल डायलाग पर लड़किया मर-मिटा करती थी।मैने कहा कि अब क्या हो गया है।वो बोला अब लडकिया थ्रिल चाहती है।एडवेंचर चाहती हैं।मैं बोला तू आईडिया बता।वो बोला,भड़कना मत।आजकल गुरूदेव लड्किया जो हैं ना वो फ़िल्मी स्टाईल से फ़ंसती है।एक चक्के पे बाईक तो आप चला नही पाओगे।काफ़ी-शाप मे आप सिगरेट से धुयें के छ्ल्ले भी नही उड़ा सकते,खांस-खांस कर मर जाओगे।और आपकी खांसी देख कर वो भी समझ जायेगी कि शादी डायरेक्ट विधवा होने की गारंटी है।
अबे! मैं बोला,साले तरीका बता रहा है या मौका देख कर भड़ास निकाल रहा है।वो बोला आपके साथ यही समस्या है।क्या करोगे शादी करके?बात-बात मे भाभी से अकड़ोगे और झगड़ोगे और हम लोगों को फ़िर वही समस्या सुलझाने का काम करना पड़ेगा।मैने कहा अबे वो सब छोड़ तू तरीका बता।गुरूदेव अब अपने पास बाहर से आने वाले आईटम को फ़ंसाने के अलावा कोई चारा नही है।तो!तो क्या बाहर से जो फ़्लाईट से आयेगी,उसे लेने तो कार आयेगी,बस से जो आयेगी वो भी लोकल ही होगी।अपने को रेल से आने वाले आईटम को सेट करना पड़ेगा।कैसे?वो बोला अपन सब रो रेल्वे स्टेशन के रिक्शा अड्डे पे रहेंगे और रिक्शे वालों को अच्छी सुंदर लड़की को नही बैठाने और आपके लिये छोड़ने का आर्डर कर देंगे।जीआरपी और एसआरपी वालों को भी सेट कर लेंगे आप बाहर से आई लड़की को रिक्शे में बिठा कर ले जाना और सुनसान जगह मे हम लोग उसे छेड़ेंगे।आप हम लोगों को मार कर हीरो बन जाना और देखना एक दो मामले के बाद जो पहले सेट हो जाये उसी से हिप-हिप हुर्रे।अबे इसमे तो मुझे रिक्शा चलाना पड़ेगा।तो क्या हम लोग चलायेंगे?और सुनो ये डिज़ायन वाला कुर्ता पज़ामा नही चलेगा समझे!थोड़ा रिक्शेवाला स्टाईल मे कपड़े पहनना पड़ेगा।मरता क्या ना करता सालों ने जो-जो बताया वो कर रहा हूं।और तो और प्रेस क्लब मे मेरे ही महासचिव नवभारत के छायाकार गोकुल सोनी ने तो हद कर दी।मेरी फ़ोटो खींच भी ली और नानसेंस टाईम्स मे छाप भी दी।आपको कैसी लगी मेरी ये तस्वीर और कहानी बताईयेगा ज़रुर।

Monday, February 1, 2010
ब्लागर मीट के बाद पता चला कि पार्क मे बैठ कर मूंगफ़ली और चना खाने वाले ही ईमानदार होते हैं,और समोसा उससे तो अब नफ़रत हो गई है!
रायपुर मे पहली बार राज्य स्तर की ब्लागर मीट की कोशिश की गई।कुछने इसे सफ़ल माना और कुछ ने……।खैर ये अच्छे संकेत है कि वैचारिक स्वतंत्रता के दूत ब्लागरों ने वैचारिक मतभेद भी खुल कर ज़ाहिर किये।सब कुछ ठीक रहा लेकिन जिस मीट को होने के पहले ही प्रायोजित बता कर असफ़ल करने की कोशिश की गई,उसके होने के बाद भी एकाध ब्लागर का सुर वैसा ही रहा।ये बात कुछ हज़म नही ठीक वैसे ही जैसे उन्हे मीट मे नाश्ते मे दिया गया समोसा हज़म नही हुआ।
खैर ये सब मुझे कहना नही चाहिये लेकिन बहुत दिनों से देख रहा हूं कि इस पर तरह-तरह के विचार सामने आये तो मुझे लगा कि मेरे मन मे धमाचौकड़ी मचा रहे विचारों को भी मन की कैद से मुक्ति मिलनी चाहिये और ब्लाग जगत के अनंत कैनवास पर मनचाहे ढंग से पसरने का मौका भी मिलना चाहिये।सो मै भी हाज़िर हूं अपने अनुभव लेकर।मैने मीट के शुरू होते ही ये साफ़ कर दिया था कि किस तरह से इसके प्रायोजित होने का दुष्प्रचार किया जा रहा है।और ये भी बता दिया था कि आयोजन प्रेस क्लब का है और नाश्ते की मिठाई डा महेश सिन्हा लाये हैं।मैं आपको बता दूं कि रायपुर प्रेस क्लब अपना हाल तमाम साहित्यिक और समाज सेवा से जुडी अन्य गतिविधियों के लिये निशुल्क उपलब्ध कराता है।पुस्तको का विमोचन भी यंहा होता है और कविता-पाठ से लेकर साहित्य पर गोष्ठी भी होती है।और इससे पहले भी यंहा ब्लागर इकट्ठा हो चुके हैं।
रहा सवाल इस मीट का तो, उसका स्वरूप वैसा नही था जैसी मीट हुई।वो महज कुछ ब्लागरों के आपस मे मिलने का कार्यक्रम था और ये तय हुआ था राजकुमार ग्वालानी,ललित शर्मा और बी एस पाब्ला जी के बीच्।राजकुमार ने पाब्ला जी को फ़ोन लगाया था और बातचीत के दौरान उसने बहुत दिनों से मुलाकात नही होने की बात कही।पाब्ला जी ने कहा जब चाहे मिल लेते हैं तो राजकुमार ने रविवार का दिन तय कर लिया और पाब्ला जी को रायपुर बुला लिया क्योंकि इससे पहले हम सब लोग भिलाई जा कर बेहद आत्मीय स्वागत का मज़ा ले चुके थे।राजकुमार ने मुझे बताया कि ऐसा कार्यक्रम तय हुआ है तो मैने भी हां कर दी और स्थान नीयत किया गया प्रेस क्लब।उसके बाद कौन आ रहा है और कार्यक्रम कैसा होगा ये हम लोगों को किसी को नही पता था।
इत्तफ़ाक़ से रविवार को प्रेस क्लब मे एक आवश्यक बैठक हो गई और उसके बाद मुझे पार्षदों के सम्मान समारोह मे जाना था।सो मैने राजकुमार से बैठक मे न आ पाने के लिये क्षमा मांग ली और सारी व्यवस्था प्रेस क्लब मे कर देने की बात कही।पता नही क्यों राजकुमार ललित शर्मा और पाब्ला जी को लगा कि मैं नही रहुंगा तो मज़ा नही आयेगा और उन्होने बैठक स्थगित करके अगले रविवार के लिये टाल दी।ये उन लोगों का मेरे लिये प्यार था और ये उनका बडप्पन भी जिसका मैं हमेशा आभारी रहुंगा।लगता है भूमिका कुछ ज्यादा बड़ी हो गई दरअसल उस सम्मेलन से जुड़ी भावनायें भी बहुत थी शायद इसलिये ऐसा हो रहा है।
खैर मैं आता हूं अब असली मुद्दे पर।तो ब्लागर मीट के बाद एक ब्लागर भाई के अनुभवों ने तो मुझे ज़मीन ट्च कर दिया।मुझे आज तक़ पता ही नही था कि अगर आप बैठक मे मूंगफ़ली या चनाबूट(हरे चने की गड्डी)नही खाते हैं तो आप ईमानदार नही कहला सकते।साला इतने साल से ईमानदार कहलाने के लिये दर-दर भटक-भटक के सर्टिफ़िकेट ढूंढ रहा था,मुझे नही मालूम था कि वो पार्क की घास पर बैठ कर चना खाने मात्र से मिल जाता है।जय हो ब्लाग जगत की।इतना महान ज्ञान और इतना आसान तरीका।हम मूर्ख हैं जो आज तक़ क्लब के बगल के पार्क मे बैठ कर एक ठो फ़ोटो नही खिंचवा पाये।अब सारे फ़ोटोग्राफ़रो को कह दिया है हमारा चना खाते हुये फ़ोटो ही खिंचा जाये और छापा जाये।
उन्ही महान और अनुभवी ब्लागर के ज्ञान भंडार से मुझे ये भी पता चला कि उस दिन मीट मे नाश्ते मे दिया गया समोसा उन्हे नही पचा।बाकि लोगों को तो पच गया और अगर ऐसा हुआ है तो वे किस श्रेणी मे आते है इस बारे मे उन विद्वान महोदय से जानने मिलेगा शायद।एक बात और उन्होने साधारण सी बैठक को भव्य आयोजन भी बता दिया।रोज़ सैकड़ो कप चाय प्रेस क्लब मे बनती है और निशुःलक पिलाई जाती हैं।नाश्ते मे एक समोसा,दो बिस्किट,थोड़े से आलू चिप्स और एक पीस मिठाई थी।ऐसा प्रेस क्लब हर आयोजन मे करता है और इसे भव्य तो कतई नही कहा जा सकता।मिठाई के बारे मे पहले ही बता दिया गया था कि ये डा महेश सिन्हा लायें है और 50 लोगों के लिये समोसा बिस्किट और चिप्स पर जितना खर्च हुआ होगा उतना तो शायद साधारण से साधारण आदमी भी अपने घर आये मेहमान पर खर्च कर सकता है।मात्र कुछ सौ रूपये लगे होंगे जिसे प्रेस क्लब ने खर्च किये।इसमे उन सज्जन को जब धन्ना सेठ के रूपये की बू आई तो मुझे उन्की इस मनुष्यों मे नही पाई जाने वाली इन्द्रिय पर खूब जलन हुई।और एक बात और उन्हे शायद इसलिये वो समोसा पचा नही,लेकिन उन्होने वो समोसा छोड़ा नही पूरा खाया।
अकेले वो ही थे जिन्हे ऐसा लगा कि कोई उन्हे एक समोसा खिलाकर पुतलियों की तरह नचा सकता है।वे किसी धन्ना सेठ के हाथो न नाचना चाहते है और न दूसरे ब्लागरों को नाचते देखना चाहते हैं।मुझे याद है इससे पहले भी उन्हे कई बार बुलाया गया मगर उन्होने आना ज़रूरी नही समझा और इस बार आये भी पता नही क्या-क्या उन्हे नज़र आ गया जो किसी और को नज़र नही आया।उदाहरण के लिये उन्हे ब्लागर मीट मे स्कूल के समय की गुटबाज़ी याद आ गई।ये उनका कहना और इससे ही समझ मे आ जाता है कि उन्हे स्कूल के समय से ही गुटबाज़ी की आदत है और वे इसे न तो भूले है और न भूलना चाहते हैं।पता नही उन्हे किस व्यक्ति के व्यापारिक उद्देश्य और निजी खुन्नस नज़र आ गई और कैसे और किसने उसे छतीसगढ से जोडा?खैर जो स्कूल के समय से गुटबाज़ी करता आ रहा हो उसके अनुभव सिर्फ़ और सिर्फ़ गुटबाज़ी के काम ही आयेंगे।अभी तक़ छतीसगढ के ब्लागरों मे गुटबाज़ी नही है लेकिन इनके अनुभव शायद ये महान और पवित्र काम भी कर देंगे।कहने को अभी और भी बहुत कुछ है लेकिन सब एक बार मे नही।मिलते है एक कमर्शियल ब्रेक के बाद। हम सब समोसा खाने वालों को तो उन्होने व्यापारिक उद्देश्य के लिये किसी धन्ना सेठ के इशारे पर नाचने वाली पुतली कह ही दिया है। और हां उन्हे आज भी छतीसगढ की पहली ब्लागर मीट का इंतज़ार है तो देर किस बात की दोस्त दम है तो करवा के देख लो हम भी आयेंगे और चना ही खा लेंगे मगर खाने के बाद ये नही कहेंगे कि साला चना पचा नही। हा हा हा हा।
खैर ये सब मुझे कहना नही चाहिये लेकिन बहुत दिनों से देख रहा हूं कि इस पर तरह-तरह के विचार सामने आये तो मुझे लगा कि मेरे मन मे धमाचौकड़ी मचा रहे विचारों को भी मन की कैद से मुक्ति मिलनी चाहिये और ब्लाग जगत के अनंत कैनवास पर मनचाहे ढंग से पसरने का मौका भी मिलना चाहिये।सो मै भी हाज़िर हूं अपने अनुभव लेकर।मैने मीट के शुरू होते ही ये साफ़ कर दिया था कि किस तरह से इसके प्रायोजित होने का दुष्प्रचार किया जा रहा है।और ये भी बता दिया था कि आयोजन प्रेस क्लब का है और नाश्ते की मिठाई डा महेश सिन्हा लाये हैं।मैं आपको बता दूं कि रायपुर प्रेस क्लब अपना हाल तमाम साहित्यिक और समाज सेवा से जुडी अन्य गतिविधियों के लिये निशुल्क उपलब्ध कराता है।पुस्तको का विमोचन भी यंहा होता है और कविता-पाठ से लेकर साहित्य पर गोष्ठी भी होती है।और इससे पहले भी यंहा ब्लागर इकट्ठा हो चुके हैं।
रहा सवाल इस मीट का तो, उसका स्वरूप वैसा नही था जैसी मीट हुई।वो महज कुछ ब्लागरों के आपस मे मिलने का कार्यक्रम था और ये तय हुआ था राजकुमार ग्वालानी,ललित शर्मा और बी एस पाब्ला जी के बीच्।राजकुमार ने पाब्ला जी को फ़ोन लगाया था और बातचीत के दौरान उसने बहुत दिनों से मुलाकात नही होने की बात कही।पाब्ला जी ने कहा जब चाहे मिल लेते हैं तो राजकुमार ने रविवार का दिन तय कर लिया और पाब्ला जी को रायपुर बुला लिया क्योंकि इससे पहले हम सब लोग भिलाई जा कर बेहद आत्मीय स्वागत का मज़ा ले चुके थे।राजकुमार ने मुझे बताया कि ऐसा कार्यक्रम तय हुआ है तो मैने भी हां कर दी और स्थान नीयत किया गया प्रेस क्लब।उसके बाद कौन आ रहा है और कार्यक्रम कैसा होगा ये हम लोगों को किसी को नही पता था।
इत्तफ़ाक़ से रविवार को प्रेस क्लब मे एक आवश्यक बैठक हो गई और उसके बाद मुझे पार्षदों के सम्मान समारोह मे जाना था।सो मैने राजकुमार से बैठक मे न आ पाने के लिये क्षमा मांग ली और सारी व्यवस्था प्रेस क्लब मे कर देने की बात कही।पता नही क्यों राजकुमार ललित शर्मा और पाब्ला जी को लगा कि मैं नही रहुंगा तो मज़ा नही आयेगा और उन्होने बैठक स्थगित करके अगले रविवार के लिये टाल दी।ये उन लोगों का मेरे लिये प्यार था और ये उनका बडप्पन भी जिसका मैं हमेशा आभारी रहुंगा।लगता है भूमिका कुछ ज्यादा बड़ी हो गई दरअसल उस सम्मेलन से जुड़ी भावनायें भी बहुत थी शायद इसलिये ऐसा हो रहा है।
खैर मैं आता हूं अब असली मुद्दे पर।तो ब्लागर मीट के बाद एक ब्लागर भाई के अनुभवों ने तो मुझे ज़मीन ट्च कर दिया।मुझे आज तक़ पता ही नही था कि अगर आप बैठक मे मूंगफ़ली या चनाबूट(हरे चने की गड्डी)नही खाते हैं तो आप ईमानदार नही कहला सकते।साला इतने साल से ईमानदार कहलाने के लिये दर-दर भटक-भटक के सर्टिफ़िकेट ढूंढ रहा था,मुझे नही मालूम था कि वो पार्क की घास पर बैठ कर चना खाने मात्र से मिल जाता है।जय हो ब्लाग जगत की।इतना महान ज्ञान और इतना आसान तरीका।हम मूर्ख हैं जो आज तक़ क्लब के बगल के पार्क मे बैठ कर एक ठो फ़ोटो नही खिंचवा पाये।अब सारे फ़ोटोग्राफ़रो को कह दिया है हमारा चना खाते हुये फ़ोटो ही खिंचा जाये और छापा जाये।
उन्ही महान और अनुभवी ब्लागर के ज्ञान भंडार से मुझे ये भी पता चला कि उस दिन मीट मे नाश्ते मे दिया गया समोसा उन्हे नही पचा।बाकि लोगों को तो पच गया और अगर ऐसा हुआ है तो वे किस श्रेणी मे आते है इस बारे मे उन विद्वान महोदय से जानने मिलेगा शायद।एक बात और उन्होने साधारण सी बैठक को भव्य आयोजन भी बता दिया।रोज़ सैकड़ो कप चाय प्रेस क्लब मे बनती है और निशुःलक पिलाई जाती हैं।नाश्ते मे एक समोसा,दो बिस्किट,थोड़े से आलू चिप्स और एक पीस मिठाई थी।ऐसा प्रेस क्लब हर आयोजन मे करता है और इसे भव्य तो कतई नही कहा जा सकता।मिठाई के बारे मे पहले ही बता दिया गया था कि ये डा महेश सिन्हा लायें है और 50 लोगों के लिये समोसा बिस्किट और चिप्स पर जितना खर्च हुआ होगा उतना तो शायद साधारण से साधारण आदमी भी अपने घर आये मेहमान पर खर्च कर सकता है।मात्र कुछ सौ रूपये लगे होंगे जिसे प्रेस क्लब ने खर्च किये।इसमे उन सज्जन को जब धन्ना सेठ के रूपये की बू आई तो मुझे उन्की इस मनुष्यों मे नही पाई जाने वाली इन्द्रिय पर खूब जलन हुई।और एक बात और उन्हे शायद इसलिये वो समोसा पचा नही,लेकिन उन्होने वो समोसा छोड़ा नही पूरा खाया।
अकेले वो ही थे जिन्हे ऐसा लगा कि कोई उन्हे एक समोसा खिलाकर पुतलियों की तरह नचा सकता है।वे किसी धन्ना सेठ के हाथो न नाचना चाहते है और न दूसरे ब्लागरों को नाचते देखना चाहते हैं।मुझे याद है इससे पहले भी उन्हे कई बार बुलाया गया मगर उन्होने आना ज़रूरी नही समझा और इस बार आये भी पता नही क्या-क्या उन्हे नज़र आ गया जो किसी और को नज़र नही आया।उदाहरण के लिये उन्हे ब्लागर मीट मे स्कूल के समय की गुटबाज़ी याद आ गई।ये उनका कहना और इससे ही समझ मे आ जाता है कि उन्हे स्कूल के समय से ही गुटबाज़ी की आदत है और वे इसे न तो भूले है और न भूलना चाहते हैं।पता नही उन्हे किस व्यक्ति के व्यापारिक उद्देश्य और निजी खुन्नस नज़र आ गई और कैसे और किसने उसे छतीसगढ से जोडा?खैर जो स्कूल के समय से गुटबाज़ी करता आ रहा हो उसके अनुभव सिर्फ़ और सिर्फ़ गुटबाज़ी के काम ही आयेंगे।अभी तक़ छतीसगढ के ब्लागरों मे गुटबाज़ी नही है लेकिन इनके अनुभव शायद ये महान और पवित्र काम भी कर देंगे।कहने को अभी और भी बहुत कुछ है लेकिन सब एक बार मे नही।मिलते है एक कमर्शियल ब्रेक के बाद। हम सब समोसा खाने वालों को तो उन्होने व्यापारिक उद्देश्य के लिये किसी धन्ना सेठ के इशारे पर नाचने वाली पुतली कह ही दिया है। और हां उन्हे आज भी छतीसगढ की पहली ब्लागर मीट का इंतज़ार है तो देर किस बात की दोस्त दम है तो करवा के देख लो हम भी आयेंगे और चना ही खा लेंगे मगर खाने के बाद ये नही कहेंगे कि साला चना पचा नही। हा हा हा हा।
Subscribe to:
Posts (Atom)