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Saturday, February 13, 2010

साबित हो गया इस देश में खाने पे भारी है खान,खाने से ज्यादा ज़रूरी है खान!

कई दिनों से लगातार ये खान,खान और खान देखते-देखते पक गया।मीडिया ने कल साबित कर दिया कि इस देश में खाने पे भारी है खान,खाने से ज्यादा ज़रूरी है खान!ठाकरे लोगों को जी भर कर गालियां देने और खुद को मुम्बईवासियों और देशवासियों का सबसे बड़ा शुभचिंतक और हितचिंतक साबित करने के बाद लगा कि अब तो वे लोग महंगाई के बारे में बात करेंगी।मगर आज फ़िर से खान बाबा ही हिट हैं।क्या इस देश मे सिर्फ़ फ़िल्म ही सब कुछ है।क्या खाने-पीने से भी ज्यादा ज़रूरी है फ़िल्म देखना और दिखाना?क्या छत्तीसगढ जैसे नये और उभरते राज्यों में नक्सलियों का दीमक लगना और उसकी तरक्की पर ग्रहण लगना कोई समस्या नही है?क्या उससे निज़ात पाना ज़रूरी नही है?क्या देश मे बढ रही आतंकवदियों की घुसपैठ समस्या नही है?क्या रोजी-रोटी की समस्या से जूझते बेरोज़गारों की चिंता करना ज़रूरी नही है?क्या पिछड़े इलाकों मे मूलभूत सुविधायें मुहैया करना ज़रूरी नही है?क्या किसानों के इस देश मे भूख से मर रहे अनाज उगाने वालों के बारे मे सोचना ज़रुरी नही है?क्या मज़दूरों को उनके पसीने का उचित दाम दिलाने के लिये बात करना ज़रूरी नही है?क्या इस देश मे बढ रहे भ्रष्टाचार पर बात करना ज़रूरी नही है?क्या राजनीति मे खरीद-फ़रोख्त और दलाली समस्या नही है?क्या भूखमरी जैसी समस्या से जूझ रहे इस देश मे फ़िल्म देखना और दिखाना ज़रूरी है?अगर है तो फ़िर तो ये मानना ही पड़ेगा कि इस देश मे खाने पर भारी है खान और खाने से भी ज़रुरी है खान!

21 comments:

इटिप्स ब्लाग टिम said...

अनिल जी हमारे देश मे हिट होने का यही फार्मुला है ।अमीर देश मे गरीब लोगोँ कि सुनने वाला कोई नही आप भी लिखते संक्षिप्त सटिक और बेबाक क्योकी अब हर कोई सिखेगा।

Suresh Chiplunkar said...

अरे भाऊ… देश की सबसे विकराल समस्या तो "सेकुलरिज़्म" पर खतरा है ना… और "खान" की पिक्चर के बहाने इन सेकुलर चैनलों को हिन्दुत्ववादी ठाकरे की धुलाई करने का अच्छा बहाना दे दिया…। महंगाई वगैरह पर बात नहीं की जाती, क्योंकि इससे राहुल बाबा की नींद खराब होती है… :)
वैसे कल से एक SMS भी खूब घूम रहा है - "अमिताभ और करण जौहर बाल ठाकरे के सामने क्यों झुके और शाहरुख क्यों नहीं झुका, क्योंकि अमिताभ और करण हिन्दू हैं, और हिन्दुओं को झुकने, कुटने, पिटने, ठुकने की तो आदत ही है…”। मीडिया ने जिस तरह से शाहरुख को “इस्लामी आइकॉन” बनाया है इसके बहुत खतरनाक परिणाम आने की सम्भावना भी नकारी नहीं जा सकती…

बी एस पाबला said...

खान नहीं हुज़ूर
सोने की खान कहिए :-)

इसी बहाने विज्ञापन तो मिल जाते हैं चैनलों की दाल रोटी के लिए

बी एस पाबला

Arshad Ali said...

khana hamari zarurat hay
khan unki jarurat
khane wale ham hayn
parosne wale wo
ab wo wahi parosege na jo unki zarurat hay.

संजय बेंगाणी said...

खाने से बड़ा देश और उससे बड़ा खानदान है. खाना नहीं खानदान महत्त्वपूर्ण है. फिर खान जरूरी है क्योंकि उसकी निष्ठा खानदान के प्रति जगजाहिर है. उसके बाद नम्बर आता है खान का जिसमें से धातुएं निकलती है. खाने के लिए खान चाहिए. जनता केवल धान खाती है, उसका क्या महत्त्व? अतः देश के लिए खानदान और खान की चिंता करो. भारत माता की जय!

दिगम्बर नासवा said...

राजनीति की चालें बहुत गहरी हैं .... हमारे देश में जो न हो वो कम है ...........

shripsacharya said...

Dear Anil Bhaiyya,

Is desh me Bhagwan se bhi jyada shaktishali media hai...Usne kisiki kismat me kuchh bhi likha ho media sab badal sakta hai media.. sadharan se aadmi ko mahimamandit karna ho ya mahamandleshwar ko jamin dikana bas TRP chahiye...Thakre logo ke bhashai kritya aur unki mukhota- deshbhakti ko jeetni bar dikhate hai har bar nafrat ka flue naye logo ko pakdta hai.agar media inki avhelna shuru kar de to shayad vo prachar inhe aur inke vicharo nahi mil paye.
Parso rat Belgam (Karnataka) me Pune ke liye bus ka intzar karte hue shahar ki ek Hotel me khana kha raha tha.. achanak kuch bhagdor.. kalbali si machi dharadhar shutter band ho gaye hum hotel me band ho gaye.. pata karne par malum hua ki kal my name is....release karne aur na karne dene ki baat par do samuday amne samne aagaye hai.. kuch bus chhut jane ki akulta aur kuchh bahar ke mahol ka bhay...jaise taise police se kah kar Bus tak pahunche .pure raste shahar chawani ban gaya tha ..tab ahsas hua ke palo me hasta-jeeta shahar yuddh ki chhawni bana de vo dam shiv aur media mein hi hai.. aur ha mera khana...vo bhi chhut gaya sach kaha apne kane par bhari hai khan..
Sadar,

ravi k.gurbaxani said...

anil sirji aapki bebak kalam ka jwab nahi hai...khan vivad par aapki tip gahri chot karati hai...badhai...

डॉ० कुमारेन्द्र सिंह सेंगर said...

अँधेरे में जो बैठे हैं नजर उन पर भी कुछ डालो, अरे ओ ????????? वालो!!!!
क्या करेंगे भाई ये हाल ही है इन ???????????????? का.
जय हिन्द, जय बुन्देलखण्ड

काजल कुमार Kajal Kumar said...

देखा! कितने भले हैं लोग मेरे यहां के...दूसरे के पेट को अपने पेट से पहले तरजीह देते हैं :)

राज भाटिय़ा said...

अनिल जी नमस्कार, अगली बार आप से मुलाकात जरुर होगी, बाकी आप का लेख आंखे खोलने के लायक है, लेकिन जनता भी कहा सुनाने वाली है, बस भेड बकरियो की तरह एक तरफ़ चल पडती है

श्याम कोरी 'उदय' said...

.... कौन है ये खान!!! ....क्या खान ही सबकुछ है!!! .... क्या खान के बगैर कुछ संभव नही है!!!.....क्या खान के अलाबा कोई मुद्दा नही है!!! .... कितने लोग खान को जानते हैं !!! .....क्या खान देश मे व्याप्त समस्याओं का एक मात्र विकल्प है!!!! .....क्या मीडिया के पास कोई और मुद्दा नही है!!!

Udan Tashtari said...

सब सोची समझी साजिशें हैं सर जी और आम आदमी डांस करता है.

भारतीय नागरिक - Indian Citizen said...

पुणे में दस मारे गये हैं बम धमाके में. इतनी सतर्कता पुलिस ने बरती है और अब शाहरुख "माय नेम इस डिसीस्ड इन बम ब्लास्ट" बनायेंगे.

भारतीय नागरिक - Indian Citizen said...

पुणे में दस मारे गये हैं बम धमाके में. इतनी सतर्कता पुलिस ने बरती है और अब शाहरुख "माय नेम इस डिसीस्ड इन बम ब्लास्ट" बनायेंगे.

Ajay Tripathi said...

खाने पर भारी है खान और खाने से भी ज़रुरी है खान! bdhaiya

मनोज कुमार said...

यथार्थ लेखन।

shankar chandraker said...

आपके बात से सहमत हूँ भैयाजी. महंगाई को साधने में सरकार अब तक नाकाम रही है. मुंबई में कांग्रेस सरकार फिल्म से कहीं ज्यादा शिवसेना को साधने के लिए फ़ोर्स लगाई थी. फिल्म तो सिर्फ एक बहाना था. अगर फिल्म के लिए इतना फ़ोर्स लगाना था तो वह पहले से लगा देते. कुल मिलाकर जो कुछ हुआ सब अपने-अपने वोट बटोरने के लिए है. महंगाई, बेरोजगारी पर आपकी चिंता वाजिब है, इसमें कहीं न कहीं नेता से लेकर मीडिया तक की भी बेपरवाही है.

जी.के. अवधिया said...

आप भी क्या क्या गैरजरूरी प्रश्न पूछते रहते हैं अनिल जी। ये जानते हुए भी कि इन प्रश्नों का उत्तर नहीं मिलने वाला है।

अल्पना वर्मा said...

इस देश मे खाने पर भारी है खान और खाने से भी ज़रुरी है खान!
-bilkul sahi kahte hain!

Politicians ka drama stage ban ka rah gya hai desh!

डॉ टी एस दराल said...

पाबला जी ने मेरे मन की बात कह दी।
भैया , ये सोने का अंडा देने वाली मुर्गी है।
इसकी रक्षा से ही लाखों को रोज़ी रोटी मिलती है।
न्यूज चैनल्स को भी।