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Wednesday, April 21, 2010

जंहा दिल खुशी से मिला मेरा वंही सर भी मैने झुका दिया!

जंहा दिल खुशी से मिला मेरा वंही सर भी मैने झुका दिया!ये बात सौ प्रतिशत सही उतरती है बस्तर के भोले-भाले आदिवासियों पर।जिस पर विश्वास किया उस पर सब कुछ निछावर करते आ रहे हैं और मान्य्ताओं का तो फ़िर क्या कहना।उनकी एक अनोखी मान्यता की खबर मुझे भी मिली जो आप लोगों को बता रहा हूं।बस्तर के मुख्यालय जगदलपुर से कांगेर घाटी की ओर जाने पर लगभग पचास किमी पर मुख्य मार्ग से कुछ अंदर जंगल मे एक मंदिर है जंहा बीमार लोग अपनी बीमारी ठीक करने के लिये चश्मा चढाते हैं।बोलचाल की भाषा मे चश्मे वाली मैया का मंदिर कहा जाता है।भोले-भाले आदिवासी आज भी अपनी बीमारियों के इलाज के लिये डाक्टरों के पास जाने की बजाय अपने बेगा-गुनिया से झाड़-फ़ूंक कराते है या फ़िर चश्मे वाली मैया जैसे और भी देवी-देवता हैं उनके पास्।
आज़ादी के इतने सालों बाद भी इलाज का ये तरीका बताता है कि विकास सारी दुनिया मे जिस रफ़्तार से भी दौड़ा होगा यंहा बस्तर मे वो रेंग भी नही पाया है।यंहा आज भी बुखार का इलाज मरीज को चिंटियों से भरी बोरी मे डाल कर किया जाता है।ताड़ी और सल्फ़ी की मादकता मे मस्त आदिवासियों को पता ही नही चला कि विकास की दौड़ मे वे कितने पीछे हैं और उन्हे इस बात से शिकायत भी नही है।वे तो आज भी अपनी ही दुनिया मे मस्त हैं जंहा प्यार और विश्वास के सिवाय और कुछ नही मिलता।



अब चाहे राज्य सरकार चिकित्सा सुविधा के लिये डेड़ सौ करोड़ रूपये के पैकेज की घोषणा करे या तीन सौ करोड़ की,आदिवासियों को क्या फ़र्क़ पड़ता है।बीमार हुआ तो चले जायेंगे चश्मे वाली मैया की शरण में।बताया जाता है जंगल आदिवासियों को उनकी जरुरत की सारी चींज़े दे देता है सिवाय नमक के।और उसी नमक को लेने के लिये आदिवासी जंगल से बाहर आता था और व्यापारियों को चिरौंजी देकर नमक लेता था।इस बात का उल्लेख एक बार अखण्ड मध्यप्रदेश के तत्कालीन राज्यपाल ने बस्तर प्रवास पर कर दिया था तो बड़ा बखेड़ा हुआ था।आखिर पूरा न सही थोड़ा बहुत तो सच होगा ही।आज भी बस्तर का आदिवासी मौसम मे महुआ सस्ते मे बेच देता है और आफ़ सीज़न में कोल्ड स्टोरेज मे रखा वही महुआ उसे कई गुना महंगा खरीदना पड़ता है।पता नही ये विकास नाम का धावक कब इस तरफ़ आयेगा।शायद उसे किसी ने यंहा के बीहड जंगलो और खून बरसाते नक्सलियों के बारे मे बता दिया है।शायद उसे सरकार की सुरक्षा व्यवस्था पर भरोसा नही है या फ़िर उसे रोज़ हो रही सुरक्षा कर्मियों की मौत की खबर डरा रही है।कारण चाहे जो भी हो ये तो तय है विकास बाबू ने यंहा आने मे देर तो की है और अब भी अगर वे समय पर नही पंहुचे तो फ़िर उनके पास सिवाय इस बात के और क्या चारा होगा कि एक चश्मा लें और मैया को चढा दें।मुझे लगता है कि उनके पास और कोई उपाय है भी नही।

13 comments:

ललित शर्मा said...

विकास बाबू ने यंहा आने मे देर तो की है और अब भी अगर वे समय पर नही पंहुचे तो फ़िर उनके पास सिवाय इस बात के और क्या चारा होगा कि एक चश्मा लें और मैया को चढा दें।

अद्भुत जानकारी दी है अनिल भैया-आभार

भारतीय नागरिक - Indian Citizen said...

ये तो बेचारे भोले भाले हैं, इनकी आस्था ही इनका विश्वास है...
उनका क्या किया जाये जो इनके विश्वासों को तोड़ते हैं और वोट लूट कर इन्हें छ्ल जाते हैं..

पी.सी.गोदियाल said...

इनके इसी भोले पण का नाजायज फायदा उठा, इनमे जहर भरकर ये कामरेड और मिशनरी अपनी रोटियाँ सेक रहे है दुष्ट राज्नेतावों के संग मिलकर !

महफूज़ अली said...

भैया... बहुत ही रोचक बात बताई आपने.... और सरकारी खामियों को बहुत ही खूबसूरती से उजागर किया है आपने..... बहुत अच्छी लगी यह पोस्ट...

sangeeta swarup said...

आदिवासियों के बारे में अच्छी जानकारी....और इस क्षेत्र के विकास की चिंता साफ़ झलक रही है इस लेख पर....

Kulwant Happy said...

बहुत खूब निकालकर आए हैं सर जी।

डॉ महेश सिन्हा said...

विकास बाबू अभी चसमे का मोह नहीं छोड़ पा रहे हैं

dhiru singh {धीरू सिंह} said...

चश्मा चढाये लोग तो सुनते नही इसलिये शायद चश्मा चढा के देवी को मनाते है .

काजल कुमार Kajal Kumar said...

बेचारा आदिवासी, आदिवासी कहां है...वह तो वोट है. आदिवासी मंत्री-मुख्यमंत्री तक को इन्हें संभालना नहीं सुहाता तो बाक़ियों की कोई क्या कहें !

मो सम कौन ? said...

आदिवासियों का भले ही विकास न हो, सरकारी अमलकारों, NGOs का, प्रगतिशीलों का विकास तो हो ही जाता है इनके नाम पर।
इस शोषित तबके का होना बहुत जरूरी है नहीं तो विकास बाबू नेताओं, अफ़सरों के घर कैसे पहुंचेंगे।

आभार।

जितेन्द़ भगत said...

रोचक खबर।

वन्दना अवस्थी दुबे said...

बहुत बढिया. धारदार.

शरद कोकास said...

जो नमक के बदले चिरौंजी दे देता है उसके मासूम विश्वास के साथ खेलने वालों का विरोध होना चाहिये ।