Tuesday, November 15, 2011

करोडो का कर्ज़ देकर वसूली भी नही माल्या सेठ से,आम आदमी होता तो साले की इज़्ज़त तक़ नीलाम कर देते?

कर्ज़ में डूबी युबी ग्रुप की किंगफिशर को बैंको का कर्ज़  पर कर्ज़ दिया जाना क्या एक सुनियोजित ठगी नही है?क्या स्टेट बैंक अफ इंडिया और महाराष्ट्र सरकार की भागीदारी वाली सिम्को का डुबती हुई नैया पर दांव लगाना एक राजनैतिक षडयंत्र की ओर इशारा नही करता?निवेश के जरिये जनता की गाढे पसीने की कमाई इकट्ठा कर और बैंको के करोडो रुपयो का युबी ग्रुप ने क्या किया ये तो पता नही मगर कर्ज़ के माल पर ऎश करने वाले माल्या सेठ बडे से बडे धनकुबेर के लिये जलन का सबब बन गये थे.अपनी खास लाईफ स्टाइल के कारण देश ही नही विदेशों में भी अपनी अलग पहचान बना चुके माल्या दोनो हाथ से लगता है बैंको और जनता का माल लुटाते रहे हैं.खुले आम शराब पीते नज़र आने वाले माल्या सेठ के आसपास अधनंगी हसीनाओं का जमघट को शहद के छत्ते के पास मधुमक्खियों की तरह रहता था.अपनी शराब की बिक्री बढाने के लिये बनाये जाने वाले कैलेण्डरों के छपाई से पहले फोटो सेशन मे तो लडकियों को लगभग नंगा ही कर दिया जाता था.तमाम प्रकार की अय्याशी कहिये या ऎश लगता है किंगफिशर को ही नंगा कर गई.अब चौंकाने वाली बात तो ये है कि आम आदमी को मामूली  से होम लोन के लिये सैकडो चक्कर कटवाने वाले बैंक माल्या सेठ पर इतने मेहरबान क्यों रहे?इस लोन गेम में भी बडे बडे दिग्गज़ नेताओं की सिफारिश का ज़िक्र हो रहा है.सारी बात जनता के सामने आनी चाहिये.अखिर मामूली से कर्ज़ की अदायगी ना कर पाने पर आम आदमी का घर कुर्क कर लेने का चंडाली कार्य करने वाले बैंक माल्या सेठ पर क्यों मेहरबान है,ये भी तो सबको पता चलना चाहिये.क्या सडेला सिस्टम है  साला इस देश का.किसी को द रहे है तो हज़ारो करोडो और वसूल भी नही रहे है़.आम आदमी होता तो सरे अम विग्यापन छपवा कर उसकी इज़्ज़त नीलाम कर दिया जाता.थू है ऎसे सिस्टम पर.

7 comments:

प्रवीण पाण्डेय said...

यही अन्तर है खास और आम में।

Vivek Rastogi said...

थू है ऐसे बैंको पर भी ।

दिगम्बर नासवा said...

सब नेताओं की मिली भगत है ... जब मनमोहन जी ने पहल कर डी है तो बेंक या कोई और कौन होता है ...

दीपक बाबा said...

अपुन का इस्टाइल है - भीख मांगने का भी.

परमजीत सिँह बाली said...

विचारणीय पोस्ट।

Atul Shrivastava said...

चिंतन योग्‍य पोस्‍ट।
शर्म आनी चाहिए ऐसी व्‍यवस्‍था पर।

आशा जोगळेकर said...

व्यवस्था तो सड ही रही है पर कुर्सी वालों को तो उसकी सडांध ही अच्छी लग रही है ।