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Tuesday, February 1, 2011

सौ करोड़ का नुकसान उठाकर 250 दुकानें बंद करने की घोषणा शराबबंदी की ओर सरकार का एक ईमानदार कदम

छत्तीसगढ सरकार अप्रेल से शराब की 250 दुकाने बंद करने जा रही है।केबिनेट ने भी इस फ़ैसले पर मुहर लगा दी है।शराबखोरी मे सारे देश में तीसरे स्थान पर पहुंच चुके छत्तीसगढ के लिये एक अच्छी खबर है।राज्य बनने के बाद से यंहा शराबखोरी में तेजी से इज़ाफ़ा हुआ है और शराब की गांव-गांव मे दुकाने खुल गई हैं।जंहा दुकान नही है वंहा कोचियों (अवैध बेचने वाले)के ज़रिये शराब मिल जाती है।ऐसी स्थिति मे छत्तीसगढ सरकार का ये कदम शराबबंदी की ओर एक ईमानदार कदम कहा जा सकता है।
छत्तीसगढ सरकार ने दो हज़ार तक़ की आबादी वाले गांवों मे अब शराब दुकानों का ठेका नही देने का फ़ैसला किया है।फ़ैसले पर केबिनेट ने मुहर लगा दी है और सरकार ने इसकी घोषणा भी कर दी है।यानी ढाई सौ गांव और उनके आसपास के सैकड़ो गांवो के लोगों को सरकार ने शराब से बचाने की दिशा में एक सार्थक पहल की है।वर्तमान मे पूरे राज्य में 1054 शराब दुकाने हैं।
शराब के कारोबार में छत्तीसगढ सरकार को भरपूर लाभ मिलता है।यंहा बार की लायसेंस फ़ीस ही दस लाख रूपये सालाना है,जो काफ़ी ज्यादा है इसके बावजूद यंहा बार धड़ाधड़ खुल रहे हैं।शराब दुकानों का हर साल ठेका होता है और ठेके के लिये निविदा प्रपत्र यानी टेण्डर फ़ार्म की बिक्री से सरकार को करोड़ो रूपये मिल जाते हैं।
सौ करोड़ रूपये का नुकसान उठा कर 250 शराब दुकाने बंद करने का फ़ैसला काफ़ी कठीन काम है क्योंकि हर राज्य की तरह यंहा भी शराब लाबी काफ़ी ताक़तवर मानी जाती है।दरअसल इस बारे में पहल की है भाजपा के युवा विधायक देवजी पटेल ने।सरकार को आये दिन परेशानियों मे डालने वाले देवजी को सरकार ने इस बार ब्रेवरेज़ कार्पोरेशन का अध्यक्ष बना दिया है।अध्यक्ष बनते ही उन्होने कार्पोरेशन का मुनाफ़ा बढाने के लिये नई शराब दुकाने खोलने की सरकारी स्कीम को कैंसल किया और तेजी से नशे कि गिरफ़्त मे जकड़ते जा रहे प्रदेश के ग्रामीण लोगों को इससे दूर करने के लिये ग्रामीण इलाकों मे खुली शराब दुकानो को बंद करने का फ़रमान जारी किया।सौ करोड़ के राजस्व की हानी अफ़सरों के साथ-साथ शराब ठेकेदारों के लिये भी आसानी से पचने वाली बात नही थी सो इसका विरोध होना शुरू हुआ और देवजी भाई पटेल ने सीधे मुख्यमंत्री डा रमन सिंह से इस बारे में बात की और उन्होने भी शराबबंदी की ओर बढने वाले कदम को हरी झण्डी दिखा दी।
गांवो को शराब की लत से बचाने की शुरूआत तो हो गई है अब इंतज़ार है कस्बों और शहरों को भी इससे बचाने य मुक्त कराने का।शराबखोरी इस राज्य मे इस कदर बढी है कि गांव के गांव नशे की चपेट मे हैं।दर्ज़नों गांवों मे बहनें शराब दुकान के खिलाफ़ मोर्चा खोले हुये है।परिवार को बचाने के लिये बहुत से गांव की पूरी महिलायें धरना देने से लेकर शराब दुकानों  मे तालाबंदी और तोड़-फ़ोड़ तक़ कर देती है।ऐसी स्थिति मे रमन सिंह सरकार का ये कदम निश्चित ही सराहनीय है।

Friday, July 17, 2009

हां मै मुख्यमंत्री का चमचा हूं!

अगर अच्छे काम की तारीफ़ का ये ईनाम है तो ये ही सही।मुझे इस बात का ज़रा भी डर नही लग रहा है कि कोई मुझ जैसे आक्रामक और विद्रोही के मुंह से किसी की जी भर के तारीफ़ सुन कर क्या कहेगा?मुझे आज ये कहने में ज़रा भी संकोच नही हो रहा है कि मुख्यमंत्री रमन सिंह एक नेक दिल इंसान ही नही एक अच्छे राजनेता है।उन्होने शहीद एस पी विनोद चौबे और उप निरीक्षको के परिजनो के लिये अनुकम्पा नियुकति के नियमो मे ढील देते हुये उनके परिजनो को डिप्टी कलेक्टर/डिप्टी एस पी और सहायक उप निरीक्षक के पद पर नियुक्ती का फ़ैसला किया।ये फ़ैसला वाकई महत्वपूर्ण है।इससे पहले किसी भी मुख्यंमंत्री ने ऐसा नही किया।शहीद होने वाले निरीक्षको या उप निरीक्षको के परिजनो को सिपाही के पद पर नियुकति मिला करती थी।उनके लिये इतना करने वाले रमन सिंह का यदी मुझे ज़िंदाबाद करना पड़े तो भी मुझे शरम नही आयेगी।मुझे वो भी मंज़ूर है।यंहा मै ये साफ़ कर देना चाहूंगा कि मरने वालो मे मेरा कोई सगा तो दूर,दुर-दूर का रिश्तेदार नही है।और तो और मेरा कोई भी रिश्तेदार किसी भी सरकारी नौकरी मे नही है।इसके बावज़ूद रमन सिंह की और उनके मंत्रिमंडल की तारीफ़ करनी होगी जिसने इतना बडा फ़ैसला लिया।इस माम्ले मे मै सालो से लिखता आ रहा हूं और इस पर बहस भी कर रहा हूं और इसे अमलीजामा पहनाने की कोशिश भी।आज अचान्क रमन सिंह के फ़ैस्ले ने मुझे अपनी 29 अप्रेल को लिखी एक पोस्ट की याद दिला दी।इस पोस्ट को आज मै उसी संदर्भ मे रिपोस्ट कर रहा हूं।कृपा कर इसे पढे बिना कोई भी प्रतिक्रिया न दे।


Wednesday, April 29, 2009

मैं उपनिरीक्षक की विधवा!क्या मेरा सुहाग लुटना,क्या मेरी दुनिया उजड़ना,क्या मेरे बच्चों का भविष्य बर्बाद होना महज़ इत्तेफ़ाक़ हैं?

छत्तीसगढ मे अचानक बड़े-बडे लोगो की बढती दिलचस्पी और बडे-बडे नामधारियों के दौरे देखकर मुझे लगा कि मेरे भी दिन फ़िर जायेंगे! मगर ऐसा कुछ नही हुआ! वे लोग आये तो मगर रटे-रटाये तोते की तरह सिर्फ़ और सिर्फ़ पढाई हुई बात कह कर चले गये।मुझे उम्मीद थी कि उनमे से एक तो कम से कम औरत होने के नाते ही मेरा दर्द समझेगी मगर सब सपनो की तरह टूट गया। और मज़बूर होकर मेरे दिल से सिर्फ़ आह ही निकल सकी कि मैं उपनिरीक्षक की विधवा!क्या मेरा सुहाग लुटना,क्या मेरी दुनिया उजड़ना,क्या मेरे बच्चों का भविष्य बर्बाद होना महज़ इत्तेफ़ाक़ हैं?

मेरी भी अपनी खूबसूरत दुनिया थी।मेरे पति को रिश्वत के भूत से ज्यादा देशभक्ती के ज़ूनून ने जकड़ रखा था।नई-नई नौकरी और नई-नई शादी।राजधानी के मलाईदार इलाके की पोस्टिंग के बाद उसी थाने बने रहने के लिये मोटी रकम की फ़रमाईश के बाद बस्तर की पोस्टिंग की धमकी पर हमने मिलकर चर्चा की।सब दोस्तो ने कहा कि सिद्धांत छोडो और कमाओ,कमाने दो का रास्ता पकडो,मगर उन्होने साफ़ मना किया।मैने भी खुशी-खुशी पति का हौसला बढाते हुये हर-हाल मे ईमानदारी की सूखी रोटी खाकर सुखी जीवन जीने का संकल्प दोहरा दिया,और हम राजधानी की चमक-धमक से दूर बस्तर के जंगल मे फ़ेंक दिये गये। ऐसे की चाह कर भी वापस निकल न सके।

शुरू के दिन तो बड़े मज़े से गुज़रे।वंहा जाकर एक बार और हमारी बगिया मे फ़ुल खिलाऽब हम दो और हमारे दो थे।बडी लड़की नर्सरी जाने लायक हो गई थी,और जहां हमारी पोस्टिंग थी वहां नर्सरी एक सपने के समान थी।तब पहली बार लगा था कि देशप्रेम और राष्ट्रभक्ति जैसी बाते किताबों मे ही ठीक लगती है।बच्चो के भविष्य को ध्यान मे रखते हुये मैने इनसे कहा कि वापस किसि अच्छे शहर चल्ते हैं।उन्होने भी बेहद थके हुये स्वर ने कहा था कि ट्राई करते हैं।उस दिन मुझे लगा था कि वे बस्तर के जंगलो मे मौत से रोज़ जंग लड़ते हुये हुये जवानी मे ही बूढे हो चले हैं।वो जोश वो जुनूं सब बस्तर के हने जंगलो मे गुम होता नज़र आया।

मै रोज़ उनसे पूछ्ती कि क्या हुआ?और रोज़ उनका जवाब होता सब ठीक हो जायेगा।फ़िर एक दिन गुज़र जाता,ऐसा करते-करते साल गुज़र गये। हमे ऐसा लगने लगा कि हम बस्तर के लिये ही बने है। छोटू अब चलने लगा था और तुतली भाषा मे बात करने लगा था। अब मैने ज़िद पकड़ ली थी कम से कम बच्चो को पढा लिखा तो लूं।मेरी ज़िद भी उन्हे अंदर से तोड़ रही है ये मुझे पता ही नही चला।रोज़ सुबह बच्चो की पढाई के सवाल के साथ उन्हे घर से ड्यूटी के लिये विदा करती थी और रात को घर मे घुसते समय फ़िर से उन्ही सवालो के साथ स्वागत करती थी।


रोज़-रोज़ के सवालो से लगता है वे भी त्रस्त आ गये थे,एक दिन उन्होने कहा कि मै कुछ न कुछ करता हूं,मुझे तंग मत किया करो,कुछ दिनो की मोहलत दो। और कुछ दिनो बाद उन्होने मुझ्से कहा कि तैयारी करो। हम वापस जा रहे हैम्। मै हैरान थी।मैने पूछा सच और उन्होने कहा हां!कैसे ?इसका जवाब तो जैसे रुला देने वाला था।उन्होने मेरी ज़ीद से परेशान होकर वापस शहर मे पोस्टिंग के लिये अपना पुशतैनी मकान बेच कर एडवांस दे दिया था।मै भी वापसी की तैयारियो मे जुटी हुई थी कि एक रोज़ ये गश्त से लौटे नही।सुबह काफ़ी देर होने के बाद भी जब इनकी कोई खबर नही आई और थाने के अलावा दूसरे लोग घर के आस-पास मंडराने लगे तो माथा ठनका और जो मेरा शक़ था वो सच निकला।

मेरी दुनिया उजड़ चुकी थी।उनका चेहरा होता तो शायद आखिरी बार देख भी लेती।लोथड़ो को बटोर कर लाश का शकल देने की कोशिश की गई थी और पता नही किस हवलदार का हाथ य किस सिपाही का पैर भी शामिल था उनकी लाश में।पता नहि कितनी बार मै बेहोश हुई हूंगी और जब होश मे आई तो मुझे अनुकंपा की भीख मे सिपाही की नौकरी दे दी गई। अब मै उप निरीक्षक की बीबी नही एक सिपाही हूं,जिसका जवान जिस्म साब लोगो की भूखी आंखो की आग मे झुलस कर कब बूढा हो गया पता ही नही चला। अब मुझे ज़रूरत भी नही मह्सूस होती किसी अच्छी प्राइवेट नर्सरी की।मेरे बच्चे सरकारी स्कूल मे पढ रहे हैं।उन्का भविष्य बनने से पहले ही बिगड़ गया है।मेरे सपने सज़ने से पहले ही उजड़ चुके हैं।

कभी-कभी आप लोगो की बड़ी-बड़ी बाते सुनती हूं तो ऐसा लगता है कि कभी कोई हमारे बारे मे भी बोलेगे मगर आप लोगो को तो सिर्फ़ छतीसगढ मे एक आदमी ही नज़र आता है।कभी दिल्ली की महिलाओ को छत्तीसगढ पर रोते देखती हूं तो लगता है कि अब वो हम लोगो के लिये भी बोलेंगी। हमारा क्या दोष हमे सिपाही क्यों बनाया गया?अनुकम्पा देना ही था उसी पद पर देते जिस पद पर हमारा पति था?मगर अफ़्सोस इस मामले कोई नही बोला। हवाई जहाज मे दुनिया घूमने वालि औरते भी नही बोली और ना ही कानून के बड़े-बड़े जानकार बोले और देश-विदेश के महान लोगो को तो इस बारे मे मालूम ही नही,क्योंकी उन्हे बताया गया ही नही।उन्हे तो सिर्फ़ ये मालूम है कि छत्त्तीसग़ढ मे सिर्फ़ एक आदमी के साथ अन्याय हो रहा है और जो हमारे साथ या हम जैसे और लोगो के साथ हुआ वो क्या न्याय है!