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Friday, July 17, 2009

हां मै मुख्यमंत्री का चमचा हूं!

अगर अच्छे काम की तारीफ़ का ये ईनाम है तो ये ही सही।मुझे इस बात का ज़रा भी डर नही लग रहा है कि कोई मुझ जैसे आक्रामक और विद्रोही के मुंह से किसी की जी भर के तारीफ़ सुन कर क्या कहेगा?मुझे आज ये कहने में ज़रा भी संकोच नही हो रहा है कि मुख्यमंत्री रमन सिंह एक नेक दिल इंसान ही नही एक अच्छे राजनेता है।उन्होने शहीद एस पी विनोद चौबे और उप निरीक्षको के परिजनो के लिये अनुकम्पा नियुकति के नियमो मे ढील देते हुये उनके परिजनो को डिप्टी कलेक्टर/डिप्टी एस पी और सहायक उप निरीक्षक के पद पर नियुक्ती का फ़ैसला किया।ये फ़ैसला वाकई महत्वपूर्ण है।इससे पहले किसी भी मुख्यंमंत्री ने ऐसा नही किया।शहीद होने वाले निरीक्षको या उप निरीक्षको के परिजनो को सिपाही के पद पर नियुकति मिला करती थी।उनके लिये इतना करने वाले रमन सिंह का यदी मुझे ज़िंदाबाद करना पड़े तो भी मुझे शरम नही आयेगी।मुझे वो भी मंज़ूर है।यंहा मै ये साफ़ कर देना चाहूंगा कि मरने वालो मे मेरा कोई सगा तो दूर,दुर-दूर का रिश्तेदार नही है।और तो और मेरा कोई भी रिश्तेदार किसी भी सरकारी नौकरी मे नही है।इसके बावज़ूद रमन सिंह की और उनके मंत्रिमंडल की तारीफ़ करनी होगी जिसने इतना बडा फ़ैसला लिया।इस माम्ले मे मै सालो से लिखता आ रहा हूं और इस पर बहस भी कर रहा हूं और इसे अमलीजामा पहनाने की कोशिश भी।आज अचान्क रमन सिंह के फ़ैस्ले ने मुझे अपनी 29 अप्रेल को लिखी एक पोस्ट की याद दिला दी।इस पोस्ट को आज मै उसी संदर्भ मे रिपोस्ट कर रहा हूं।कृपा कर इसे पढे बिना कोई भी प्रतिक्रिया न दे।


Wednesday, April 29, 2009

मैं उपनिरीक्षक की विधवा!क्या मेरा सुहाग लुटना,क्या मेरी दुनिया उजड़ना,क्या मेरे बच्चों का भविष्य बर्बाद होना महज़ इत्तेफ़ाक़ हैं?

छत्तीसगढ मे अचानक बड़े-बडे लोगो की बढती दिलचस्पी और बडे-बडे नामधारियों के दौरे देखकर मुझे लगा कि मेरे भी दिन फ़िर जायेंगे! मगर ऐसा कुछ नही हुआ! वे लोग आये तो मगर रटे-रटाये तोते की तरह सिर्फ़ और सिर्फ़ पढाई हुई बात कह कर चले गये।मुझे उम्मीद थी कि उनमे से एक तो कम से कम औरत होने के नाते ही मेरा दर्द समझेगी मगर सब सपनो की तरह टूट गया। और मज़बूर होकर मेरे दिल से सिर्फ़ आह ही निकल सकी कि मैं उपनिरीक्षक की विधवा!क्या मेरा सुहाग लुटना,क्या मेरी दुनिया उजड़ना,क्या मेरे बच्चों का भविष्य बर्बाद होना महज़ इत्तेफ़ाक़ हैं?

मेरी भी अपनी खूबसूरत दुनिया थी।मेरे पति को रिश्वत के भूत से ज्यादा देशभक्ती के ज़ूनून ने जकड़ रखा था।नई-नई नौकरी और नई-नई शादी।राजधानी के मलाईदार इलाके की पोस्टिंग के बाद उसी थाने बने रहने के लिये मोटी रकम की फ़रमाईश के बाद बस्तर की पोस्टिंग की धमकी पर हमने मिलकर चर्चा की।सब दोस्तो ने कहा कि सिद्धांत छोडो और कमाओ,कमाने दो का रास्ता पकडो,मगर उन्होने साफ़ मना किया।मैने भी खुशी-खुशी पति का हौसला बढाते हुये हर-हाल मे ईमानदारी की सूखी रोटी खाकर सुखी जीवन जीने का संकल्प दोहरा दिया,और हम राजधानी की चमक-धमक से दूर बस्तर के जंगल मे फ़ेंक दिये गये। ऐसे की चाह कर भी वापस निकल न सके।

शुरू के दिन तो बड़े मज़े से गुज़रे।वंहा जाकर एक बार और हमारी बगिया मे फ़ुल खिलाऽब हम दो और हमारे दो थे।बडी लड़की नर्सरी जाने लायक हो गई थी,और जहां हमारी पोस्टिंग थी वहां नर्सरी एक सपने के समान थी।तब पहली बार लगा था कि देशप्रेम और राष्ट्रभक्ति जैसी बाते किताबों मे ही ठीक लगती है।बच्चो के भविष्य को ध्यान मे रखते हुये मैने इनसे कहा कि वापस किसि अच्छे शहर चल्ते हैं।उन्होने भी बेहद थके हुये स्वर ने कहा था कि ट्राई करते हैं।उस दिन मुझे लगा था कि वे बस्तर के जंगलो मे मौत से रोज़ जंग लड़ते हुये हुये जवानी मे ही बूढे हो चले हैं।वो जोश वो जुनूं सब बस्तर के हने जंगलो मे गुम होता नज़र आया।

मै रोज़ उनसे पूछ्ती कि क्या हुआ?और रोज़ उनका जवाब होता सब ठीक हो जायेगा।फ़िर एक दिन गुज़र जाता,ऐसा करते-करते साल गुज़र गये। हमे ऐसा लगने लगा कि हम बस्तर के लिये ही बने है। छोटू अब चलने लगा था और तुतली भाषा मे बात करने लगा था। अब मैने ज़िद पकड़ ली थी कम से कम बच्चो को पढा लिखा तो लूं।मेरी ज़िद भी उन्हे अंदर से तोड़ रही है ये मुझे पता ही नही चला।रोज़ सुबह बच्चो की पढाई के सवाल के साथ उन्हे घर से ड्यूटी के लिये विदा करती थी और रात को घर मे घुसते समय फ़िर से उन्ही सवालो के साथ स्वागत करती थी।


रोज़-रोज़ के सवालो से लगता है वे भी त्रस्त आ गये थे,एक दिन उन्होने कहा कि मै कुछ न कुछ करता हूं,मुझे तंग मत किया करो,कुछ दिनो की मोहलत दो। और कुछ दिनो बाद उन्होने मुझ्से कहा कि तैयारी करो। हम वापस जा रहे हैम्। मै हैरान थी।मैने पूछा सच और उन्होने कहा हां!कैसे ?इसका जवाब तो जैसे रुला देने वाला था।उन्होने मेरी ज़ीद से परेशान होकर वापस शहर मे पोस्टिंग के लिये अपना पुशतैनी मकान बेच कर एडवांस दे दिया था।मै भी वापसी की तैयारियो मे जुटी हुई थी कि एक रोज़ ये गश्त से लौटे नही।सुबह काफ़ी देर होने के बाद भी जब इनकी कोई खबर नही आई और थाने के अलावा दूसरे लोग घर के आस-पास मंडराने लगे तो माथा ठनका और जो मेरा शक़ था वो सच निकला।

मेरी दुनिया उजड़ चुकी थी।उनका चेहरा होता तो शायद आखिरी बार देख भी लेती।लोथड़ो को बटोर कर लाश का शकल देने की कोशिश की गई थी और पता नही किस हवलदार का हाथ य किस सिपाही का पैर भी शामिल था उनकी लाश में।पता नहि कितनी बार मै बेहोश हुई हूंगी और जब होश मे आई तो मुझे अनुकंपा की भीख मे सिपाही की नौकरी दे दी गई। अब मै उप निरीक्षक की बीबी नही एक सिपाही हूं,जिसका जवान जिस्म साब लोगो की भूखी आंखो की आग मे झुलस कर कब बूढा हो गया पता ही नही चला। अब मुझे ज़रूरत भी नही मह्सूस होती किसी अच्छी प्राइवेट नर्सरी की।मेरे बच्चे सरकारी स्कूल मे पढ रहे हैं।उन्का भविष्य बनने से पहले ही बिगड़ गया है।मेरे सपने सज़ने से पहले ही उजड़ चुके हैं।

कभी-कभी आप लोगो की बड़ी-बड़ी बाते सुनती हूं तो ऐसा लगता है कि कभी कोई हमारे बारे मे भी बोलेगे मगर आप लोगो को तो सिर्फ़ छतीसगढ मे एक आदमी ही नज़र आता है।कभी दिल्ली की महिलाओ को छत्तीसगढ पर रोते देखती हूं तो लगता है कि अब वो हम लोगो के लिये भी बोलेंगी। हमारा क्या दोष हमे सिपाही क्यों बनाया गया?अनुकम्पा देना ही था उसी पद पर देते जिस पद पर हमारा पति था?मगर अफ़्सोस इस मामले कोई नही बोला। हवाई जहाज मे दुनिया घूमने वालि औरते भी नही बोली और ना ही कानून के बड़े-बड़े जानकार बोले और देश-विदेश के महान लोगो को तो इस बारे मे मालूम ही नही,क्योंकी उन्हे बताया गया ही नही।उन्हे तो सिर्फ़ ये मालूम है कि छत्त्तीसग़ढ मे सिर्फ़ एक आदमी के साथ अन्याय हो रहा है और जो हमारे साथ या हम जैसे और लोगो के साथ हुआ वो क्या न्याय है!

29 comments:

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

अनिल पुसदकर में चमचा हो सकने लायक आवश्यक योग्यता नहीं है, और न वे इस जीवन में अर्जित कर सकते हैं।
किसी के किसी काम से सहमति होने या न होने से कोई उस का चमचा नहीं हो जाता। किसी भी व्यक्ति का मूल्यांकन उस के समग्र चरित्र से किया जाना चाहिए, न कि किसी एक कथन या घटना से। बहुत लोग हैं जिन के मत से हम सहमत नहीं होते, वे तब भी मित्र रहते हैं जब तक किसी भी समस्या के लिए सही मार्ग नहीं मिल जाता तब तक किसी राह पर चलना जरूरी है। ऐसे में मतभेदों का होना स्वाभाविक है। असली पहचान तो लक्ष्य के प्रति ईमानदारी है। लेकिन अक्सर यह होता है कि लोग लक्ष्य को विस्मृत कर जाते हैं और रास्ते से मुहब्बत कर बैठते हैं। यहीं लक्ष्य उन से छूट जाता है।

Udan Tashtari said...

यह मर्म स्पर्शी पत्र जब पहली बार पढ़ा था तब भी और आज फिर पढ़ते आँख भर आई.

रमन सिंह का वीरों के परिवार के लिए लिया गया स्वागत योग्य है/प्रशंसनीय है और किसी भी सामाजिक संवेदनशील प्राणी के लिए उन पर गर्व करने का विषय है. आपका साधुवाद इस पूर्ण आलेख के लिए.

Raviratlami said...

इस बात से तो मुख्य मंत्री का मैं भी चमचा बन गया हूं. जीवन का कोई मूल्य नहीं होता, मगर कम से कम अब पुलिस में नौकरी करने वालों को परिवार के भविष्य की चिंता तो नहीं रहेगी.

Raviratlami said...

इस बात से तो मुख्य मंत्री का मैं भी चमचा बन गया हूं. जीवन का कोई मूल्य नहीं होता, मगर कम से कम अब पुलिस में नौकरी करने वालों को परिवार के भविष्य की चिंता तो नहीं रहेगी.

संजय बेंगाणी said...

आप जिसकी प्रसंशा करते है, उसी के गलत काम पर आलोचना करने की हिम्मत रखते हैं तो आप चम्मचे नहीं है.

मुझे कोई शर्म नहीं कि मोदी के कार्यों का प्रसंशक हूँ. क्योंकि मैं उनका आलोचक भी हूँ.

dhiru singh {धीरू सिंह} said...

अगर मुख्यमंत्री इतना साहस भरा कदम उठा सकता है तो ऐसे मुख्यमंत्री का चमचा होने में बुराई नहीं . लेकिन रमन सिंह बी.जे .पी से है ऐसे में कोई मोहल्ला आपको देशद्रोही न ठहरा दे

ताऊ रामपुरिया said...

ऐसी चमचागिरी को सलाम. हम भी आपके साथ ऐसे चमचे बनना चाहेंगे..और रमनसिंह्जी को हार्दिक धन्यवाद.

रामराम.

गौतम राजरिशी said...

मुख्यंमत्री जी के इस कदम पे तो सचमुच में तालियां...काश कि हर राज्य के हुक्मरान ऐसी मति ले आये...
और उस २९ अप्रैल वाले पोस्ट पर पहले ही ह्रदय छलनी हुआ था....

मुनीश ( munish ) said...

Let the dogs bark Anil ji...keep the good work going and why confine urself to one state ? As an Indian im proud of u!

cmpershad said...

सच्चाई को उकेरना चम्चागिरी नहीं कहलाती। और अगर कोई ऐसा समझता है तो उसकी बुद्धि पर तरस करना चाहिए। you must call a spade, a spade:)

हितेन्द्र सिंह said...

अनिल जी,

आपका ब्लॉग मैंने आज पहली बार पढ़ा और बहुत अच्छा लगा। अखबारों में तो पहले आपको पढ़ा ही था। रायपुर के अग्रणी अख़बारों में पत्रकारिता को जैसे पीछे धकेल दिया गया है उसके बाद लगता है कि ब्लॉग एकमात्र जरिया बच गया है जहाँ आप जैसे गंभीर पत्रकारित करने वाले स्वतंत्र रूप से अपनी बात कह सकते हैं।

साधुवाद।

हितेन्द्र सिंह

डॉ .अनुराग said...

साफगोई ओर किस इन्सान के अच्छे कामो से सहमति उनका हौसला बढ़ाने के लिए भी जरूरी है .आपको इस पोस्ट को लिखने की भी जरुरत नहीं थी अनिल जी.....

काजल कुमार Kajal Kumar said...

भाई अगर किसी की अच्छाई को स्वीकार करना चमचागिरी है तब तो आप मुझे भी अपनी भावनाओं में सम्मिलित समझें.

भारतीय नागरिक - Indian Citizen said...

यदि सभी ऐसा करने लगें तो मैं सभी का चमचा बनने को तैयार हूं

भारतीय नागरिक - Indian Citizen said...

यदि सभी नेता ऐसा ही काम पूरे देश के लिये करें तो उनका चमचा बना जा सकता है.

महामंत्री - तस्लीम said...

Waqt Waqt ki baat hai.
-Zakir Ali ‘Rajnish’
{ Secretary-TSALIIM & SBAI }

जितेन्द़ भगत said...

सि‍र्फ यही कहूँगा कि‍ आप अपने वि‍वेक से सही बात रखते हैं तो उसको नकारने के लि‍ए दूसरे के पास भी वि‍वेक होनी चाहि‍ए।

Suresh Chiplunkar said...

भाऊ आपको और रमन सिंह को सलाम, बस इतना ही है कहने को मेरे पास…

Mahesh Sinha said...

बधाई हो सत्य से पीछा तो अनिल भी नहीं छुडा पाते

Anil Pusadkar said...

आभारी हूं आप सभी का।आपका समर्थन मेरा हौसला बढाता रहा है और रहेगा।दरअसल इस मामले मे मै अक्सर बहस किया करता था और सालो से लिख रहा हूं,मैने देखा है एक इंस्पैक्टर की शहादत के बाद उसके परिवार को सिपाही के स्तर का जीवन यापन करने की मज़बूरी मैने देखी है।मै इस बात का क्लेम नही करता कि जो हुआ मेरे समाचार के कारण हुआ या मेरी कलम का ये असर है लेकिन मै ये जानता हूं रमन सिंह का ये कदम पुलिस के चूर-चूर हो रहे मनोबल को बढाने मे सहायक सिद्ध होगा।वैसे ये कदम आज रमन सिंह ने उठायें है मगर मुझे विश्वास है कि एक न एक दिन सारे देश मे इस तरह के नियम बनाये जायेंगे और जिस पद पर कोइ शहीद हो उसके परिजनो को उसी या समान पद पर नियुक्ति दी जानी चाहिये।कल इस बात की मैने तारीफ़ की तो कुछ लोगो को लगा कि मुझे मुख्यमंत्री को गालियां बकनी चाहिये,उनकी तारीफ़ नही करनी चाहिये,बस इसीलिये मुझे लगा कि अगर ये चमचागिरी है तो वही सही।

arun said...

हम तो यही कहेगे
रहिमन चमचा राखिये काम आये वक्त पर
चमचा बिना ना उबरे नेता अभिनेता अफ़सर

Sudhir (सुधीर) said...

सार्थक नेतृत्व की अनुभूति ही सत्य के समर्थन में होती हैं चाहे वो व्यक्तिविशेष के समर्थन हो या विरोध...आपका लेख पढ़कर मन में जो वेदनानुभूति हुई वो शब्दों में क्या कहें...

पको, मुख्यंमत्री जी और शहीदों के परिजनों को बधाई

Sudhir (सुधीर) said...

सार्थक नेतृत्व की अनुभूति ही सत्य के समर्थन में होती हैं चाहे वो व्यक्तिविशेष के समर्थन हो या विरोध...आपका लेख पढ़कर मन में जो वेदनानुभूति हुई वो शब्दों में क्या कहें...

पको, मुख्यंमत्री जी और शहीदों के परिजनों को बधाई

Mahesh Sinha said...

देशभक्तों का अगर उचित सम्मान नहीं होगा तो लोग देश और देशभक्ति भूल जायंगे , वैसे देशभक्त किसी सम्मान का भूखा नहीं होता देश पे ये कर्ज होता है कि वो अपने शहीद का उचित सम्मान करे

‘नज़र’ said...

भई वाह यह भी ख़ूब कही
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पढ़िए: सबसे दूर स्थित सुपरनोवा खोजा गया

Nirmla Kapila said...

दिनेश राय जी की बात बिलकुल सही है और अच्छे काम को सराहना तो अच्छी बात है अगर वि किसी नेता ही हो तो और भी अच्छी क्यों कि हम अक्सर देखते हैं कि नेताओं से लोगों का विश्वास उठ गया हैिस लिये अच्छे नेता की अच्छी बात को लोगों के सामने लाना लोगों का सत्ता मे विश्वास जगाता है आपकी रचना भी बहुत कुछ सोचने पर मबूर करती है बहुत बडिया पोस्ट आभार और बधाई

योगेन्द्र मौदगिल said...

रमन सिंह जी ने वाकई अच्छा निर्णय लिया मगर ये सब आप जैसे निर्भीक पत्रकारों के कारण ही हो पाया है

दिगम्बर नासवा said...

अनिल जी ................आप अगर रमण जी के काम से सहमत हैं तो इसका मतलब यह नहीं की आप उनके चमचे हो गए, रमन सिंह जी ने वाकई अच्छा निर्णय लिया ............ काश सब नेता इस तरह के निर्णय लेने के काबिल होते .......... और अगर इस तारीफ के लिए कोई हमें भी च्म्व्ह कहना चाहे तो खुशी से कहे

Anonymous said...

Well written sir...Fully agree with your points..