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Wednesday, August 19, 2015
अब आये नेता,अफसर सरकारी सिस्टम के नीचे
अदालत ने दूध का दूध और पानी का पानी कर ही दिया.आखिर कब तक़ नेता खैर मनाते.नेताओं के साथ साथ अब सरकारी अफसर भी सरकारी सिस्टम का मज़ा लेंगे.इलाहबाद हाईकोर्ट के एस फैसले का सर्वत्र स्वागत हो रहा है और घुट घुट कर मर रहे सरकरी स्कूलों ने ज़ोरदार स्वागत किया है और सरकारी अस्पतालो की ओर से भी इसी तरह की व्यवस्था की मांग की जा रही है.वैसे सुत्रों से पता चला कि है सरकारी खजाने का माल खाने वाले इस फैसले का विरोध करने जा रहे है.बहरहाल सारे देश में आदेश का जोरदार स्वागत हो रहा है और दुआ की जा रही है कि इस आदेश के क्रियान्वयन में किसी तरह की बाधा न पडे.
Wednesday, February 9, 2011
पुलिस चौकी उड़ाई अच्छा किया,मगर रेल पटरियां,सामूदायिक भवन और फ़िर स्कूल इन्हे उड़ाकर क्या मिला नक्सलियों को?
नक्सलियों ने तीन राज्योम में बंद के दौरान जमकर तोड़-फ़ोड़ की।उन्होनें छत्तीसगढ में एक निर्माणाधीन पुलिस चौकी उड़ाई।झारखण्ड मे रेल पटरियां उड़ा दी और बिहार में एक सामूदायिक भवन और स्कूल को ढहा दिया।अब अगर ये कहा जाये कि उन्हे गिरफ़्तार करने वाली पुलिस की चौकी अगर नक्सलियों ने उड़ा दी तो इसे लड़ाई का एक हिस्सा मान कर कहा जा सकता है कि ठीक किया,मगर रेल पटरियां,सामूदायिक भवन और स्कूल की बिल्डिंग!इन्हे गिराना कौन सा बहादुरी का काम है?और फ़िर बार-बार ये कहना कि शोषण के खिलाफ़ उनका ये संघर्ष है,समझ से परे है?समझ में नही आता कि सामूदायिक भवन और स्कूल बनाना शोषण है या सालों से स्कूल और सामूदायिक भवन को तरसते इलाकों में स्कूल और सामूदायिक भवन को उडाना?
बहरहाल बचपन में गर्मी की छुट्टियों मे नानी के घर जाते समय रेल मे सफ़र के दौरान डिब्बों मे जगह-जगह लिखी चेतावनी आज भी याद आती है।तब भी समझ मे नही आता था कि रेल्वे की सम्पत्ति राष्ट्रीय सम्पत्ति है और उसे नुकसान पहुंचाना अपराध है।तब लोग शायद नल,बल्ब या पंखे ही चुरा पाते रहें होंगे मगर अब तो रेल पटरियां उड़ाई जा रही है,क्या ये राष्ट्रीय सम्पत्ति नही रही?क्या उन्हे नुकसान पहुंचाना राष्ट्रीय सम्पत्ति को नकसान पहुंचाना नही है?क्या उसे नुकसान पहुंचाने वाले उसे अपने राष्ट्र की सम्पत्ति नही मानते?या फ़िर वे इस राष्ट्र को ही अपना राष्ट्र नही मानते?
रेल पटरियों को उड़ाने से आखिर मिलता ही क्या है?खुदा ना खास्ता रेल पटरियों को उड़ाने की खबर ना लगे और धोके से कोई रेल उस मार्ग पर जाये तो?या उस हादसे की कल्पना करते है उन पटरियों को उड़ाने वाले?लगता है उन्हे तो मानव रक्त की गंध से प्यार हो गया है?उन्हे मानव मांस के लोथड़े देखने की आदत हो गई है? अगर ऐसा नही होता तो ये जिस भी अन्याय और शोषण की बात कर रहें है उसे मिटाने के लिये उससे ज्यादा अन्याय,शोषण और रक्तपात नही करते।
बहरहाल बचपन में गर्मी की छुट्टियों मे नानी के घर जाते समय रेल मे सफ़र के दौरान डिब्बों मे जगह-जगह लिखी चेतावनी आज भी याद आती है।तब भी समझ मे नही आता था कि रेल्वे की सम्पत्ति राष्ट्रीय सम्पत्ति है और उसे नुकसान पहुंचाना अपराध है।तब लोग शायद नल,बल्ब या पंखे ही चुरा पाते रहें होंगे मगर अब तो रेल पटरियां उड़ाई जा रही है,क्या ये राष्ट्रीय सम्पत्ति नही रही?क्या उन्हे नुकसान पहुंचाना राष्ट्रीय सम्पत्ति को नकसान पहुंचाना नही है?क्या उसे नुकसान पहुंचाने वाले उसे अपने राष्ट्र की सम्पत्ति नही मानते?या फ़िर वे इस राष्ट्र को ही अपना राष्ट्र नही मानते?
रेल पटरियों को उड़ाने से आखिर मिलता ही क्या है?खुदा ना खास्ता रेल पटरियों को उड़ाने की खबर ना लगे और धोके से कोई रेल उस मार्ग पर जाये तो?या उस हादसे की कल्पना करते है उन पटरियों को उड़ाने वाले?लगता है उन्हे तो मानव रक्त की गंध से प्यार हो गया है?उन्हे मानव मांस के लोथड़े देखने की आदत हो गई है? अगर ऐसा नही होता तो ये जिस भी अन्याय और शोषण की बात कर रहें है उसे मिटाने के लिये उससे ज्यादा अन्याय,शोषण और रक्तपात नही करते।
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Thursday, September 9, 2010
इंश्योरेंस, द कांट्रेक्ट दैट्स कीप यू पुअर आल युअर लाईफ़ सो दैट यू कैन डाई रिच!
एक छोटी सी पोस्ट!कुछ मज़ेदार,रोचक परिभाषा जो कम से मैने तो नही सुनी थी।स्कूल,नर्स,एटम बम्ब,बीमा,और भी कुछ-कुछ।मुझे तो ये नई परिभाषा सुनकर बहुत मज़ा आया आप भी सुन लिजिये और बताइयेगा कैसी लगी ये परिभाषा।
स्कूल: वेयर द पापा पेय्स न सन प्लेय्स्।
नर्स : अ परसन हू वेक यू अप टू गिव यू स्लिपिंग पिल्स।
एटम बम्ब: एन इन्वेन्शन टू एण्ड आल इन्वेन्शन।
काम्प्रोमाइज़: द आर्ट आफ़ डिवाईडिंग अ केक इन सच अ वे दैट एवरीबडी बिलिव्स ही गाट द बिग्गेस्ट पीस।
लाईफ़ इंश्योरेंस:द कांट्रेकट दैट्स कीप यू पुअर आल युअर लाईफ़ सो दैट यू कैन डाई रिच।
क्यों?है ना मज़ेदार!
स्कूल: वेयर द पापा पेय्स न सन प्लेय्स्।
नर्स : अ परसन हू वेक यू अप टू गिव यू स्लिपिंग पिल्स।
एटम बम्ब: एन इन्वेन्शन टू एण्ड आल इन्वेन्शन।
काम्प्रोमाइज़: द आर्ट आफ़ डिवाईडिंग अ केक इन सच अ वे दैट एवरीबडी बिलिव्स ही गाट द बिग्गेस्ट पीस।
लाईफ़ इंश्योरेंस:द कांट्रेकट दैट्स कीप यू पुअर आल युअर लाईफ़ सो दैट यू कैन डाई रिच।
क्यों?है ना मज़ेदार!
Tuesday, November 3, 2009
एक बहुत ही कठीन सवाल पूछ रहा हूं आपसे जो मुझसे पूछा गया था और जिसका जवाब मैं अभी तक़ खोज रहा हूं।
आज सुबह-सुबह मुझसे एक सवाल पूछा गया।सवाल एकदम साधारण सा था लेकिन जब मैने उसका जवाब देना चाहा तो मेरे होश उड़ गये।मुझे तबसे लेकर अबतक़ उसका जवाब सूझा नही है।इसलिये उस सवाल को आप लोगो के लिये ट्रांसफ़र कर रहा हूं ।दो दिनो की छुट्टी के बाद आज सुबह जब स्कूल के लिये हलचल मची तो घर मे रोना-गाना भी शुरू हो गया।क्लास थर्ड़ की स्टूडेंट मेरी भतीजी पारूल जिसे घर मे युती पुकारते हैं स्कूल जाने से साफ़ इंकार कर रही थी और उसकी मां उसे स्कूल भेजने पर तुली हुई थी।रोना गाना सुन कर मैने पूछा क्या हुआ?तो बहु ने कहा देखो भैया ये स्कूल नही जाऊंगी बोल रही है।मैने पूछा क्या हुआ युती?तो उसका जवाब था मुझे उल्टी जैसा लग रहा है।मेरे दिमाग मे तत्काल दो दिनो से चल रही उसकी बातचीत घूम गई।वो दो दिनो से कह रही थी कि मेरा स्कूल जाने का मूड नही होता आजकल्।उसे देख कर छोटे मियां यानी दूसरे भाई के चिरंजीव ओम भी उसी सुर मे गाना गाने की तैयारी मे दिखे।मैने तत्काल कहा गलत बात युती बहाना नही बनाते,स्कूल जाओ।उसने कहा बाबा मै सच कह रही हूं।मैने फ़िर कहा कि बहाना नही।अब उसके तेवर बदल गये और उसने मुझसे पूछा मैं बहाना कर रही हूं?मैने कहा हां।उसने पूछा आपको कैसे पता चला कि मैं बहाना कर रही हूं?मैंने जवाब देने की भरपूस कोशिश की मगर वो यही पूछती रही आप कैसे जानते हैं ये बहाना है?बस फ़िर मेरे पास उसका सपोर्ट करने के अलावा कोई चारा नही रहा और वो फ़िलहाल सो रही है। छोटे मियां को स्कूल जाना ही पडा और मै अब तक़ यही सोच रहा हूं कि मुझे कैसे पता चला कि वो बहाना कर रही है।है ना कठीन सवाल ,आपको जवाब मालूम हो तो बताईगा ज़रूर्।
Thursday, June 18, 2009
प्रभू हिट रहेगा अपना इंटरनेशनल स्कूल आफ़ करप्शन और ओपन यूनिर्वसिटी तो हंगामा मचा देगी
क्यों बे कुछ सुझा या मसाज सेंटर के खयाली आईटमो की मसाज से मस्त हो कर मुस्कुरा रहा हैं। नही प्रभू इस बार बडा ही धांसू आईडिया लाया हूं। आप भी इस बार रिजेक्ट नही कर पाओगे। अपन स्कूल की चेन डाल देते है और एक यूनिर्वसिटी भी खोल देते हैं।प्रभू हिट रहेगा अपना इंटरनेशनल स्कूल आफ़ करप्शन और ओपन यूनिर्वसिटी तो हंगामा मचा देगी।चल बे!साले देखा नही तेरे सड़ेले प्रदेश मे क्या हाल हुआ यूनिर्वसिटियों का।दर्जनो मे से दो की ही दुकान चल पाई है।
येई तो आपका नेगेटिव एप्रोच जमता नही है।सुनते हो नही और फ़ैसला दे देते हो। अपन को कौन सा सड़ेला एकेडेमिक यूनिर्वसिटी खोलना है।अपन का यूनिर्वसिटी तो एकदम प्रोफ़ेशनल होगा।यूनिवर्सिटी आफ़ करप्शन। ऐसा ही स्कूल भी खोलने का, देश के सारे बड़े शहरों मे।बड़े-बड़े होर्डिंग्स लगाने का एड्मिशन ओपन इंटरनैशनल स्कुल आफ़ करप्शन मे पढाईये और बच्चे का भविष्य सेंट-पर्सेंट सुरक्षित किजिये।टूट पड़ेगी पब्लिक,प्रभू टूट पड़ेगी।भीड़ के मामले मे पहले ही दिन शोले फ़िल्म का रिकार्ड तोड़ देंगे प्रभू।उधर से कोई प्रतिक्रिया नही देख मैने पूछा क्या हुआ प्रभू?कोई प्राब्लम?
अबे श्याणे।तू ही है ना वो जिसने सबसे पहले हाय तौबा मचाई थी प्राईवेट यूनिर्वसिटी खुलने पर्।क्या दिखाया था तूने।यदी आपके पास एक मकान है या एक अच्छी सी दुकान है तो चले आईये छत्तीसगढ,खोल लिजिये यूनिर्वसिटी।क्यों याद,आया।दिखाया था ना स्कूटर पर कुलपति की प्लेट लगाये लोगों को।बंद करवा दी थी ना पांच दर्ज़न से ज्यादा दुकान खुलने से पहले ही।वो मामला दूसरों का था न महाराज। अब आप बताईये भला कोई अपने घर के गंदे कपड़े सड़क पर तो धोता नही है ना।मीडिया भी दूसरो के फ़टे मे खुशी-खुशी टांग अड़ाता है मगर अपने मामले मे कभी कुछ बोलता है क्या?कितने अख़बारो मे वेतनमान और पेंशन के लिये लड़ाई चल रही है कंही दिखती है कोई खबर्।मस्टर रोल मे ज्यादा पर अंगूठा लगाकर कम अनपढ मज़दूरों को कम रोजी देने की खबर छापने वाले पढे लिखे मज़दूर/पत्रकारो ने कभी लिखा है कि उन्हे तयशुदा वेतनमान से कम वेतन दिया जा रहा है।
अबे ये सब फ़ाल्तू की बाते हैं।मै किसी कन्ट्रोवर्सी मे फ़ंसना नही चाह्ता।सवाल ही नही उठता महाराज्।सब सेट है आजकल।फ़ुल पेज के दर्जन भर विज्ञापन मुंह बंद अक्र देते है आजकल अच्छे-अच्छे अख़बार का।वो तो ठीक है मगर्।महाराज ये अगर मगर छोड़ो।थिंक पाज़ीटिव महाराज्।सोचो महाराज सोचो! इंटरनेशनल स्कूल आफ़ करप्शन,नाम ही खिंच लायेगा जैसे कभी मल्लिका सड़ी हुई फ़िल्म मे भीड खींच लेती थी।फ़िर वो आईटम वाला आईड़िया यंहा भी चलेगा महाराज्।स्कूल जाओ तो ऐसा लगता ही नही किसी मास्टरनी से मिल रहे हैं।सुर्ख लिपिस्टिक से पूते ओंठो को देखो तो ऐसा लगता है की अभी जूस की बजाय ताज़ा-ताज़ा खून का गिलास एक ही सांस मे मार के आई हो।लो कट ब्लाऊज,स्लीवलैस टाप और नीचे से नीचे खिसक कर कमर की हड्डियो पर अटकी साडी!हय-हय-हय महाराज ऐसा लगता है किसी फ़ैशन परेड मे आ गये हों।
क्यों बे पाखंडी।बड़ा बजरंगबली का भक़्त बना फ़िरता है।साले इतना माईन्यूट आब्ज़र्वेशन। अरे महाराज हूं नही था,था।अब तो आपके पद चिनहो पर चलना चाह्ता हूं।ऊब गया हूं महाराज,यंही छत्तीसगढ मे सडते-सड़ते।मै भी हांग-कांग,बैंकाक और मकाऊ के मसाज सेंटरे और कसिनो देखना चाह्ता हूं।पेरिस मे शाम रंगीन करना चाहता हूं और वेगास मे किस्मत आजमाना चाहता हूं।साले मुझे पहले ही डाऊट था,तू अंदर से कुछ और है और बाहर से कुछ और। वो तो महाराज हर आदमी होता है।कौन चोरी छीपे शाईनी आहूजा की तरह झाड़ू-पोछा लगाती नौकरानी के आसपास नही मंडराता।कौन ट्राई नही करता साथ मे काम करने वाली खूबसूरत जुनियर से मीठा-मीठा बोलकर्।कभी देखा है किसी को खराब गाड़ी धकेलते हुये आदमी से रूक कर प्राब्लम पूछ्ते या लिफ़्ट देने की पेशकश करते हुये।कोई खूबसूरत लड़की खड़ी दिखी नही लाईन लग जाती है।
अबे ये तू मेरे को ही उपदेश देगा क्या?साले ज़रा सा पर्सनल टच क्या दिया जल कर राख हो गई। नही महाराज वैसी कोई बात नही मै तो जनरल टेंडेंसी बता रहा था। अबे तू प्रोजेक्ट पर बात कर समझा। हां तो महाराज अभी एकदम सही सीज़न है एडमिशन का।इस समय खोल लिये तो ठीक नही तो एक साल इंतज़ार करना पड़ेगा।सभी स्कूलों और कालेजो मे भारी भीड़ है।अपन अपनी यूनिर्वसिटी और स्कूल एक साथ लांच कर देते हैं।ये इंटरनेशनल स्कूल क्या बला है बे।खोलेंगे तो अपने देश मे तो फ़िर ये इंटरनेशनल कैसे हो जायेगा?लोग पूछेंगे नही? अरे महाराज आप भी ना।खुद को कहते हो भ्रष्टाचार का देवता और इस बारे मे तो लगता है ए बी सी डी भी नही जानते। अबे चुप। अपनी बात कर्।वही तो कह रहा हूं महाराज। अब देखिये ये पब्लिक स्कूल सुना है ना।हां,सुना है।तो बताईये भला इसमे पब्लिक के बच्चे पढ सकते है क्या?इनकी मोटी फ़ीस तो सिर्फ़ बड़े-बड़े खास लोग ही दे सकते है आम लोग तो सपने भी नही देखते उन स्कूलो के।
बात तो सही कर रहा है बे।मगर देशी स्कूल का इंटरनेशनल नाम समझ मे नही आया। अरे महाराज अपना स्कूल और यूनिर्वसिटी जब खुलेगी तो सारे देश के अलावा दूसरे देश के बच्चे भी तो यंहा आकर पढेंगे।फ़िर आस्ट्रेलिया के लफ़ड़े से परेशान होकर लौट रहे बच्चो को अगर अपन ने इम्प्रेस कर लिया तो प्रभू आप अपने आप इंटरनेशनल फ़िगर हो जायेंगे।चल बे,वो तो हम पहले से हैं।साले मुझे बता रहा है इंटरनेशनल और नेशनल का फ़र्क़्।चल बता तो किस देश मे मेरे फ़ालोअर नही है।किस देश मे मेरा डंका नही बचता।मै समझ रहा हूं साले मेरी आड़ मे तो टीचर लोगों को भांपेगा। है ना।राम-राम,अरे नही महाराज।मै सब समझ रहा हूं बे।स्कूल खोलने मे लफ़ड़े ही लफ़ड़े हैं।घर से खुन्नस खाकर आई कोई टीचर किसी बच्चे को पीटेगी और फ़ोटो छपेगा मेरा।वो तेरी जात वाले माईक मेरे मूंह मे ठूंस कर अंट-शंट सवाल पूछेंगे और बतायेंगे मिलिये एक कसाई से।मुझे नही करवानी अपनी ऐसी की तैसी।तेरे पास कोई ठीक-ठाक आईडिया है तो बता वर्ना तेरे बारे मे भी सोचना पड़ेगा।
येई तो आपका नेगेटिव एप्रोच जमता नही है।सुनते हो नही और फ़ैसला दे देते हो। अपन को कौन सा सड़ेला एकेडेमिक यूनिर्वसिटी खोलना है।अपन का यूनिर्वसिटी तो एकदम प्रोफ़ेशनल होगा।यूनिवर्सिटी आफ़ करप्शन। ऐसा ही स्कूल भी खोलने का, देश के सारे बड़े शहरों मे।बड़े-बड़े होर्डिंग्स लगाने का एड्मिशन ओपन इंटरनैशनल स्कुल आफ़ करप्शन मे पढाईये और बच्चे का भविष्य सेंट-पर्सेंट सुरक्षित किजिये।टूट पड़ेगी पब्लिक,प्रभू टूट पड़ेगी।भीड़ के मामले मे पहले ही दिन शोले फ़िल्म का रिकार्ड तोड़ देंगे प्रभू।उधर से कोई प्रतिक्रिया नही देख मैने पूछा क्या हुआ प्रभू?कोई प्राब्लम?
अबे श्याणे।तू ही है ना वो जिसने सबसे पहले हाय तौबा मचाई थी प्राईवेट यूनिर्वसिटी खुलने पर्।क्या दिखाया था तूने।यदी आपके पास एक मकान है या एक अच्छी सी दुकान है तो चले आईये छत्तीसगढ,खोल लिजिये यूनिर्वसिटी।क्यों याद,आया।दिखाया था ना स्कूटर पर कुलपति की प्लेट लगाये लोगों को।बंद करवा दी थी ना पांच दर्ज़न से ज्यादा दुकान खुलने से पहले ही।वो मामला दूसरों का था न महाराज। अब आप बताईये भला कोई अपने घर के गंदे कपड़े सड़क पर तो धोता नही है ना।मीडिया भी दूसरो के फ़टे मे खुशी-खुशी टांग अड़ाता है मगर अपने मामले मे कभी कुछ बोलता है क्या?कितने अख़बारो मे वेतनमान और पेंशन के लिये लड़ाई चल रही है कंही दिखती है कोई खबर्।मस्टर रोल मे ज्यादा पर अंगूठा लगाकर कम अनपढ मज़दूरों को कम रोजी देने की खबर छापने वाले पढे लिखे मज़दूर/पत्रकारो ने कभी लिखा है कि उन्हे तयशुदा वेतनमान से कम वेतन दिया जा रहा है।
अबे ये सब फ़ाल्तू की बाते हैं।मै किसी कन्ट्रोवर्सी मे फ़ंसना नही चाह्ता।सवाल ही नही उठता महाराज्।सब सेट है आजकल।फ़ुल पेज के दर्जन भर विज्ञापन मुंह बंद अक्र देते है आजकल अच्छे-अच्छे अख़बार का।वो तो ठीक है मगर्।महाराज ये अगर मगर छोड़ो।थिंक पाज़ीटिव महाराज्।सोचो महाराज सोचो! इंटरनेशनल स्कूल आफ़ करप्शन,नाम ही खिंच लायेगा जैसे कभी मल्लिका सड़ी हुई फ़िल्म मे भीड खींच लेती थी।फ़िर वो आईटम वाला आईड़िया यंहा भी चलेगा महाराज्।स्कूल जाओ तो ऐसा लगता ही नही किसी मास्टरनी से मिल रहे हैं।सुर्ख लिपिस्टिक से पूते ओंठो को देखो तो ऐसा लगता है की अभी जूस की बजाय ताज़ा-ताज़ा खून का गिलास एक ही सांस मे मार के आई हो।लो कट ब्लाऊज,स्लीवलैस टाप और नीचे से नीचे खिसक कर कमर की हड्डियो पर अटकी साडी!हय-हय-हय महाराज ऐसा लगता है किसी फ़ैशन परेड मे आ गये हों।
क्यों बे पाखंडी।बड़ा बजरंगबली का भक़्त बना फ़िरता है।साले इतना माईन्यूट आब्ज़र्वेशन। अरे महाराज हूं नही था,था।अब तो आपके पद चिनहो पर चलना चाह्ता हूं।ऊब गया हूं महाराज,यंही छत्तीसगढ मे सडते-सड़ते।मै भी हांग-कांग,बैंकाक और मकाऊ के मसाज सेंटरे और कसिनो देखना चाह्ता हूं।पेरिस मे शाम रंगीन करना चाहता हूं और वेगास मे किस्मत आजमाना चाहता हूं।साले मुझे पहले ही डाऊट था,तू अंदर से कुछ और है और बाहर से कुछ और। वो तो महाराज हर आदमी होता है।कौन चोरी छीपे शाईनी आहूजा की तरह झाड़ू-पोछा लगाती नौकरानी के आसपास नही मंडराता।कौन ट्राई नही करता साथ मे काम करने वाली खूबसूरत जुनियर से मीठा-मीठा बोलकर्।कभी देखा है किसी को खराब गाड़ी धकेलते हुये आदमी से रूक कर प्राब्लम पूछ्ते या लिफ़्ट देने की पेशकश करते हुये।कोई खूबसूरत लड़की खड़ी दिखी नही लाईन लग जाती है।
अबे ये तू मेरे को ही उपदेश देगा क्या?साले ज़रा सा पर्सनल टच क्या दिया जल कर राख हो गई। नही महाराज वैसी कोई बात नही मै तो जनरल टेंडेंसी बता रहा था। अबे तू प्रोजेक्ट पर बात कर समझा। हां तो महाराज अभी एकदम सही सीज़न है एडमिशन का।इस समय खोल लिये तो ठीक नही तो एक साल इंतज़ार करना पड़ेगा।सभी स्कूलों और कालेजो मे भारी भीड़ है।अपन अपनी यूनिर्वसिटी और स्कूल एक साथ लांच कर देते हैं।ये इंटरनेशनल स्कूल क्या बला है बे।खोलेंगे तो अपने देश मे तो फ़िर ये इंटरनेशनल कैसे हो जायेगा?लोग पूछेंगे नही? अरे महाराज आप भी ना।खुद को कहते हो भ्रष्टाचार का देवता और इस बारे मे तो लगता है ए बी सी डी भी नही जानते। अबे चुप। अपनी बात कर्।वही तो कह रहा हूं महाराज। अब देखिये ये पब्लिक स्कूल सुना है ना।हां,सुना है।तो बताईये भला इसमे पब्लिक के बच्चे पढ सकते है क्या?इनकी मोटी फ़ीस तो सिर्फ़ बड़े-बड़े खास लोग ही दे सकते है आम लोग तो सपने भी नही देखते उन स्कूलो के।
बात तो सही कर रहा है बे।मगर देशी स्कूल का इंटरनेशनल नाम समझ मे नही आया। अरे महाराज अपना स्कूल और यूनिर्वसिटी जब खुलेगी तो सारे देश के अलावा दूसरे देश के बच्चे भी तो यंहा आकर पढेंगे।फ़िर आस्ट्रेलिया के लफ़ड़े से परेशान होकर लौट रहे बच्चो को अगर अपन ने इम्प्रेस कर लिया तो प्रभू आप अपने आप इंटरनेशनल फ़िगर हो जायेंगे।चल बे,वो तो हम पहले से हैं।साले मुझे बता रहा है इंटरनेशनल और नेशनल का फ़र्क़्।चल बता तो किस देश मे मेरे फ़ालोअर नही है।किस देश मे मेरा डंका नही बचता।मै समझ रहा हूं साले मेरी आड़ मे तो टीचर लोगों को भांपेगा। है ना।राम-राम,अरे नही महाराज।मै सब समझ रहा हूं बे।स्कूल खोलने मे लफ़ड़े ही लफ़ड़े हैं।घर से खुन्नस खाकर आई कोई टीचर किसी बच्चे को पीटेगी और फ़ोटो छपेगा मेरा।वो तेरी जात वाले माईक मेरे मूंह मे ठूंस कर अंट-शंट सवाल पूछेंगे और बतायेंगे मिलिये एक कसाई से।मुझे नही करवानी अपनी ऐसी की तैसी।तेरे पास कोई ठीक-ठाक आईडिया है तो बता वर्ना तेरे बारे मे भी सोचना पड़ेगा।
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