Showing posts with label naxal chhattisgarh. Show all posts
Showing posts with label naxal chhattisgarh. Show all posts

Tuesday, November 1, 2011

हीरो व ऎलेक्ज़ेंड्राईट की खदानो पर अब नक्सलियों का कब्ज़ा है जिसके भरोसे राज्य को टैक्स फ्री ज़ोन बनाने का सपना देखा गया था.

छत्तीसगढ पर खनिजों  के मामले में ईश्वर की विशेष कृपा है.यंहा लोहे की खदानो के अलावा पहाड भी है.चूना पत्थर भी भरपुर है और शायद ही कोई बडा सिमेंट निर्माता हो जिसका यंहा कारखाना न हो.सामरिक महत्व का खनिज टीन तो सिर्फ यंही मिलता है.आण्विक खनिज भी मिलते है और वाणिज्यिक खनिज का भी यंहा प्रचुर भंडार है.सच कहा जाये तो गरीबों की ये धरती बहुत अमीर है.रत्नगर्भा वसुन्धरा.हीरे की खदानो और उसका एक विशिष्ट प्रकार ऎलेक्ज़ेंड्राईट सिर्फ यंही रिपोर्ट हुआ है.किम्बरलाईट पाईप यंहा एक नही कई है.इन्ही हीरों की खदानों के भरोसे छत्तीसगढ के राज्य बनते ही यंहा की सरकार ने इस राज्य को टैक्स फ्री ज़ोन बनाने की बात की थी.सरकारी बात तो खैर बात ही होती है.उस पर भले ही दुनिया भर की बात होती रही.हीरो से मिलने वाली रायल्टी का अनुमान भी लगा लिया गया.उसके भरोसे दुनिया मे अपनी अलग पहचान बनाने के दावे भी हुये.खैर दावे तो होते रहते है,मगर गरीबों की इस अमीर धरती पर दबे खज़ाने से सरकार इन ग्यारह सालों में एक हीरा भी नही निकाल पाई है.और अब निकाल भी नही पायेगी क्योंकी उस इलाके में नक्सलियों ने दस्तक दे दी है.दस्तक क्या दी है अब उस इलाके में उनका राज है कहा जा सकता है.राजधानी से महज़ 100 किमी दुर कांग्रेस अध्यक्ष के काफिले को भी नक्सली निशाना बनाचुके हैं और पुलिस पार्टियों को तो आये दिन निशाना बना रहे हैं.यानी खज़ाना जिसके भरोसे राज्य को टैक्स फ्री ज़ोन बनाना था गया हाथ से.सिर्फ राजनैतिक दांवपेंच ही दिखाये है अब तक़ यंहा की कांग्रेस और भाजपा की सरकारों ने.यही हाल बस्तर के लोहे की खदानो का है.यंहा एस्सार जैसे बडे समूह को काम करने के लिये नक्सलियों को टैक्स देना पड रहा है.इस बात का सबूत मिला उस कंपनी के अफसरों द्वारा नक्सलियों को रकम देने के मामले के खुलासे ने.खैर बहुत कुछ हो रहा है इस  प्रदेश में.आज इस प्रदेश का जन्म दिन मनाया जा रहा है.आधे से ज्यादा इलाका नक्सलियों की गिरफ्त में आ चुका है और हमारा हौसला देखिये कि हम उत्सव मना रहे हैं.जय हो,जय छत्तीसगढ.

Friday, March 18, 2011

राष्ट्रभाषा हिंदी का विरोध करना क्या राज्द्रोह नही है?

राष्ट्रभाषा हिंदी का नक्सली विरोध करने लगे हैं!उनका कहना है कि बस्तर के वनांचलों मे गोंडी बोली का ही इस्तेमाल किया जाना चाहिये।ऐसा करके पता नही वे क्या साबित करना चाह रहे हैं?ठीक है गोंडी बोली के प्रचार-प्रसार पर दिया जाता है तो समझ में आता है मगर उसके साथ-साथ हिंदी का विरोध?ये समझ से परे है।मेरा सवाल ये है कि क्या राष्ट्रभाषा हिंदी का विरोध राष्ट्रद्रोह की श्रेंणी में नही आता?                                                      नक्सलियों ने बाकायदा पोस्टर और बैनर लगा कर हिंदी के विरोध में मोर्चा खोल दिया है।उनका गोंडी से कथित मोह का दिखावा तो समझ में आता है।ऐसा करके वे स्थानीय लोगों को अपने से जोड़े रखने की कोशिश तेज़ कर रहे हैं,जो धीरे-धीरे उनसे दूर खिसक रहे हैं।मगर हिंदी का विरोध,उसके खिलाफ़ वातावरण बना कर क्या करेंगे?क्या ये कोई नये अलगाववादी अभियान की साजिश है?                                                                                       सड़क का विरोध करना,स्कूलों और अस्पताल भवनों को उड़ाना,विकास नही होने के नाम पर विकास के रास्ते पर रोड़े खड़े करना,ये उनकी अब तक़ की रणनीति रही है।वे इस तरीके से उन्हे अलग-थलग रखने की कोशिश कर रहे थे और अब हिंदी का विरोध?ये तो एक खतरनाक साजिश का हिस्सा नज़र आता है।इस बारे में उन लोगों को भी सोचना चाहिये जो नक्सलियों के समर्थकों को जेल से छुड़ाने में लगे रहते हैं।ज़रा-ज़रा सी बात पर उन्हे कानून और मानवाधिकारों का हनन नज़र आता है।क्या उन्हे अब राष्ट्रभाषा हिंदी के विरोध में कोई बुराई नज़र आयेगी या भी उन्हे सही ही नज़र आयेगा?मुझे लगता है कि समय आ गया कि उन्हे अब अपनी आंखों पर से विदेशी धन से चल रहे एनजीओ के चढाये गये चश्मे उतार फ़ेंकना चाहिये।

Wednesday, March 16, 2011

आखिर विकास की परिभाषा क्या है?गाड़ियां जलाना,सड़के खोदना,रेल लाईने उड़ाना?स्कूल,अस्पताल उड़ाना?चाहते क्या हैं,नक्सली?

बस्तर में नक्सलियों का उत्पात जारी है।उन्होने रावघाट-दल्ली राजहरा रेल लाईन के निर्माण के लिये समतलीकरण के काम में लगी 17 मशीनों को जला कर खाक कर दिया।करोड़ो रूपये का नुकसान करके नक्सलियों ने उस रेल लाईन के निर्माण कार्य मे बाधा डाल दी है।ये वही नक्सली है जो कहते हैं कि वे अन्याय और शोषण के खिलाफ़ लड़ रहे हैं!उनका दावा है कि बस्तर में विकास नही हुआ है।अब अगर वंहा विकास नही हुआ था तो उसकी ज़िम्मेदार उस समय की सरकारें हो सकती है,लेकिन अभी जो विकास हो रहा है उसे रोकने वालों को क्या कहा जाये,ये भी उन नक्सलियों को बताना चाहिये!                                                                                         बस्तर पर सालों-साल इस बहस के बाद कि उनके मूल स्वरूप को बनाये रखना चाहिये या नही?विकास से उसके मूल स्वरूप  पर विपरित प्रभाव पड़ेगा या नही?या उनकी परंपराओं को बनाये रखने का उन्हे अधिकार है?तमाम तरह की बहस (जिसमे शायद आदिवासी को छोड़ सभी शामिल थे),के बाद जब उन्हे समाज की मुख्य धारा से धारा से जोड़ने और विकास की रफ़्तार तेज हुई तो अब नक्सलियों को वंहा विकास पसंद नही आ रहा है।पहले समाज शास्त्री,मानव विज्ञानी और दुसरे ठेकेदारों के कारण वंहा विकास नही हो पाया अब नक्सली रोड़े अटका रहे हैं।                                                                                                                                          दोनो ही स्थिती में नुकसान आदिवासी का हो रहा है और इस नुकसान पर पहले कोई और चिल्ला रहा था और अब कोई और्।जो पहले चिल्ला रहा था,वो अब खुद नुकसान पहुंचा रहा है,और जो अब चिल्ला रहे हैं,उन्होने पहले कभी इस ओर ध्यान ही नही दिया था।कुल मिलाकर देखा जाये तो वंहा बस्तर का  आदिवासी ही पिस रहा है,मर रहा है!                                                                                                                                            चलो इस बात को मान लिया जाये कि वंहा विकास नही हुआ,या बहुत धीमी गति से हुआ?ये उनके साथ अन्याय है और ये उनके मौलिक अधिकारों का हनन और उनका शोषण भी है।मगर अब आज़ादी के बाद जब उन्हे स्कूल,अस्पताल और सामूदायिक भवन जैसी सुविधायें मिलना शुरू हुई है तो उसे तोड़ कर क्या साबित किया जा रहा है? सड़के बनती है  नही तो खोद देते हैं? बीआरओ जैसी संस्था को वंहा सड़क बनाने मे सालों लग गये।     सड़क से ,स्कूल से,अस्पताल से,रेल लाईन से आखिर नक्सलियों को परहेज़ क्यों है?चाहे राज्य सरकार बनाये या केन्द्र सरकार बनाये,विकास तो बस्तर का हो ही रहा है ना?और फ़िर नक्सलियों की लड़ाई भी तो इसी बात की है कि वंहा विकास नही हुआ है।एक और कहते हैं विकास नही हुआ और दूसरी ओर विकास के तमाम रास्तों पर बारूदी सुरंग बिछा रहे हैं,आखिर उनके विकास की परिभाषा है क्या?ये तो समझ में आये,मुझे तो समझ में नही आया इस तरह मशीनों को जलाना और स्कूल,अस्पतालों को उड़ाना?आपको क्या लगता है?बताईयेगा ज़रूर्।

Wednesday, February 9, 2011

पुलिस चौकी उड़ाई अच्छा किया,मगर रेल पटरियां,सामूदायिक भवन और फ़िर स्कूल इन्हे उड़ाकर क्या मिला नक्सलियों को?

नक्सलियों ने तीन राज्योम में बंद के दौरान जमकर तोड़-फ़ोड़ की।उन्होनें छत्तीसगढ में एक निर्माणाधीन पुलिस चौकी उड़ाई।झारखण्ड मे रेल पटरियां उड़ा दी और बिहार में एक सामूदायिक भवन और स्कूल को ढहा दिया।अब अगर ये कहा जाये कि उन्हे गिरफ़्तार करने वाली पुलिस की चौकी अगर नक्सलियों ने उड़ा दी तो इसे लड़ाई का एक हिस्सा मान कर कहा जा सकता है कि ठीक किया,मगर रेल पटरियां,सामूदायिक भवन और स्कूल की बिल्डिंग!इन्हे गिराना कौन सा बहादुरी का काम है?और फ़िर बार-बार ये कहना कि शोषण के खिलाफ़ उनका ये संघर्ष है,समझ से परे है?समझ में नही आता कि सामूदायिक भवन और स्कूल बनाना शोषण है या सालों से स्कूल और सामूदायिक भवन को तरसते इलाकों में स्कूल और सामूदायिक भवन को उडाना?
बहरहाल बचपन में गर्मी की छुट्टियों मे नानी के घर जाते समय रेल मे सफ़र के दौरान डिब्बों मे जगह-जगह लिखी चेतावनी आज भी याद आती है।तब भी समझ मे नही आता था कि रेल्वे की सम्पत्ति राष्ट्रीय सम्पत्ति है और उसे नुकसान पहुंचाना अपराध है।तब लोग शायद नल,बल्ब या पंखे ही चुरा पाते रहें होंगे मगर अब तो रेल पटरियां उड़ाई जा रही है,क्या ये राष्ट्रीय सम्पत्ति नही रही?क्या उन्हे नुकसान पहुंचाना राष्ट्रीय सम्पत्ति को नकसान पहुंचाना नही है?क्या उसे नुकसान पहुंचाने वाले उसे अपने राष्ट्र की सम्पत्ति नही मानते?या फ़िर वे इस राष्ट्र को ही अपना राष्ट्र नही मानते?
रेल पटरियों को उड़ाने से आखिर मिलता ही क्या है?खुदा ना खास्ता रेल पटरियों को उड़ाने की खबर ना लगे और धोके से कोई रेल उस मार्ग पर जाये तो?या उस हादसे की कल्पना करते है उन पटरियों को उड़ाने वाले?लगता है उन्हे तो मानव रक्त की गंध से प्यार हो गया है?उन्हे मानव मांस के लोथड़े देखने की आदत हो गई है? अगर ऐसा नही होता तो ये जिस भी अन्याय और शोषण की बात कर रहें है उसे मिटाने के लिये उससे ज्यादा अन्याय,शोषण और रक्तपात नही करते।

Monday, February 7, 2011

क्या नक्सलियों द्वारा पांच पुलिस वालों को अगवा कर लेना मानवाधिकारों का हनन नही है?

कहने को बहुत कुछ है मगर एक छोटा सा सवाल जो छ्त्तीसगढ के कथित क्रांतिकारियों और उनकी पैरवी करने वाले कथित मानवाधिकारवादियों की पोल खोलने के लिये काफ़ी है।पिछले 25 जनवरी से यंहा के नक्सलियों द्वारा पांच जवानो को अगवा कर लेने की खबर है।आज तक उनकी कोई खोज-खबर नही मिल पाई है।क्या पांच-पांच जवानो का लापता हो जाना या उन्हे अगवा कर लेना नेशनल न्यूज़ नही है?पता नही क्यों इस प्रदेश को और यंहा हो रहे नक्सलियों के अपराध पर राष्ट्रीय मीडिया खामोश बना रहता है?उसकी खामोशी टूटती है जब किसी फ़र्ज़ी मानवाधिकारवादी को पुलिस गिरफ़्तार कर लेती है?या किसी मुठभेड़ मे जब कोई दुर्दान्त नक्सली मारा जाता है तब?तब वे उसे पत्रकार या समाजसेवी या मानवाधिकार वादी बताने मे कोई कसर नही छोड़ते और उनके सुर मे सुर मे मिला कर रोते हैं विदेशी सहायता से चलने वाले पांच सितारा एनजीओ।
पुलिस को हाल ही यंहा नक्सलियों से मुठभेड़ के दौरान विदेशी सहायता से चलने वाले एनजीओ के डाक्टरों की पर्चियां विदेशी दवाये और सामान बरामद हुआ है।ये सबूत है उन रूदालियों का इस खूनी संघर्ष में नक्स्लियों को भरपूर समर्थन देने का।ज़रा सी बात में हाय-तौबा मचा देने वाली संस्थायें पांच-पांच जवानों के अपहरण पर खामोश हैं।अब उन्हे उन अगवा जवानो को छोड़ने की अपील करने की फ़ुरसत तक़ नही मिल रही है।ये वही संगठन है जो अदालत द्वारा सज़ा सुनाये जाने के बाद एक सजा-याफ़्ता को छुड़ाने के लिये देश भर में प्रदर्शन करने से नही चूके।ऐसा करके उन्होनें अदालत या न्याय प्रणाली का जाने-अन्जाने अपमान भी किया मगर उन्हे शायद इस बात की परवाह भी नही थी क्योंकि वे तो उस शख्स के समर्थन मे आगे आये थे जिसकी अदालत में चल रही कार्रवाई देखने उनके विदेशी आका यंहा आये थे।
बताईये 13 दिनो से पांच जवानों की कोई खबर नही मिल पा रही है।क्या गुज़र रही होगी उन अगवा पांच जवानों के परिवार वालों पर।आखिर वे भी हाड़-मांस के इंसान है और उनकी भी सामाजिक ज़िम्मेदारियां और रिश्तेदारी है?क्या ये मानवाधिकार वादियों को नही लगता कि गलत है?क्या गुज़र रही होगी एक बीबी पर,एक मां पर एक बहन पर,एक भाई पर एक बाप पर एक बेटे या बेटी पर?क्या मानवाधिकार वादियों को ये नही पता कि पुलिस वालों के भी बेटे-बेटियां होती है?उनकी भी बीबी-मां और बहन होती है?उनके घर में भी उतना ही दुःख का सन्नाटा पसरा रहता है जितना उनके हिसाब से किसी नक्सली के मारे जाने पर फ़ैलता है?
पता नही इस देश मे मानवाधिकार के दोगली परिभाषा कब बदलेगी?कब एक नक्सली और एक पुलिस वाले के मानवाधिकार बराबर नज़र से देखें जायेंगे?पता नही कब उन पांच अगवा जवानों का पता चलेगा?पता नही कब मामूली सी रकम पर होने वाले अपहरण पर दिन भर सनसनीखेज़ ड्रामा दिखा कर टीआरपी बटोरने की होड़ मे लगे नेशनल न्यूज़ चैनलों की नज़र इस खबर पर भी पड़ेगी और इसे लगातार दिखा कर वे दबाव बना कर उन जवानो की रिहाई में अपना सक्रिय योगदान देंगे?पता नही कब? पता नही कब?पता नही कब?