ज़िंदा रहने के लिये नौकरी छोड़ना ज़रूरी है?ज़िंदा रहने के लिये नौकरी करना?ये सवाल सामने खड़ा है उन पांच जवानो के जिन्हे कल नक्सलियों नें नौकरी छोड़ने की शर्त पर रिहा किया। नकस्ल प्रभावित छत्तीसगढ के बस्तर ज़िलें में नक्सलियों ने अपनी अदालत,जनसुनवाई में अगवा किये गये पांच जवानों को नौकरी छोड़ने की शर्त पर रिहा करने का फ़ैसला सुनाया।वंहा हज़ारों की संख्या मे ग्रामीणों के साथ-साथ जवानों की रिहाई के लिये मध्यसतता करने वाले अग्निवेश के अलावा मानवाधिकार के जाने-माने राष्ट्रीय स्तर के कई पैरोकार-ठेकेदार मौज़ूद थे।उनके सामने नक्सलियों ने जवानों को नौकरी छोड़ने की शर्त पर ज़िंदा छोड़ा।अब सवाल ये उठता है कि ज़िंदा रहने के लिये नौकरी छोड़ना ज़रूरी है?ज़िंदा रहने के लिये नौकरी करना?
क्या कोई नौकरीपेशा इंसान इस ज़माने में बिना कोई काम किया जीवनयापन कर सकता है?क्या कोई नौकरीपेशा बिना नौकरी किये अपना परिवार पाल सकता है?क्या वो बिना नौकरी किये ज़िंदगी की गाड़ी खींच सकता है?अगर उसे ज़िंदा रहने के लिये नौकरी की ज़रूरत नही होती तो क्यों जाता वो जान हथेली पर लेकर बस्तर मरने के लिये?आखिर वो नौकरी करता ही क्यों,अगर उसका गुज़ारा नौकरी के बिना हो सकता था,तो?
समझ में नही आता इतने बड़े खुद को स्वामी कहने वाले विद्वान,अग्निवेश के मन मे ये सवाल क्यों नही उठा?मानवाधिकार वादियों की नेता कविता श्रीवास्तव,गौतम नौलखा,वी सुरेश,हरीश दीवान आदि-आदि के मन में क्यों नही उठा?उनके मन में तो ये सवाल भी आना चाहिये था कि बंदूक की नोक पर किसी की नौकरी छीनना मानवाधिकार का हनन है?शायद उन्हे ये पता ही नही होगा कि नौकरी छोड़कर कोई भी इंसान अपना परिवार नही पाल सकता है,ज़िंदा नही रह सकता है?खैर ये तो वही जान सकता है जो छोटी-मोटी नौकरी करता हो उन पुलिस जवानों जैसी।जिसे महिने में एक बार मुट्ठी भर रूपये मिलते हों महीने भर ज़िंदगी दांव पर लगाकर बारूदी सुरंगों से अटे पड़े बस्तर के जंगलों में।
उन लोगों को क्या मालूम होगा ज़िंदा रहने के लिये नौकरी कितनी ज़रूरी है,जिन्होने कभी नौकरी की ही ना हो?जिन्हे नेतागिरी के लिये हर महीने मोटी रकम मिल जाती हो?जिन्हे बेवज़ह बकवास करने और सरकारों(खासकर भाजपा)के खिलाफ़ जातिवाद से लेकर अनाप-शनाप आरोप लगाने पर विदेशी धनराशियों पर फ़ल-फ़ूल रहे एनजीओ से चंदा मिलता हो?उन लोगो को कैसे पता हो सकता है नौकरी के बिना ज़िंदा रहना,और नक्सलियों की कैद में रहना एक समान ही है?
चलिये जाने दिजीये ये नौकरी-फ़ौकरी की मीडिल और लोअर मीडिल क्लास बातें।एसी कमरों मे बैठ कर गरीबी और आम आदमी की हालत पर टेसूये बहाने वाले उन एलिट लोगों को ये तो बताना चहिये कि नक्सलियों की कैद से रिहा होने के लिये अब उन जवानों को करना क्या चाहिये?क्या उन्हे भी बंदूक उठाकर जीवनदान देने वालों के साथ हो जाना चाहिये?क्या उन्हे रिहाई के लिये दलाली करने वालों का झण्डा थाम लेना चाहिये?ऐसा क्या करना चाहिये कि उनके बच्चों की स्कूल समय पर पट सके?बूढे मां-बाप के मेड़िकल से दवा खरीद सके?बहन-भाई की शादी के लिये बारात का इंतजाम कर सके?उसकी रिहाई के लिये दिन-रात आंसू बहाते और हर किसी से उसकी रिहाई की गुहार लगाते-लगाते सूख चुके सकी पत्नी के ओंठो पर छोटी सी मुस्कान लाने के लिये वो साड़ी खरीद सके?
इन सब के लिये लगता है रूपया,जो उन्हे मिलता था नौकरी से,और आप उन्से कह रह नौकरी छोड़ कर ज़िंदा रहो?ये कैसे संभव हो सकता है?बिना सांस लिये ज़िंदा रहने की शर्त के समान है और अफ़सोस की बात तो ये है कि पांच पुलिस वाले के मानवाधिकार का हनन हुआ भी तो मानवाधिकार वादियों के ठेकेदारों के सामने।पता कभी आईना देखते समय ये खुद से बात करते भी हैं या नही?कभी आईना उन्हे चिढाता भी या नही?कभी खुद की आंखों में आंखे डालते समय नज़रे झुक जाती है या नही?
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Saturday, February 12, 2011
Monday, February 7, 2011
क्या नक्सलियों द्वारा पांच पुलिस वालों को अगवा कर लेना मानवाधिकारों का हनन नही है?
कहने को बहुत कुछ है मगर एक छोटा सा सवाल जो छ्त्तीसगढ के कथित क्रांतिकारियों और उनकी पैरवी करने वाले कथित मानवाधिकारवादियों की पोल खोलने के लिये काफ़ी है।पिछले 25 जनवरी से यंहा के नक्सलियों द्वारा पांच जवानो को अगवा कर लेने की खबर है।आज तक उनकी कोई खोज-खबर नही मिल पाई है।क्या पांच-पांच जवानो का लापता हो जाना या उन्हे अगवा कर लेना नेशनल न्यूज़ नही है?पता नही क्यों इस प्रदेश को और यंहा हो रहे नक्सलियों के अपराध पर राष्ट्रीय मीडिया खामोश बना रहता है?उसकी खामोशी टूटती है जब किसी फ़र्ज़ी मानवाधिकारवादी को पुलिस गिरफ़्तार कर लेती है?या किसी मुठभेड़ मे जब कोई दुर्दान्त नक्सली मारा जाता है तब?तब वे उसे पत्रकार या समाजसेवी या मानवाधिकार वादी बताने मे कोई कसर नही छोड़ते और उनके सुर मे सुर मे मिला कर रोते हैं विदेशी सहायता से चलने वाले पांच सितारा एनजीओ।
पुलिस को हाल ही यंहा नक्सलियों से मुठभेड़ के दौरान विदेशी सहायता से चलने वाले एनजीओ के डाक्टरों की पर्चियां विदेशी दवाये और सामान बरामद हुआ है।ये सबूत है उन रूदालियों का इस खूनी संघर्ष में नक्स्लियों को भरपूर समर्थन देने का।ज़रा सी बात में हाय-तौबा मचा देने वाली संस्थायें पांच-पांच जवानों के अपहरण पर खामोश हैं।अब उन्हे उन अगवा जवानो को छोड़ने की अपील करने की फ़ुरसत तक़ नही मिल रही है।ये वही संगठन है जो अदालत द्वारा सज़ा सुनाये जाने के बाद एक सजा-याफ़्ता को छुड़ाने के लिये देश भर में प्रदर्शन करने से नही चूके।ऐसा करके उन्होनें अदालत या न्याय प्रणाली का जाने-अन्जाने अपमान भी किया मगर उन्हे शायद इस बात की परवाह भी नही थी क्योंकि वे तो उस शख्स के समर्थन मे आगे आये थे जिसकी अदालत में चल रही कार्रवाई देखने उनके विदेशी आका यंहा आये थे।
बताईये 13 दिनो से पांच जवानों की कोई खबर नही मिल पा रही है।क्या गुज़र रही होगी उन अगवा पांच जवानों के परिवार वालों पर।आखिर वे भी हाड़-मांस के इंसान है और उनकी भी सामाजिक ज़िम्मेदारियां और रिश्तेदारी है?क्या ये मानवाधिकार वादियों को नही लगता कि गलत है?क्या गुज़र रही होगी एक बीबी पर,एक मां पर एक बहन पर,एक भाई पर एक बाप पर एक बेटे या बेटी पर?क्या मानवाधिकार वादियों को ये नही पता कि पुलिस वालों के भी बेटे-बेटियां होती है?उनकी भी बीबी-मां और बहन होती है?उनके घर में भी उतना ही दुःख का सन्नाटा पसरा रहता है जितना उनके हिसाब से किसी नक्सली के मारे जाने पर फ़ैलता है?
पता नही इस देश मे मानवाधिकार के दोगली परिभाषा कब बदलेगी?कब एक नक्सली और एक पुलिस वाले के मानवाधिकार बराबर नज़र से देखें जायेंगे?पता नही कब उन पांच अगवा जवानों का पता चलेगा?पता नही कब मामूली सी रकम पर होने वाले अपहरण पर दिन भर सनसनीखेज़ ड्रामा दिखा कर टीआरपी बटोरने की होड़ मे लगे नेशनल न्यूज़ चैनलों की नज़र इस खबर पर भी पड़ेगी और इसे लगातार दिखा कर वे दबाव बना कर उन जवानो की रिहाई में अपना सक्रिय योगदान देंगे?पता नही कब? पता नही कब?पता नही कब?
पुलिस को हाल ही यंहा नक्सलियों से मुठभेड़ के दौरान विदेशी सहायता से चलने वाले एनजीओ के डाक्टरों की पर्चियां विदेशी दवाये और सामान बरामद हुआ है।ये सबूत है उन रूदालियों का इस खूनी संघर्ष में नक्स्लियों को भरपूर समर्थन देने का।ज़रा सी बात में हाय-तौबा मचा देने वाली संस्थायें पांच-पांच जवानों के अपहरण पर खामोश हैं।अब उन्हे उन अगवा जवानो को छोड़ने की अपील करने की फ़ुरसत तक़ नही मिल रही है।ये वही संगठन है जो अदालत द्वारा सज़ा सुनाये जाने के बाद एक सजा-याफ़्ता को छुड़ाने के लिये देश भर में प्रदर्शन करने से नही चूके।ऐसा करके उन्होनें अदालत या न्याय प्रणाली का जाने-अन्जाने अपमान भी किया मगर उन्हे शायद इस बात की परवाह भी नही थी क्योंकि वे तो उस शख्स के समर्थन मे आगे आये थे जिसकी अदालत में चल रही कार्रवाई देखने उनके विदेशी आका यंहा आये थे।
बताईये 13 दिनो से पांच जवानों की कोई खबर नही मिल पा रही है।क्या गुज़र रही होगी उन अगवा पांच जवानों के परिवार वालों पर।आखिर वे भी हाड़-मांस के इंसान है और उनकी भी सामाजिक ज़िम्मेदारियां और रिश्तेदारी है?क्या ये मानवाधिकार वादियों को नही लगता कि गलत है?क्या गुज़र रही होगी एक बीबी पर,एक मां पर एक बहन पर,एक भाई पर एक बाप पर एक बेटे या बेटी पर?क्या मानवाधिकार वादियों को ये नही पता कि पुलिस वालों के भी बेटे-बेटियां होती है?उनकी भी बीबी-मां और बहन होती है?उनके घर में भी उतना ही दुःख का सन्नाटा पसरा रहता है जितना उनके हिसाब से किसी नक्सली के मारे जाने पर फ़ैलता है?
पता नही इस देश मे मानवाधिकार के दोगली परिभाषा कब बदलेगी?कब एक नक्सली और एक पुलिस वाले के मानवाधिकार बराबर नज़र से देखें जायेंगे?पता नही कब उन पांच अगवा जवानों का पता चलेगा?पता नही कब मामूली सी रकम पर होने वाले अपहरण पर दिन भर सनसनीखेज़ ड्रामा दिखा कर टीआरपी बटोरने की होड़ मे लगे नेशनल न्यूज़ चैनलों की नज़र इस खबर पर भी पड़ेगी और इसे लगातार दिखा कर वे दबाव बना कर उन जवानो की रिहाई में अपना सक्रिय योगदान देंगे?पता नही कब? पता नही कब?पता नही कब?
Wednesday, April 29, 2009
मैं उपनिरीक्षक की विधवा!क्या मेरा सुहाग लुटना,क्या मेरी दुनिया उजड़ना,क्या मेरे बच्चों का भविष्य बर्बाद होना महज़ इत्तेफ़ाक़ हैं?
छत्तीसगढ मे अचानक बड़े-बडे लोगो की बढती दिलचस्पी और बडे-बडे नामधारियों के दौरे देखकर मुझे लगा कि मेरे भी दिन फ़िर जायेंगे! मगर ऐसा कुछ नही हुआ! वे लोग आये तो मगर रटे-रटाये तोते की तरह सिर्फ़ और सिर्फ़ पढाई हुई बात कह कर चले गये।मुझे उम्मीद थी कि उनमे से एक तो कम से कम औरत होने के नाते ही मेरा दर्द समझेगी मगर सब सपनो की तरह टूट गया। और मज़बूर होकर मेरे दिल से सिर्फ़ आह ही निकल सकी कि मैं उपनिरीक्षक की विधवा!क्या मेरा सुहाग लुटना,क्या मेरी दुनिया उजड़ना,क्या मेरे बच्चों का भविष्य बर्बाद होना महज़ इत्तेफ़ाक़ हैं?
मेरी भी अपनी खूबसूरत दुनिया थी।मेरे पति को रिश्वत के भूत से ज्यादा देशभक्ती के ज़ूनून ने जकड़ रखा था।नई-नई नौकरी और नई-नई शादी।राजधानी के मलाईदार इलाके की पोस्टिंग के बाद उसी थाने बने रहने के लिये मोटी रकम की फ़रमाईश के बाद बस्तर की पोस्टिंग की धमकी पर हमने मिलकर चर्चा की।सब दोस्तो ने कहा कि सिद्धांत छोडो और कमाओ,कमाने दो का रास्ता पकडो,मगर उन्होने साफ़ मना किया।मैने भी खुशी-खुशी पति का हौसला बढाते हुये हर-हाल मे ईमानदारी की सूखी रोटी खाकर सुखी जीवन जीने का संकल्प दोहरा दिया,और हम राजधानी की चमक-धमक से दूर बस्तर के जंगल मे फ़ेंक दिये गये। ऐसे की चाह कर भी वापस निकल न सके।
शुरू के दिन तो बड़े मज़े से गुज़रे।वंहा जाकर एक बार और हमारी बगिया मे फ़ुल खिलाऽब हम दो और हमारे दो थे।बडी लड़की नर्सरी जाने लायक हो गई थी,और जहां हमारी पोस्टिंग थी वहां नर्सरी एक सपने के समान थी।तब पहली बार लगा था कि देशप्रेम और राष्ट्रभक्ति जैसी बाते किताबों मे ही ठीक लगती है।बच्चो के भविष्य को ध्यान मे रखते हुये मैने इनसे कहा कि वापस किसि अच्छे शहर चल्ते हैं।उन्होने भी बेहद थके हुये स्वर ने कहा था कि ट्राई करते हैं।उस दिन मुझे लगा था कि वे बस्तर के जंगलो मे मौत से रोज़ जंग लड़ते हुये हुये जवानी मे ही बूढे हो चले हैं।वो जोश वो जुनूं सब बस्तर के हने जंगलो मे गुम होता नज़र आया।
मै रोज़ उनसे पूछ्ती कि क्या हुआ?और रोज़ उनका जवाब होता सब ठीक हो जायेगा।फ़िर एक दिन गुज़र जाता,ऐसा करते-करते साल गुज़र गये। हमे ऐसा लगने लगा कि हम बस्तर के लिये ही बने है। छोटू अब चलने लगा था और तुतली भाषा मे बात करने लगा था। अब मैने ज़िद पकड़ ली थी कम से कम बच्चो को पढा लिखा तो लूं।मेरी ज़िद भी उन्हे अंदर से तोड़ रही है ये मुझे पता ही नही चला।रोज़ सुबह बच्चो की पढाई के सवाल के साथ उन्हे घर से ड्यूटी के लिये विदा करती थी और रात को घर मे घुसते समय फ़िर से उन्ही सवालो के साथ स्वागत करती थी।
रोज़-रोज़ के सवालो से लगता है वे भी त्रस्त आ गये थे,एक दिन उन्होने कहा कि मै कुछ न कुछ करता हूं,मुझे तंग मत किया करो,कुछ दिनो की मोहलत दो। और कुछ दिनो बाद उन्होने मुझ्से कहा कि तैयारी करो। हम वापस जा रहे हैम्। मै हैरान थी।मैने पूछा सच और उन्होने कहा हां!कैसे ?इसका जवाब तो जैसे रुला देने वाला था।उन्होने मेरी ज़ीद से परेशान होकर वापस शहर मे पोस्टिंग के लिये अपना पुशतैनी मकान बेच कर एडवांस दे दिया था।मै भी वापसी की तैयारियो मे जुटी हुई थी कि एक रोज़ ये गश्त से लौटे नही।सुबह काफ़ी देर होने के बाद भी जब इनकी कोई खबर नही आई और थाने के अलावा दूसरे लोग घर के आस-पास मंडराने लगे तो माथा ठनका और जो मेरा शक़ था वो सच निकला।
मेरी दुनिया उजड़ चुकी थी।उनका चेहरा होता तो शायद आखिरी बार देख भी लेती।लोथड़ो को बटोर कर लाश का शकल देने की कोशिश की गई थी और पता नही किस हवलदार का हाथ य किस सिपाही का पैर भी शामिल था उनकी लाश में।पता नहि कितनी बार मै बेहोश हुई हूंगी और जब होश मे आई तो मुझे अनुकंपा की भीख मे सिपाही की नौकरी दे दी गई। अब मै उप निरीक्षक की बीबी नही एक सिपाही हूं,जिसका जवान जिस्म साब लोगो की भूखी आंखो की आग मे झुलस कर कब बूढा हो गया पता ही नही चला। अब मुझे ज़रूरत भी नही मह्सूस होती किसी अच्छी प्राइवेट नर्सरी की।मेरे बच्चे सरकारी स्कूल मे पढ रहे हैं।उन्का भविष्य बनने से पहले ही बिगड़ गया है।मेरे सपने सज़ने से पहले ही उजड़ चुके हैं।
कभी-कभी आप लोगो की बड़ी-बड़ी बाते सुनती हूं तो ऐसा लगता है कि कभी कोई हमारे बारे मे भी बोलेगे मगर आप लोगो को तो सिर्फ़ छतीसगढ मे एक आदमी ही नज़र आता है।कभी दिल्ली की महिलाओ को छत्तीसगढ पर रोते देखती हूं तो लगता है कि अब वो हम लोगो के लिये भी बोलेंगी। हमारा क्या दोष हमे सिपाही क्यों बनाया गया?अनुकम्पा देना ही था उसी पद पर देते जिस पद पर हमारा पति था?मगर अफ़्सोस इस मामले कोई नही बोला। हवाई जहाज मे दुनिया घूमने वालि औरते भी नही बोली और ना ही कानून के बड़े-बड़े जानकार बोले और देश-विदेश के महान लोगो को तो इस बारे मे मालूम ही नही,क्योंकी उन्हे बताया गया ही नही।उन्हे तो सिर्फ़ ये मालूम है कि छत्त्तीसग़ढ मे सिर्फ़ एक आदमी के साथ अन्याय हो रहा है और जो हमारे साथ या हम जैसे और लोगो के साथ हुआ वो क्या न्याय है?
मेरी भी अपनी खूबसूरत दुनिया थी।मेरे पति को रिश्वत के भूत से ज्यादा देशभक्ती के ज़ूनून ने जकड़ रखा था।नई-नई नौकरी और नई-नई शादी।राजधानी के मलाईदार इलाके की पोस्टिंग के बाद उसी थाने बने रहने के लिये मोटी रकम की फ़रमाईश के बाद बस्तर की पोस्टिंग की धमकी पर हमने मिलकर चर्चा की।सब दोस्तो ने कहा कि सिद्धांत छोडो और कमाओ,कमाने दो का रास्ता पकडो,मगर उन्होने साफ़ मना किया।मैने भी खुशी-खुशी पति का हौसला बढाते हुये हर-हाल मे ईमानदारी की सूखी रोटी खाकर सुखी जीवन जीने का संकल्प दोहरा दिया,और हम राजधानी की चमक-धमक से दूर बस्तर के जंगल मे फ़ेंक दिये गये। ऐसे की चाह कर भी वापस निकल न सके।
शुरू के दिन तो बड़े मज़े से गुज़रे।वंहा जाकर एक बार और हमारी बगिया मे फ़ुल खिलाऽब हम दो और हमारे दो थे।बडी लड़की नर्सरी जाने लायक हो गई थी,और जहां हमारी पोस्टिंग थी वहां नर्सरी एक सपने के समान थी।तब पहली बार लगा था कि देशप्रेम और राष्ट्रभक्ति जैसी बाते किताबों मे ही ठीक लगती है।बच्चो के भविष्य को ध्यान मे रखते हुये मैने इनसे कहा कि वापस किसि अच्छे शहर चल्ते हैं।उन्होने भी बेहद थके हुये स्वर ने कहा था कि ट्राई करते हैं।उस दिन मुझे लगा था कि वे बस्तर के जंगलो मे मौत से रोज़ जंग लड़ते हुये हुये जवानी मे ही बूढे हो चले हैं।वो जोश वो जुनूं सब बस्तर के हने जंगलो मे गुम होता नज़र आया।
मै रोज़ उनसे पूछ्ती कि क्या हुआ?और रोज़ उनका जवाब होता सब ठीक हो जायेगा।फ़िर एक दिन गुज़र जाता,ऐसा करते-करते साल गुज़र गये। हमे ऐसा लगने लगा कि हम बस्तर के लिये ही बने है। छोटू अब चलने लगा था और तुतली भाषा मे बात करने लगा था। अब मैने ज़िद पकड़ ली थी कम से कम बच्चो को पढा लिखा तो लूं।मेरी ज़िद भी उन्हे अंदर से तोड़ रही है ये मुझे पता ही नही चला।रोज़ सुबह बच्चो की पढाई के सवाल के साथ उन्हे घर से ड्यूटी के लिये विदा करती थी और रात को घर मे घुसते समय फ़िर से उन्ही सवालो के साथ स्वागत करती थी।
रोज़-रोज़ के सवालो से लगता है वे भी त्रस्त आ गये थे,एक दिन उन्होने कहा कि मै कुछ न कुछ करता हूं,मुझे तंग मत किया करो,कुछ दिनो की मोहलत दो। और कुछ दिनो बाद उन्होने मुझ्से कहा कि तैयारी करो। हम वापस जा रहे हैम्। मै हैरान थी।मैने पूछा सच और उन्होने कहा हां!कैसे ?इसका जवाब तो जैसे रुला देने वाला था।उन्होने मेरी ज़ीद से परेशान होकर वापस शहर मे पोस्टिंग के लिये अपना पुशतैनी मकान बेच कर एडवांस दे दिया था।मै भी वापसी की तैयारियो मे जुटी हुई थी कि एक रोज़ ये गश्त से लौटे नही।सुबह काफ़ी देर होने के बाद भी जब इनकी कोई खबर नही आई और थाने के अलावा दूसरे लोग घर के आस-पास मंडराने लगे तो माथा ठनका और जो मेरा शक़ था वो सच निकला।
मेरी दुनिया उजड़ चुकी थी।उनका चेहरा होता तो शायद आखिरी बार देख भी लेती।लोथड़ो को बटोर कर लाश का शकल देने की कोशिश की गई थी और पता नही किस हवलदार का हाथ य किस सिपाही का पैर भी शामिल था उनकी लाश में।पता नहि कितनी बार मै बेहोश हुई हूंगी और जब होश मे आई तो मुझे अनुकंपा की भीख मे सिपाही की नौकरी दे दी गई। अब मै उप निरीक्षक की बीबी नही एक सिपाही हूं,जिसका जवान जिस्म साब लोगो की भूखी आंखो की आग मे झुलस कर कब बूढा हो गया पता ही नही चला। अब मुझे ज़रूरत भी नही मह्सूस होती किसी अच्छी प्राइवेट नर्सरी की।मेरे बच्चे सरकारी स्कूल मे पढ रहे हैं।उन्का भविष्य बनने से पहले ही बिगड़ गया है।मेरे सपने सज़ने से पहले ही उजड़ चुके हैं।
कभी-कभी आप लोगो की बड़ी-बड़ी बाते सुनती हूं तो ऐसा लगता है कि कभी कोई हमारे बारे मे भी बोलेगे मगर आप लोगो को तो सिर्फ़ छतीसगढ मे एक आदमी ही नज़र आता है।कभी दिल्ली की महिलाओ को छत्तीसगढ पर रोते देखती हूं तो लगता है कि अब वो हम लोगो के लिये भी बोलेंगी। हमारा क्या दोष हमे सिपाही क्यों बनाया गया?अनुकम्पा देना ही था उसी पद पर देते जिस पद पर हमारा पति था?मगर अफ़्सोस इस मामले कोई नही बोला। हवाई जहाज मे दुनिया घूमने वालि औरते भी नही बोली और ना ही कानून के बड़े-बड़े जानकार बोले और देश-विदेश के महान लोगो को तो इस बारे मे मालूम ही नही,क्योंकी उन्हे बताया गया ही नही।उन्हे तो सिर्फ़ ये मालूम है कि छत्त्तीसग़ढ मे सिर्फ़ एक आदमी के साथ अन्याय हो रहा है और जो हमारे साथ या हम जैसे और लोगो के साथ हुआ वो क्या न्याय है?
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