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Wednesday, September 12, 2012

बापू!कमीनो ने चौक चौराहे पर आपको होर्डिंग्ज़ की तरह लटका दिया है.

बापू का बड्डे करीब आ गया है.फिर से बापू को याद करने का कम्पीटिशन शुरु हो जायेगा.लेकिन बस एक दिन के लिये.मैं भी उनमे शामिल हूं मगर मैं एक दिन से कुछ ज्यादा दिनो तक़ उन्हे याद करता हूं.उन पर हमेशा कुछ न कुछ लिखता भी रहता हूं और उनकी जयंति के समारोह पर जमकर डायलागबाज़ी भी करता हूं.फिर इस बार उनके हैप्पी बड्डे को करीब आता देख सोच रहा हूं इस हाट केक को क्यों ना मैं भी काट कर एकाध पीस चख लूं.यानी कि एक कि
ताब उनपर उनके जन्म दिन के अवसर पर प्रकाशित करवा कर बहती गंगा में से टीआरपी के पांच दस बैरल भर ही लूं.मटेरियल तैयार है.शीर्षक भी बडा ही धांसू टाईप का सूझा है."बापू!कमीनो ने आपको चौक चौराहों पर होर्डिंग्ज़ की तरह लटका दिया है".कैसे रहेगा भाईयो?बताईयेगा ज़रा.वैसे किताब के कुछ अंश इस प्रकार है."""बापू कल आपका हैप्‍पी बड्डे है। इसलिए आज आपको नहला-धुलाकर कल के लिए तैयार किया जा रहा है। आप सोचते होंगे कि आपको देश के लोग कितना प्‍यार करते हैं, कितना सम्‍मान करते हैं, जो चौक-चौराहों पर आपको बिठाकर रखा है। बापू आपको गलत फहमी है। इन कमीनों ने आपको अपनी विचारधारा बेचने के लिए और नेतागिरी की दुकान चलाने के लिए होर्डिंग की तरह इस्‍तेमाल किया है। आप नेताओं के लिए मॉडल से ज्‍यादा कुछ नहीं हैं। सॉरी बापू आपको ये खरी-खरी खराब लग रही होगी, लेकिन क्‍या करूँ मजबूरी में आपको बता रहा हूं।
""""""तो बापू सबसे पहले आप ईश्वर अल्लाह तेरो नाम का ही हाल जान लो। आप चिल्लाते रह गये और भगवान आपकी बात मान कर सबको सन्मति देने को तैयार भी हो गया मगर सन्मति किसी ने नही ली।सबने अपने-अपने हिसाब से ईश्वर-अल्लाह को बांट लियां केवल ईश्वर अल्लाह को बांटा बल्कि उनके नाम पर देश को भी अघोषित रूप से बांट दिया।और तो और जुम्मे-जुम्मे आठ दिन हुये पैदा हुये ब्लाग को वंहा भी बंटवारा हो गया ईश्वर-अल्लाह के नाम पर ।ये तू क्या कह रहा है?बापू ने मुझसे पूछा।सच कह रहा हूं।बड़ा शौक था ना सच सुनने का तो लो सुनो।
खुब् भजन करते थे ना,क्या सोचा था,सब समझ जायेंगे?अरे बापू ये कुत्ते की दुम है जिसे अंग्रेज़ सीधा नही कर पाये वो भला भजन से…।खैर छोडो बापू।पहले ईश्वर अल्लाह के नाम पर लफ़ड़े मेरठ,कानपुर,लखनऊ,भिवंडी,हैदराबाद तक ही सीमित थे,मगर अब तो आपके स्टेट का अहमदाबाद भी इसमे शामिल हो गया है।इंदौर,मऊ,मालेगांव,मुम्बई और कई नये शहर टाप पर चल रहे हैं।कश्मीर का तो हाल ही मत पूछो।वंहा की हरी वादियों को लाल कर दिया गया है।इतना खून बह रहा है वंहा की चौक लाल हो गये हैं तो सड़क भी लाल है।चारो ओर खून ही खून है बापू,लाल ही लाल्।
"""""बापू खराब लग रहा है ना देश की हालत जान कर।आपके समय ज़रूर ये भूखे-नंगों का देश रहा होगा आज तो ये खूनियों-दंगों का देश हो गया है।चलिये छोडिये खून-खराबे को और क्या बताऊं?आपका दलित प्रेम बापू आजकल हाई-प्रोफ़ाईल ड्रामे मे बदल चुका है।जिन्हे आप हरि का जन कहते थे ना अब कहोगे तो बुक हो जाओगे।उन्के लिये अब आपकी ज़रूरत नही है।
"""""बापू आपका कोई बेटा इस देश का प्रधानमंत्री बना?बापू ने कहा मैने इसलिये………ये डायलागबाजी नही बापू,मैने उनकी बात बीच मे ही काट के कहा।आप तो सिर्फ़ ये बताओ कि क्या आपका कोई बेटा प्रधानमंत्री बना?नही।आपके बेटों मे से किसी का बेटा महामंत्री बना?नही।आप प्रधानमंत्री बने?नही।तो फ़िर आप ही बताओ आप असली कैसे हो सकते हैं।असली तो वो लोग हैं।पहले अम्मा जी बनी,फ़िर भैया जी बने और आप देख लेना कुछ ही दिनो की बात है बाबा भी बन जायेंगे। आखिर इस देश की जनता मूर्ख तो है नही।एकाध बार धोका हो सकता है,मगर तीसरी पीढी तक़्………।
तो कैसा रहेगा किताब का प्रकाशन,सभी चाहने वालो से उनकी बेशकिमती राय जानना चाहता हूं.

Sunday, October 2, 2011

बापू, कमीनों ने होर्डिंग की तरह चौक-चौराहों पर लटका दिया है आपको


बापू आज आपका हैप्‍पी बड्डे है। इसलिए आज आपको नहला-धुलाकर कल के लिए तैयार किया जा रहा है। आप सोचते होंगे कि आपको देश के लोग कितना प्‍यार करते हैं, कितना सम्‍मान करते हैं, जो चौक-चौराहों पर आपको बिठाकर रखा है। बापू आपको गलत फहमी है। इन कमीनों ने आपको अपनी विचारधारा बेचने के लिए और नेतागिरी की दुकान चलाने के लिए होर्डिंग की तरह इस्‍तेमाल किया है। आप नेताओं के लिए मॉडल से ज्‍यादा कुछ नहीं हैं। सॉरी बापू आपको ये खरी-खरी खराब लग रही होगी, लेकिन क्‍या करूँ मजबूरी में आपको बता रहा हूं।

पिछले साल भी आपके बड्डे पर आपको नहलाने-धुलाने की ड्यूटी मुझे मिली थी। इस बार भी मुझे ही जबरन ये ड्यूटी थमाई गई है। मेरी पिछले साल भी इच्‍छा नहीं थी और इस बार भी वही हालत है। नवरात्र का उपवास मेरी हालत खराब कर रहा है और मुझे आपको ऊमस भरी दोपहरी में नहलाना पड़ रहा है। मजबूरी है नौकरी का सवाल है। वैसे बापू मैं आपकी दिल से इज्‍जत करता हूं, इसलिए मजबूरी में ही सही मैं आपकी साफ-सफाई पूरी ईमानदारी से करता हूं। याद है आपको पिछले साल जब मैं आपको नहलाने आया था, तो आपका चश्‍मा गायब था। मैंने जब चश्‍मा चोरी होने की बात साहब लोगों को बताई तो उन्‍होंने मुझे कितना डांटा था। बड़ी मुश्किल से आपकी पसंद का मॉडल ढूंढ-ढांढकर लाया गया था और जितनी परेशानी चश्‍मा ढूंढने में साहब लोगों को हुई थी, उतनी ही ज्‍यादा गालियां मुझे खानी पड़ी थी और साथ में चेतावनी भी मिली थी। वो तो अच्‍छा हुआ सारे अख़बार वाले और न्‍यूज चैनल वाले हमेशा की तरह सो रहे थे और उन्‍हें इस बात का पता नहीं चला, वरना मेरा सस्‍पेंशन पक्‍का था।

खैर छोड़ों पुरानी बातें बापू कोई मतलब नहीं इनका। आपको तो पता भी नहीं कि जो चश्‍मा आपको पहनाया गया उसके शीशों पर दुनिया भर के स्‍क्रैच लगे हुए थे। कबाड़ खाने में पड़ा हुआ था वो। और आपको पता चलता भी तो क्‍या फायदा होता। क्‍या आप अच्‍छे और साफ-सुथरे शीशों वाले चश्‍मे से वो सब देख पाते जो आज देश में हो रहा है। देश के अधिकांश शहरों में सड़कों पर खून बिखरा हुआ है। क्‍या आप वो देख पाते।

अच्‍छा, तो ये बात है। मुझे अब समझ में आ रहा है कि आप खराब शीशों की शिकायत क्‍यों नहीं करते। समझा, दरअसल आप वो सब देखना ही नहीं चाहते, जो देश में हो रहा है। इसकी तो आपने सपने में भी कल्‍पना नहीं की होगी। जभी मैं सोचूं कि साला इत्‍ते सालों से आप खामोश कैसे बैठे हैं। इतने लफड़े-दफड़े, दंगे-फसाद देखकर भी आप उपवास करने क्‍यों नहीं गए। खैर, जाते भी तो भी आपको कोई जूस पिलाने तक नहीं आता और वैसे भी चौक-चौराहों पर बैठे-बैठे आप उपवास ही तो कर रहे हैं। अरे, ये तो मैंने सोचा ही नहीं। बापू मुझे माफ करना। आप तो अपनी पुरानी स्‍टाईल से ही काम कर रहे हैं। कमीनों की हरकतें देखकर आप लगता है इस दुनिया को छोड़ने के साथ ही उपवास करने के लिए आइडिया लगाकर चौक-चौराहों पर उपवास पर बैठ गए थे।

बापू, आपकी सहनशीलता तो मानना ही पड़ेगा। देश को आज़ाद करा दिया, मगर साले देशवासियों ने आपको चौक-चौराहों पर जंजीरों के घेरों से कैद कर दिया है। आपको शो-पीस बना दिया। आपको देखने-दिखाने की चीज बना दिया। आपको विचारधारा बेचने का विज्ञापन बना दिया। आपको नेतागिरी की मार्केटिंग का मॉडल बना दिया। आपको जुलूस और धरना देखने वाला दर्शक बना दिया। आपको होर्डिंग की तरह लटका दिया है इन कमीनों ने। और आप हैं बापू खामोशी से सब सह रहे हैं। हमारे शहर में विपक्ष के जितने धांसू नेता हैं सबके-सब एसी कार में चलते हैं। पैदल चलने का तो उनको मौका ही नहीं मिलता। कभी-कभार रैली, जुलूस में एकाध घंटा पैदल चल लेते हैं तो दूसरे दिन ही बयान जारी कर देते हैं कि शहर को धूल और धुएं से बचाना होगा। प्रदूषण से जीना दूभर हो गया है शहर वासियों का। बताओ कितने एहसान फरामोश हैं ये लोग। साले कार में घूमते हैं और धूल-धुएं की बात करते हैं। जो वोट देते हैं उस जनता की चिंता करते हैं और जिसने वोट देने का अधिकार दिलाने के लिए आज़ादी दिलाई, उसकी रत्‍ती भर फिकर नहीं। धूल फांकते बैठे हो आप चौक-चौराहों पर। साल में एक बार साफ कराते हैं साले। आप भी बापू धन्‍य हैं। सालों से धूल-धुआं खा रहे हो और खामोश बैठे हो। आपकी जगह कोई और होता तो दमा-अस्‍थमा का शिकार होकर खांस-खांसकर मर जाता साला। लेकिन आपका अपने बच्‍चों के प्रति प्‍यार मानने लायक है। भगवान शंकर के बाद एक आप ही नज़र आते हो, जो विष पीकर भी कल्‍याण की सोच रहे हो।

इसके बाद भी बापू, कमीनों को ज़रा भी शर्म नहीं आती। अब आपको क्‍या बताऊं। मेन चौक-चौराहों पर तो आपकी हालत ठीक है लेकिन सुनसान इलाकों और बगीचों में आपकी पोजिशन बहुत ज्‍यादा खराब है। आपको साफ करते समय पक्षियों की बीट की दुर्गंध से ऐसा लगता है कि उल्‍टी हो जाएगी। पता नहीं आप क्‍यों सबको माफ किए जा रहे हो। कमीने अपने लिए नया-नया दफ्तर बनवा लेते हैं, लेकिन आपके सर पर एक छोटा सा शेड नहीं बनवाते। उसमें कुछ बचेगा नहीं न। क्‍यों बनवाएंगे फिर। मोटी कमाई का प्‍लान बने तो आपको कहीं पर भी बिठाकर करोड़ों रूपया जीम जाएंगे, लेकिन पुरानी जगह जहां आप सालों से बैठे हो वहां साले फूटी कौड़ी खर्चा नहीं करते।

जाने दो बापू, और अंदर की बात बताऊंगा तो आप शायद नाराज़ होकर कल हार पहनाने आने वालों को अपनी ही लाठी से पीट दोगे। मज़ाक नहीं कर रहा हूं। सच बोल रहा हूं। आप बोलोगे कि मैंने अहिंसा के दम पर अंग्रेजों को ठीक कर दिया, लेकिन किसी पर हाथ नहीं उठाया। तो बापू वो सफेद अंग्रेज थे उनमें थोड़ा-बहुत ईमान था, ये तो साले काले अंग्रेज हैं इनमें कोई ईमान-धीमान नहीं है। दूसरे, ये लातों के भूत हैं, बातों से तो मानते ही नहीं। अब देखों न, हर साल आपके जन्‍मदिन पर र्इश्‍वर अल्‍लाह तेरो नाम भजते हैं और साल भर साले दंगा-फसाद करते हैं। ये अहिंसा-फहिंसा आपके साथ ही दुनिया से निकल ली बापू। उसको पता था जब देश में आपकी कदर नहीं होने वाली, तो उसकी क्‍या कदर होगी। अहिंसा की जगह उसकी कजिन हिंसा छाई हुई है। दरअसल आपका और आपकी अहिंसा का मीडिया मैनेजमेंट बड़ा पूअर रहा। भला बकरी की दूध की चाय पीकर कोई आपको या आपकी अहिंसा को कितना हाईलाइट करता। वैसे भी आजकल कॉकटेल का ज़माना है और हिंसा की मार्केटिंग सिमी, बजरंगदल, ठाकरे ब्रदर्स, अर्जुन सिंह और यादव ब्रदर्स जैसी जानी-मानी मल्‍टीस्‍टेट कंपनियां कर रही है। ऐसे में हिंसा के सामने अहिंसा कहां टिकती। इसीलिए कह रहा हूं कि आप भी सालों को अपनी ही लाठी से पीटने पर मजबूर हो जाते।

बहुत ही कमीने हैं बापू ये लोग। सड़कों पर चौक-चौराहों पर बिठा दिया है आपको और कमरों में दीवार पर लटका दिया है आपको। क्‍या बताऊं बापू इतना दिमाग खराब होता है जब सरकारी दफ्तरों में आपकी तस्‍वीर के नीचे बैठा साहब या नेता बिना शर्माए हरामखोरी करते हैं। आपने कहा था बापू की ज़रूरत से ज्‍यादा जमा करना चोरी है। यहां तो कई पीढ़ी के लिए इंतजाम कर रहे हैं लोग। चोरी नहीं डाका डाल रहे हैं फिर भी पेट नहीं भर रहा है उनका। और सब हो रहा है आपकी तस्‍वीर के नीचे। संसद में भी जो हुआ बापू। वो आपने देखा। आपने सोचा भी नहीं होगा कि सांसद संसद में नोटों की गड्डियां दिखाएंगे।

छोड़ो बापू आपके चक्‍कर में बेमतलब मैं इमोश्‍नल हो रहा हूं। रगड़-रगड़के आपको नहलाने का मुझे ईनाम नहीं मिलने वाला। पिछले इतवार को मैंने बड़े साहब की कार धोई थी तो साहब ने मुझे खुश होकर नीला वाला गांधी यानि सौ का नोट दिया। उसके पहले वाले इतवार को मेम साहब के प्‍यारे-दुलारे पप्‍पी को नहलाया था, तो मेम साहब ने भी खुश होकर मुझे नीला गांधी यानि सौ का नोट ईनाम में दिया था। काम भी उतना नहीं था यहां तो बस सेवा ही है मेवा तो कुछ मिलना नहीं है। एक तो टाईम खोटा करो, ऊपर से इमोश्‍नल अलग हो रहा हूं। ठीक है, बापू इसे मैं समाज सेवा के एकाउण्‍ट में डाल दे रहा हूं। फायदा कुछ होना नहीं है अब अगले साल आऊंगा बापू आपको नहलाने कोई अच्‍छी ख़बर होगी तो बताऊंगा ज़रूर। तब तक आप चौक-चौराहों पर उपवास करते रहिए। बुरा मत मानना भावना में बहकर कोई गलत बात कह गया होऊंगा तो।
आपका अपना

गरीबदास फकीरचंद गांधी                                                                                                       ये पोस्ट 2008 की है,आज भी बापू पर लिखना चाहा तो मुझे यही सब याद आ रहा था,सो मैने इसे ही दोबारा पोस्ट कर दिया।

Sunday, October 3, 2010

सारी बापू ! आज फ़िर मैं सच नही बोल सका!

बापू!यानी हमे खुली हवा मे सांस लेना का अधिकार दिलाने वाला लंगोटीधारी महात्मा1बापू यानी अंग्रेज़ो के ज़ुल्मो सितम से मुक्ति दिलाने वाला अहिंसा का पुजारी,जिसका धर्म सच बोलना था।उसी बापू के हैप्पी बड्डे पर आज मुझे एक नही तीन-तीन कार्यक्रमों मे जाने का मौका मिला मगर अफ़सोस के उनमे से एक मे भी मैं सच नही बोल पाया।एक जगह ज़रूर मैंने कोशिश की मगर वंहा भी आधा सच बोल कर माफ़ी मांग ली और फ़िर कभी जब बापू पर बोलने लायक हो जाऊंगा,तब सब सच सच कहूंगा कह कर बला टाल दी।

आई एम सारी बापू!रियली आई एम सारी!मुझे तो तो पता भी नही चलता कि सच की महिमा क्या है!अगर मुझे आपका बड्डे सेलिब्रेट करके घर लौटते समय देर रात नही हो जाती।देर रात नेशनल वालों ने चाहे फ़ार्मेलिटी ही क्यों ना हो आपकी याद में मुन्ना भाई कि फ़िल्म दिखाई।उस फ़िल्म में कभी अवैध बंदूक और हथियार रखने के आरोप में टाडा  मे टाडा में बंद हुये मुन्ना भाई यानी संजय दत्त को सच बोलते देखा तो मुझे अपने आप पर बहुत शर्म आई।

टाडा का आरोपी सच बोल रहा था और मुझे आज आपके बड्डे पर एक नही तीन तीन बार सच बोलने का मौका मिला और मैं सच बोलने की हिम्मत नही कर सका।सच मे बापू,आज मुझे ऐसा लग रहा है कि मेरा अहंकार,मेरा अतिआत्मविश्वास सब चूर-चूर हो गया है।एक छोटा सा सच बोलना कितनी हिम्मत का काम है ये मुझे आज पता चला।सुबह सांभ्रांत और खूब खाये-पीये-अगाहे लोगों के फ़ेवरेट टाईमपास यानी सोशल सर्विस यानी क्लब कल्चर के एक कार्यक्रम में मुझे बुलाया गया था।मुख्य अतिथि थी महापौर डा किरणमयी नायक और अध्यक्ष था मैं।
महापौर ने राज्य भर से आये बच्चों और उनके अभिभावकों को बापू के बड्डे की बधाई दी और मैंने भी लगभग वही कुछ कहा।मैने बेशर्मी से फ़ोटो खिंचा कर नुमाईश करने वालों की फ़र्ज़ी सेवा को असली समाज सेवा का फ़र्ज़ी सर्टिफ़िकेट दे दिया।वंहा मैं चाह कर भी अपने दिल की भडास नही निकाल पाया क्योंकि वंहा मौजूद अधिकांश समाजसेवी मेरे मित्र थे।

उसके बाद प्रेस क्लब मे बच्चों के लिये चित्रकला स्पर्धा मे भी लगभग यही हालत रही मेरी।वंहा से मैं स्व गुलाब भाई दवे के चित्र पर माला अर्पित कर व दीप प्रज्ज्वलित कर खिसक लिया और वंहा से खादी ग्रामोद्योग व ग्राम सेवा समिति के कार्यक्रम मे बाल आश्रम पंहुचा।रोज़-रोज़ कुर्ता-पायजामा पहने कर सादगी का ढिंढोरा पीटने वाला मैं पता नही कैसे आज शर्ट-पैंट पहन कर कार्यक्रम मे पहुंच गया था।

बाल-आश्रम के बच्चों के सामने मुझसे झूट बोला नही गया,मगर फ़िर भी मैं सच बोलने की हिम्मत भी नही कर सका।वंहा भी मैने ये कह कर बला टाल दी कि अभी मैं बापू पर कुछ भी बोलने लायक नही हूं लेकिन जब भी मैं बापू पर बोलने लायक होऊंगा तब ज़रूर बोलूंगा।पता नही बापू आप पर मैं कभी कुछ बोल पाऊंगा भी या नही?मगर एक बात समझ में नही आई बापू झूठ बोलना पाप है,ज़रूरत से ज्यादा जमा करना पाप है इन बातो का सरासर मज़ाक उड़ाने वाले कैसे आपके मामले मे सरासर झूट बोल जाते है?बापू चाहे कोई कुछ भी कहे मुझसे तो आपके माम्ले में झूट भी नही बोला जाता,सच बोलना तो और दूर की बात है।

सारी बापू पिछले साल मैंने सोचा था कि झूट नही बोलूंगा,सच बोलूंगा मगर दो अक्टूबर को आपके बड्डे पर लोगों द्वारा दिलाये गये संकल्प शायद तीन तारीख आते आते चूर चूर हो जाते हैं।हो सकता है किसी और के साथ नही होता हो पर मेरे साथ तो होता आया है और शायद बापू के अगले बड्डे पर भी मैं सच ना बोल पाऊं।सारी बापू इस बार मैं सच बोल रहा हूं।हो सके तो मुझे माफ़ कर देना।आपको भी यदी लगे सच बोलना आसान है तो मुझे बताईगे ज़रूर।

Friday, October 2, 2009

बापू, कमीनों ने होर्डिंग की तरह चौक-चौराहो पर लटका दिया है

बापू आज आपका हैप्‍पी बड्डे है। इसलिए आज आपको नहला-धुलाकर तैयार किया गया है। आप सोचते होंगे कि आपको देश के लोग कितना प्‍यार करते हैं, कितना सम्‍मान करते हैं, जो चौक-चौराहों पर आपको बिठाकर रखा है। बापू आपको गलत फहमी है। इन कमीनों ने आपको अपनी विचारधारा बेचने के लिए और नेतागिरी की दुकान चलाने के लिए होर्डिंग्स की तरह इस्‍तेमाल किया है। आप नेताओं के लिए मॉडल से ज्‍यादा कुछ नहीं हैं। सॉरी बापू आपको ये खरी-खरी खराब लग रही होगी, लेकिन क्‍या करूँ मजबूरी में आपको बता रहा हूं। पिछले साल भी आपके बड्डे पर आपको नहलाने-धुलाने की ड्यूटी मुझे मिली थी। इस बार भी मुझे ही जबरन ये ड्यूटी थमाई गई है। मेरी पिछले साल भी इच्‍छा नहीं थी और इस बार भी वही हालत है।सरकारी छुट्टी के दिन के काम करने का सोच कर मेरी हालत खराब हो रही है और मुझे सुबह-सुबह आपको नहलाना पड़ रहा है। मजबूरी है नौकरी का सवाल है। वैसे बापू मैं आपकी दिल से इज्‍जत करता हूं, इसलिए मजबूरी में ही सही मैं आपकी साफ-सफाई पूरी ईमानदारी से करता हूं।
याद है आपको पिछले साल जब मैं आपको नहलाने आया था, तो आपका चश्‍मा गायब था। मैंने जब चश्‍मा चोरी होने की बात साहब लोगों को बताई तो उन्‍होंने मुझे कितना डांटा था। बड़ी मुश्किल से आपकी पसंद का मॉडल ढूंढ-ढांढकर लाया गया था और जितनी परेशानी चश्‍मा ढूंढने में साहब लोगों को हुई थी, उतनी ही ज्‍यादा गालियां मुझे खानी पड़ी थी और साथ में चेतावनी भी मिली थी। वो तो अच्‍छा हुआ सारे अख़बार वाले और न्‍यूज चैनल वाले हमेशा की तरह सो रहे थे और उन्‍हें इस बात का पता नहीं चला, वरना मेरा सस्‍पेंशन पक्‍का था। खैर छोड़ों पुरानी बातें बापू कोई मतलब नहीं इनका। आपको तो पता भी नहीं कि जो चश्‍मा आपको पहनाया गया उसके शीशों पर दुनिया भर के स्‍क्रैच लगे हुए थे। कबाड़ खाने में पड़ा हुआ था वो। और आपको पता चलता भी तो क्‍या फायदा होता। क्‍या आप अच्‍छे और साफ-सुथरे शीशों वाले चश्‍मे से वो सब देख पाते जो आज देश में हो रहा है। देश के अधिकांश शहरों में सड़कों पर खून बिखरा हुआ है। क्‍या आप वो देख पाते। अच्‍छा, तो ये बात है। मुझे अब समझ में आ रहा है कि आप खराब शीशों की शिकायत क्‍यों नहीं करते। समझा, दरअसल आप वो सब देखना ही नहीं चाहते, जो देश में हो रहा है। इसकी तो आपने सपने में भी कल्‍पना नहीं की होगी।
जभी मैं सोचूं कि साला इत्‍ते सालों से आप खामोश कैसे बैठे हैं। इतने लफड़े-दफड़े, दंगे-फसाद देखकर भी आप उपवास करने क्‍यों नहीं गए। खैर, जाते भी तो भी आपको कोई जूस पिलाने तक नहीं आता और वैसे भी चौक-चौराहों पर बैठे-बैठे आप उपवास ही तो कर रहे हैं। अरे, ये तो मैंने सोचा ही नहीं। बापू मुझे माफ करना। आप तो अपनी पुरानी स्‍टाईल से ही काम कर रहे हैं। कमीनों की हरकतें देखकर आप लगता है इस दुनिया को छोड़ने के साथ ही उपवास करने के लिए आइडिया लगाकर चौक-चौराहों पर उपवास पर बैठ गए थे। बापू, आपकी सहनशीलता तो मानना ही पड़ेगा। देश को आज़ाद करा दिया, मगर साले देशवासियों ने आपको चौक-चौराहों पर जंजीरों के घेरों से कैद कर दिया है। आपको शो-पीस बना दिया। आपको देखने-दिखाने की चीज बना दिया। आपको विचारधारा बेचने का विज्ञापन बना दिया। आपको नेतागिरी की मार्केटिंग का मॉडल बना दिया। आपको जुलूस और धरना देखने वाला दर्शक बना दिया। आपको होर्डिंग की तरह लटका दिया है इन कमीनों ने। और आप हैं बापू खामोशी से सब सह रहे हैं। हमारे शहर में विपक्ष के जितने धांसू नेता हैं सबके-सब एसी कार में चलते हैं। पैदल चलने का तो उनको मौका ही नहीं मिलता। कभी-कभार रैली, जुलूस में एकाध घंटा पैदल चल लेते हैं तो दूसरे दिन ही बयान जारी कर देते हैं कि शहर को धूल और धुएं से बचाना होगा। प्रदूषण से जीना दूभर हो गया है शहर वासियों का। बताओ कितने एहसान फरामोश हैं ये लोग। साले कार में घूमते हैं और धूल-धुएं की बात करते हैं। जो वोट देते हैं उस जनता की चिंता करते हैं और जिसने वोट देने का अधिकार दिलाने के लिए आज़ादी दिलाई, उसकी रत्‍ती भर फिकर नहीं। धूल फांकते बैठे हो आप चौक-चौराहों पर। साल में एक बार साफ कराते हैं साले। आप भी बापू धन्‍य हैं। सालों से धूल-धुआं खा रहे हो और खामोश बैठे हो। आपकी जगह कोई और होता तो दमा-अस्‍थमा का शिकार होकर खांस-खांसकर मर जाता साला। लेकिन आपका अपने बच्‍चों के प्रति प्‍यार मानने लायक है।
भगवान शंकर के बाद एक आप ही नज़र आते हो, जो विष पीकर भी कल्‍याण की सोच रहे हो। इसके बाद भी बापू, कमीनों को ज़रा भी शर्म नहीं आती। अब आपको क्‍या बताऊं। मेन चौक-चौराहों पर तो आपकी हालत ठीक है लेकिन सुनसान इलाकों और बगीचों में आपकी पोजिशन बहुत ज्‍यादा खराब है। आपको साफ करते समय पक्षियों की बीट की दुर्गंध से ऐसा लगता है कि उल्‍टी हो जाएगी। पता नहीं आप क्‍यों सबको माफ किए जा रहे हो। कमीने अपने लिए नया-नया दफ्तर बनवा लेते हैं, लेकिन आपके सर पर एक छोटा सा शेड नहीं बनवाते। उसमें कुछ बचेगा नहीं न। क्‍यों बनवाएंगे फिर। मोटी कमाई का प्‍लान बने तो आपको कहीं पर भी बिठाकर करोड़ों रूपया जीम जाएंगे, लेकिन पुरानी जगह जहां आप सालों से बैठे हो वहां साले फूटी कौड़ी खर्चा नहीं करते। जाने दो बापू, और अंदर की बात बताऊंगा तो आप शायद नाराज़ होकर कल हार पहनाने आने वालों को अपनी ही लाठी से पीट दोगे। मज़ाक नहीं कर रहा हूं। सच बोल रहा हूं। आप बोलोगे कि मैंने अहिंसा के दम पर अंग्रेजों को ठीक कर दिया, लेकिन किसी पर हाथ नहीं उठाया। तो बापू वो सफेद अंग्रेज थे उनमें थोड़ा-बहुत ईमान था, ये तो साले काले अंग्रेज हैं इनमें कोई ईमान-धीमान नहीं है। दूसरे, ये लातों के भूत हैं, बातों से तो मानते ही नहीं। अब देखों न, हर साल आपके जन्‍मदिन पर ईश्वर अल्‍लाह तेरो नाम भजते हैं और साल भर साले दंगा-फसाद करते हैं। ये अहिंसा-फहिंसा आपके साथ ही दुनिया से निकल ली बापू। उसको पता था जब देश में आपकी कदर नहीं होने वाली, तो उसकी क्‍या कदर होगी। अहिंसा की जगह उसकी कजिन हिंसा छाई हुई है। दरअसल आपका और आपकी अहिंसा का मीडिया मैनेजमेंट बड़ा पूअर रहा। भला बकरी की दूध की चाय पीकर कोई आपको या आपकी अहिंसा को कितना हाईलाइट करता। वैसे भी आजकल कॉकटेल का ज़माना है और हिंसा की मार्केटिंग सिमी, बजरंगदल, ठाकरे ब्रदर्स, अर्जुन सिंह और यादव ब्रदर्स जैसी जानी-मानी मल्‍टीस्‍टेट कंपनियां कर रही है। ऐसे में हिंसा के सामने अहिंसा कहां टिकती। इसीलिए कह रहा हूं कि आप भी सालों को अपनी ही लाठी से पीटने पर मजबूर हो जाते। बहुत ही कमीने हैं बापू ये लोग। सड़कों पर चौक-चौराहों पर बिठा दिया है आपको और कमरों में दीवार पर लटका दिया है आपको।
क्‍या बताऊं बापू इतना दिमाग खराब होता है जब सरकारी दफ्तरों में आपकी तस्‍वीर के नीचे बैठा साहब या नेता बिना शर्माए हरामखोरी करते हैं। आपने कहा था बापू की ज़रूरत से ज्‍यादा जमा करना चोरी है। यहां तो कई पीढ़ी के लिए इंतजाम कर रहे हैं लोग। चोरी नहीं डाका डाल रहे हैं फिर भी पेट नहीं भर रहा है उनका। और सब हो रहा है आपकी तस्‍वीर के नीचे। संसद में भी जो हुआ बापू। वो आपने देखा। आपने सोचा भी नहीं होगा कि सांसद संसद में नोटों की गड्डियां दिखाएंगे। छोड़ो बापू आपके चक्‍कर में बेमतलब मैं इमोश्‍नल हो रहा हूं। रगड़-रगड़के आपको नहलाने का मुझे ईनाम नहीं मिलने वाला। पिछले इतवार को मैंने बड़े साहब की कार धोई थी तो साहब ने मुझे खुश होकर नीला वाला गांधी यानि सौ का नोट दिया। उसके पहले वाले इतवार को मेम साहब के प्‍यारे-दुलारे पप्‍पी को नहलाया था, तो मेम साहब ने भी खुश होकर मुझे नीला गांधी यानि सौ का नोट ईनाम में दिया था। काम भी उतना नहीं था यहां तो बस सेवा ही है मेवा तो कुछ मिलना नहीं है। एक तो टाईम खोटा करो, ऊपर से इमोश्‍नल अलग हो रहा हूं। ठीक है, बापू इसे मैं समाज सेवा के एकाउण्‍ट में डाल दे रहा हूं। फायदा कुछ होना नहीं है अब अगले साल आऊंगा बापू आपको नहलाने कोई अच्‍छी ख़बर होगी तो बताऊंगा ज़रूर। तब तक आप चौक-चौराहों पर उपवास करते रहिए। बुरा मत मानना भावना में बहकर कोई गलत बात कह गया होऊंगा तो।
आपका अपना
गरीबदास फकीरचंद गांधी
रायपुर (छतीसगढ)
क्षमा सहित रिठेल पोस्ट्।
बापू के लिये आज इससे ज्यादा कुछ और नही कहने के लिये मेरे पास्।