Tuesday, July 19, 2011

अरे कंहा हो मोमबत्तीवालों,कंहा हो रिट-पिटीशन वालों?मुम्बई में बम ब्लास्ट का एक संदिग्ध पूछताछ के बाद मर गया?क्या इस पर शोर नही मचाओगे?क्या सिर्फ़ गुजरात में ही चिल्लाओगे?

मैं सोच रहा था कि गई मुम्बई पुलिस।कलउसकी पूछताछ के बाद एक संदिग्ध की मौत हो गई थी।मुझे लगा कि बम ब्लास्ट में मरे लोगों से ज्यादा संदिग्ध की मौत पर रोना-धोना होगा।जैसा कि गुजरात में होता आया है।मगर अफ़सोस कोई नही रोया उस गरीब की मौत पर्।न कोई मोम बत्तीवाला,ना कोई सस्ता टेस्टीवाला, ना कोई सोशलाईट्स,न कोई कानून-विशेषज्ञ,ना कोई रिट-पिटीशन का थोक दुकानदार।एक भी आगे नही आया।और तो और मुसलमानों के नये मसीहा अर्जुन सिंह के उत्तराधिकारी दिग्विजय सिंह को भी उस गरीब की मौत नज़र नही आई।दिल्ली के बाटला हाऊस में शहीद मोहन चंद शर्मा की शहादत पर तक सवाल उठा चुके दिग्विजय सिंह की खामोशी भी समझ से परे है।हर मामले में उन्हे आरएसएस नज़र आ जाता है इसमे उन्हे कुछ भी नज़र क्यों नही आया,समझ ही नही आया।खैर नरेन्द्र मोदी जरूर खुश हो रहे होंगे,चलो अहमदाबाद के बम ब्लास्ट के आरोपी का भाई मुम्बई पुलिस के हत्थे चढा था।अगर गुजरात पुलिस से पूछताछ के दौरान मरा रहता तो हो गया रहता अभी तक़ मोदी का जीना हराम।नोदी ह्त्यारा है,मोदी की पुलिस हत्यारी है,मोदी के राज में अल्पसंखुअक सुरक्षित नही हैं,पुलिस वालों को गिरफ़्तार करो,मोदी के कहने पर मार डाला पुलिस वालो ने,उस पर मुकदमा चलाओ,फ़िर कोई सस्ता टेस्टीवाला आ जाता,कोई याचिका एक्स्पर्ट आ जाता,फ़ाईव स्टार रुदालियां आ जाती,मोमबत्ती ब्रांड श्रद्धांजलि एक्स्पर्ट आ जाते।सब हो जाता।मगर वो मामला मुम्बई मे नही गुजरात में हुआ होता तो।गुजरात ही नही,छत्तीसगढ भी चल जाता।यंहा तो भूख से 6 आदिवासी मर गये हैं,कह कर अदालत का दरवाज़ा खट्खटा दिया था भाई लोगों ने।जब आब्ज़र्वर आये तो हैरान रह गये,पांच को ज़िंदा सामने देश कर,एक मरा भी था तो बीमारी से बहुत पहले।ये तो हाल है।छत्तीसगढ दिखेगा,गुजरात दिखेगा,और आजकल उत्तरप्रदेश भी दिख रहा है।कर्नाटक में गीता का पाठ दिख गया।बस नही दिखा तो मुम्बई पुलिस की पूछताछ के बाद हुई एक संदिग्ध की मौत।कश्मीर में पण्डितों की दुर्दशा नही दिखती,उनका भाग जाना नही दिखता,उनके साथ हुआ अन्याय,अत्याचार नही दिखता,दिखता है तो कभी-कभी हुआ कोई एनकाऊण्टर्।छत्तीसगढ में भी सोते हुये निर्दोष बच्चों की ह्त्या नही दिखती,नक्सलियों की लूट-खसोट,अपराध नही दिखते,सामूहिक नरसंहार नही दिखते,बारूदी विस्फ़ोट नज़र नही आते,हां पुलिस का रात को स्कूलों मे रूक जाना नज़र आ जाता है,राज्य सरकार का आदिवासियों को आत्मरक्षार्थ दिये गये हथियात दिख जाते हैं,उनको एसपीओ बनाना नज़र आ जाता है और भी बहुत कुछ नज़र आता है उन लोगों को मगर मुम्बई का मामला नज़र नही आता।क्यों चव्हाण और मोदी में फ़र्क़ है या गुजरात के संदिग्ध और मुम्बई के संदिग्ध में फ़र्क़ है,या फ़िर भाजपा और कांग्रेस की सरकार होने का फ़र्क़ है।खैर जनता भी अब समझने लगी है विदेशी रुपल्ली के इशारों पर रोने-गाने और शोर मचाने वालों को।

5 comments:

Suresh Chiplunkar said...

वाह भाऊ वाह… आज तो आपने 9 नम्बर की कोल्हापुरी चप्पल से सुताई की है पंजा छाप की…

ajit gupta said...

यह जनता ही ही तो नहीं समझती है।

Arunesh c dave said...

इनकी आंखो मे स्वार्थ के चश्मे लगे हैं दिखता वही है जिसे देखना चाहते हैं

Ratan Singh Shekhawat said...

अब इनकी सेकुलरता घास चरने गयी है|और पुरे सेकुलर गिरोह की बोलती बंद है|
way4host

भारतीय नागरिक - Indian Citizen said...

दुर्भाग्य तो यही है कि जो समझते हैं वे वोट नहीं देते और जो वोट देते हैं वे समझते नहीं...